नीरज कुमार
भिखारी ठाकुर के नाटकों में विस्थापन एक केंद्रीय और गहराई से अनुभूत विषय है—एक ऐसा दर्द, जो न सिर्फ उनके समय का था, बल्कि आज भी बिहार के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में उतनी ही सजीवता से उपस्थित है।
“बिदेसिया” के मंच पर जब नायक गाँव छोड़कर परदेश कमाने जाता है, तब वह केवल अपनी पत्नी को ही नहीं, बल्कि अपनी जड़ों, अपनी पहचान और अपने समुदाय को भी अस्थायी रूप से त्याग देता है। भिखारी ठाकुर ने जिस बिदेसिया को लिखा, वह सिर्फ एक व्यक्ति नहीं है—वह हर उस बिहारी का प्रतीक है, जिसे रोटी की तलाश में गाँव से महानगर की ओर कूच करना पड़ता है। यह यात्रा केवल भौगोलिक नहीं होती; यह संस्कृति, संबंध और आत्मसम्मान की भी यात्रा होती है, जो प्रायः टूटन और बिखराव में बदल जाती है।
आज, जब बिहार से लाखों युवा रोज़गार की तलाश में दिल्ली, मुंबई, पंजाब या विदेशों की ओर पलायन कर रहे हैं, तो भिखारी ठाकुर की कल्पना और संवेदना एक बार फिर जीवित हो उठती है। राजनीति में बार-बार रोज़गार के वादे, स्थानीय विकास के दावे, और प्रवासी मजदूरों के सम्मान की बातें होती हैं, मगर ज़मीनी सच्चाई ये है कि ‘बिदेसिया’ आज भी लौटता नहीं, या लौटे भी तो स्थायित्व उसे नसीब नहीं होता।
भिखारी ठाकुर के नाटक इस विडंबना को उजागर करते हैं कि कैसे सामाजिक ढाँचा और राजनीतिक उदासीनता मिलकर उस विस्थापन को स्थायी बना देते हैं, जो असल में एक अस्थायी मजबूरी था। उनके पात्रों की पीड़ा आज भी हर उस बिहारी की आँखों में देखी जा सकती है, जो प्लेटफॉर्म पर ट्रेन पकड़ने से पहले अपने खेतों, माँ-बाप और मिट्टी को एक बार चुपचाप देखता है।
बिहार की राजनीति अगर वाकई इस दर्द को समझती, तो भिखारी ठाकुर को सिर्फ स्मरण नहीं किया जाता—उनके सपनों का समाज रचा जाता, जहाँ बिदेसिया को परदेश न जाना पड़े।
भिखारी ठाकुर की विरासत हमें याद दिलाती है कि कला सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि चेतना का हथियार है—और विस्थापन सिर्फ समस्या नहीं, बल्कि राजनीति की सबसे कठोर असफलता का नाम है।
आज, उनकी पुण्यतिथि पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम उनकी तरह सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हुए लोकभाषा, लोकसंस्कृति और सामाजिक न्याय के लिए काम करें। भिखारी ठाकुर का योगदान युगों तक स्मरणीय रहेगा। उन्हें शत-शत नमन।








