जबरन बेदखली मंजूर नही!
विस्थापन-विहीन विकास मॉडल लागू करे सरकार!
भूमि अधिकार आंदोलन
भोपाल : भूमि अधिकार आंदोलन की मध्यप्रदेश राज्य स्तरीय बैठक कल गांधी भवन भोपाल में संपन्न हुई। बैठक में गुजरात से आदिवासी समन्वय मंच भारत के अशोक चौधरी, राजस्थान से कुसुम रावत, संयुक्त किसान मोर्चा के वरिष्ठ किसान नेता डॉ सुनीलम, किसान संघर्ष समिति से एड आराधना भार्गव, किसान संघर्ष समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता एड शिव सिंह, जन स्वास्थ्य अभियान (इंडिया) के अमुल्य निधि, नर्मदा बचाओ आंदोलन के भगवान सेप्टा, सीपीआई के प्रहलाद बैरागी, सीपीएम के बादल सरोज, अशोक तिवारी, अखिलेश यादव, रामनारायण कुररिया, सत्यम श्रीवास्तव आदि की विशेष उपस्थिति थी। कार्यक्रम का संचालन बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के राजकुमार सिन्हा ने किया।
बैठक में मध्यप्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से आए किसान, आदिवासी, वनाधिकार संगठनों, श्रमिक संगठनों एवं जन आंदोलनों के प्रतिनिधियों ने भूमि अधिग्रहण, बांध, खनन, औद्योगिक परियोजनाओं, वनाधिकार और आजीविका से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की गई। बैठक में डॉ सुनीलम ने कहा कि भूमि अधिकार आंदोलन ने मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने के प्रयास को विफल किया था। उन्होंने कहा कि संयुक्त किसान मोर्चा की तर्ज पर प्रदेश और देश के विस्थापितों और जबरदस्ती जमीन से बेदखल किए जा रहे किसानों और आदिवासियों को एकजुट होकर संघर्ष करने की जरूरत है। सिंगरौली के एड अशोक पैगाम ने बिजली उत्पादन के नाम पर बनाए जा रहे बांधों और कोयला आधारित विद्युत परियोजनाओं से भारी मात्रा में जंगल कटने और हजारों परिवारों के विस्थापन का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। गंजाल–मोरांड बांध संघर्ष से जुड़े सरदार देवड़ा और रामप्रसाद काजले ने बताया कि बांध परियोजना के कारण लगभग 2,500 हेक्टेयर वन भूमि डूब क्षेत्र में आ रहा है। इससे बड़ी संख्या में आदिवासी, किसान और गरीब परिवार प्रभावित होंगे।
उन्होंने कहा कि सरकार विकास के नाम पर आदिवासियों और गरीबों के जल, जंगल और जमीन को डुबोने में लगी है, जिसका स्थानीय समुदाय लगातार विरोध कर रहा है। सिलिकोसिस पीड़ित संघ, झाबुआ से आए आशीष एवं मोहन सुल्या ने बताया कि क्षेत्र में सिलिकोसिस बीमारी के कारण मजदूरों का जीवन गंभीर संकट में है और बड़ी संख्या में लोगों को पलायन करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि अनास नदी का बढ़ता प्रदूषण किसानों की खेती और कृषि भूमि को प्रभावित कर रहा है। ऑल इंडिया किसान मजदूर संगठन के मनीष श्रीवास्तव ने कहा कि मालवा क्षेत्र के गुना, राजगढ़ सहित कई जिलों में भूमि अधिग्रहण और कॉर्पोरेट कब्जे के प्रयास तेज हो रहे हैं। किसानों की उपजाऊ जमीन को उद्योगों और निजी कंपनियों के लिए अधिग्रहित किया जा रहा है। भारत जन आंदोलन के विजय भाई ने कहा कि देश और प्रदेश में विकास का मॉडल विस्थापन-विहीन विकास पर आधारित होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सरकार को भूरिया समिति की अनुशंसाओं को पूरी तरह लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश में वर्ष 1998–99 में भूरिया समिति के ढांचे को स्वीकार किया गया था। इस ढांचे के अनुसार अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की केंद्रीय भूमिका सुनिश्चित की गई है तथा ग्राम सभा की सहमति के बिना भूमि का हस्तांतरण या अधिग्रहण नहीं किया जा सकता। सरकार द्वारा अनुसूचित क्षेत्रों में किया जाने वाला कोई भी विकास कार्य ग्राम सभा की पूर्व सहमति के बाद ही आगे बढ़ाना चाहिए। विकास की ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जिसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी और अधिकार सुनिश्चित हों। बैठक में उपस्थित लोग एकमत थे कि जंगलों को डुबोकर, आदिवासियों और किसानों को उनकी जमीन से बेदखल कर बनाई जा रही परियोजनाओं को विकास नहीं कहा जा सकता है। केन- बेतबा परियोजना के विस्थापितों का जबरन मकान तोड़े जाने और जमीन से बेदखल करने की निंदा की गई। बैठक के अंत में भूमि अधिकार आंदोलन ने आह्वान किया कि जल, जंगल, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर पहला अधिकार स्थानीय समुदायों का है और इनके संरक्षण तथा समुदायों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए व्यापक जनआंदोलन को और मजबूत किया जाएगा, मध्यप्रदेश में जबरन भूमि अधिग्रहण और बेदखली के खिलाफ राज्यव्यापी संयुक्त अभियान चलाया जाएगा। सभी संघर्ष क्षेत्रों का साझा समन्वय तंत्र विकसित किया जाएगा और नियमित राज्यस्तरीय बैठकें आयोजित होंगी। ग्राम सभा की सहमति के बिना किसी भी परियोजना को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
भूमि अधिग्रहण कानून 2013, वनाधिकार कानून, पेसा कानून तथा संविधान की पाँचवीं और छठी अनुसूची के पूर्ण क्रियान्वयन के लिए व्यापक जन अभियान चलाया जाएगा। भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास, वनभूमि हस्तांतरण और कॉरपोरेट कब्ज़ों का राज्यव्यापी दस्तावेज़ीकरण किया जाएगा। भूमि, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खिलाफ किसानों, आदिवासियों, मजदूरों, शहरी बस्तियों और लोकतांत्रिक जन आंदोलनों की व्यापक एकजुटता बनाई जाएगी। दमन, झूठे मुकदमों और आंदोलनकारियों के उत्पीड़न के खिलाफ संयुक्त प्रतिरोध विकसित किया जाएगा।







