राणा सांगा को गद्दार कहने पर बिगड़ी राम जी लाल सुमन की छवि
लखनऊ। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने राम जी लाल सुमन प्रकरण का लाभ लेने की रणनीति बनाई है। दलितों के शोषण के खिलाफ सपा ने प्रदेश भर में जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन भी किया है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या सपा को दलित वोट बैंक मिलेगा ? सपा को यह समझना होगा कि एक तो राम जी लाल सुमन का चेहरा दलितों को जोड़ने वाला नहीं है। दूसरा जिस तरह से राम जी लाल सुमन ने राणा सांगा को गद्दार बोला है और माफ़ी मांगने से इनकार किया है। उससे बड़े स्तर पर यादव और दलित भी नाराज हैं। लोग समझ रहे हैं कि दलितों के वोट के लिए राणा सांगा को गद्दार कहा है। मतलब महापुरुष का अपमान कर दिया है। जहां तक सपा से दलितों के जुड़ने की बात है कि यूपी में दलितों और यादवों का 36 का आंकड़ा है।
करणी सेना, जो मुख्य रूप से क्षत्रिय समुदाय से जुड़ी है, के हमलों को सपा ने “सवर्ण उत्पीड़न” के रूप में चित्रित किया। यह रणनीति क्षत्रिय बनाम दलित-पिछड़ा तनाव को बढ़ा सकती है, जिसका लाभ सपा को उन क्षेत्रों में मिल सकता है जहां दलित और पिछड़े मतदाता बहुसंख्यक हैं। सपा ने इस मुद्दे को भाजपा से जोड़कर यह आरोप लगाया कि भाजपा करणी सेना को संरक्षण दे रही है, जिससे सपा अपने गैर-क्षत्रिय वोट बैंक को मजबूत कर सकती है।
उधर मायावती ने सपा पर दलितों को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया। ऐसे में सपा और बसपा के दलित वोटों को आकर्षित करने का अवसर हो सकता है। बसपा की कमजोर होती स्थिति और मायावती की इस मुद्दे पर रक्षात्मक रुख सपा के लिए फायदेमंद हो सकता है।
उत्तर प्रदेश में क्षत्रिय समुदाय, खासकर पश्चिमी यूपी और अवध क्षेत्र में, एक प्रभावशाली वोट बैंक है। रामजी लाल सुमन के राणा सांगा को “गद्दार” कहने से क्षत्रिय समुदाय में भारी आक्रोश है, जिसका असर सपा की छवि पर पड़ सकता है। करणी सेना और क्षत्रिय महासभा जैसे संगठनों ने सपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, और अगर यह आक्रोश 2027 तक बना रहा, तो सपा को क्षत्रिय वोटों का नुकसान हो सकता है।
सपा की रणनीति जातिगत तनाव को बढ़ाने की है, लेकिन यह रणनीति उल्टी भी पड़ सकती है। अगर सपा को केवल दलित-पिछड़ा बनाम सवर्ण की पार्टी के रूप में देखा गया, तो यह गैर-दलित और गैर-पिछड़े मतदाताओं को भाजपा या अन्य दलों की ओर धकेल सकता है।
कुछ एक्स पोस्ट्स में दावा किया गया कि सपा का यह कदम समाज में “जातीय जहर” घोलने का प्रयास है, जो उनकी व्यापक अपील को कमजोर कर सकता है।
सुमन के बार-बार विवादित बयान, जैसे कि आंबेडकर जयंती पर मंदिर-मस्जिद और बौद्ध मठों पर टिप्पणी, सपा के लिए मुश्किलें बढ़ा सकते हैं। ये बयान धार्मिक और सामाजिक संवेदनाओं को ठेस पहुंचा सकते हैं, जिससे सपा की छवि को नुकसान हो सकता है।








