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सपा को कोई खास फायदा नहीं मिलने जा रहा है राम जी लाल प्रकरण का !

राणा सांगा को गद्दार कहने पर बिगड़ी राम जी लाल सुमन की छवि

द न्यूज 15 ब्यूरो 

 लखनऊ। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने राम जी लाल सुमन प्रकरण का लाभ लेने की रणनीति बनाई है। दलितों के शोषण के खिलाफ सपा ने प्रदेश भर में जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन भी किया है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या सपा को दलित वोट बैंक मिलेगा ? सपा को यह समझना होगा कि एक तो राम जी लाल सुमन का चेहरा दलितों को जोड़ने वाला नहीं है। दूसरा जिस तरह से राम जी लाल सुमन ने राणा सांगा को गद्दार बोला है और माफ़ी मांगने से इनकार किया है। उससे बड़े स्तर पर यादव और दलित भी नाराज हैं। लोग समझ रहे हैं कि दलितों के वोट के लिए राणा सांगा को गद्दार कहा है। मतलब महापुरुष का अपमान कर दिया है। जहां तक सपा से दलितों के जुड़ने की बात है कि यूपी में दलितों और यादवों का 36 का आंकड़ा है।

मायावती के राज में यादवों का उत्पीड़न होता था तो मुलायम सिंह के राज  दलितों का। ऐसे में दलितों और यादवों दोनों ही में घाव गहरे हैं जिनको भरना बहुत मुश्किल है। जहां तक लोकसभा चुनाव में दलितों का वोट सपा को मिलने की बात है। ऐसे में मायावती ने हथियार डाल दिए थे। आरक्षण और संविधान का मामला तेजी से उभरा था। एक तो विधानसभा चुनाव के मुद्दे स्थानीय होते हैं। दूसरे आजम खां के जेल में जाने के बाद मुस्लिम सपा प्रमुख अखिलेश यादव से नाराज हैं।
दरअसल रामजी लाल सुमन प्रकरण में समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन के राणा सांगा पर दिए गए विवादित बयान और इसके बाद उनके घर व काफिले पर करणी सेना द्वारा किए गए हमलों को शामिल किया जाता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह एक जटिल और संवेदनशील मुद्दा बन गया है। इस प्रकरण से सपा को कितना फायदा होगा, यह कई कारकों पर निर्भर करता है, जैसे कि सपा की रणनीति, मतदाता ध्रुवीकरण, और इस मुद्दे का प्रबंधन। निम्नलिखित विश्लेषण इस संदर्भ में सपा को होने वाले संभावित लाभ और चुनौतियों को रेखांकित करता है:
सपा ने इस प्रकरण को दलित उत्पीड़न और सामाजिक न्याय के मुद्दे से जोड़कर प्रस्तुत किया है। अखिलेश यादव ने दावा किया कि रामजी लाल सुमन पर हमला उनकी दलित पहचान के कारण हुआ, जिसे सपा ने “PDA” (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के खिलाफ हमले के रूप में प्रचारित किया। उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता, विशेष रूप से जाटव और गैर-जाटव समुदाय, एक महत्वपूर्ण वोट बैंक हैं। इस मुद्दे को दलित अस्मिता से जोड़कर, सपा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के कुछ दलित वोटों को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर सकती है, खासकर तब जब बसपा प्रमुख मायावती ने इस प्रकरण को सपा की “घिनौनी राजनीति” करार दिया। सपा का यह दावा कि यह हमला सामाजिक न्याय के खिलाफ है, उनके पारंपरिक पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समर्थकों को भी एकजुट कर सकता है।

करणी सेना, जो मुख्य रूप से क्षत्रिय समुदाय से जुड़ी है, के हमलों को सपा ने “सवर्ण उत्पीड़न” के रूप में चित्रित किया। यह रणनीति क्षत्रिय बनाम दलित-पिछड़ा तनाव को बढ़ा सकती है, जिसका लाभ सपा को उन क्षेत्रों में मिल सकता है जहां दलित और पिछड़े मतदाता बहुसंख्यक हैं। सपा ने इस मुद्दे को भाजपा से जोड़कर यह आरोप लगाया कि भाजपा करणी सेना को संरक्षण दे रही है, जिससे सपा अपने गैर-क्षत्रिय वोट बैंक को मजबूत कर सकती है।

उधर मायावती ने सपा पर दलितों को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया। ऐसे में सपा और  बसपा के दलित वोटों को आकर्षित करने का अवसर हो सकता है। बसपा की कमजोर होती स्थिति और मायावती की इस मुद्दे पर रक्षात्मक रुख सपा के लिए फायदेमंद हो सकता है।

उत्तर प्रदेश में क्षत्रिय समुदाय, खासकर पश्चिमी यूपी और अवध क्षेत्र में, एक प्रभावशाली वोट बैंक है। रामजी लाल सुमन के राणा सांगा को “गद्दार” कहने से क्षत्रिय समुदाय में भारी आक्रोश है, जिसका असर सपा की छवि पर पड़ सकता है। करणी सेना और क्षत्रिय महासभा जैसे संगठनों ने सपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, और अगर यह आक्रोश 2027 तक बना रहा, तो सपा को क्षत्रिय वोटों का नुकसान हो सकता है।

सपा की रणनीति जातिगत तनाव को बढ़ाने की है, लेकिन यह रणनीति उल्टी भी पड़ सकती है। अगर सपा को केवल दलित-पिछड़ा बनाम सवर्ण की पार्टी के रूप में देखा गया, तो यह गैर-दलित और गैर-पिछड़े मतदाताओं को भाजपा या अन्य दलों की ओर धकेल सकता है।
कुछ एक्स पोस्ट्स में दावा किया गया कि सपा का यह कदम समाज में “जातीय जहर” घोलने का प्रयास है, जो उनकी व्यापक अपील को कमजोर कर सकता है।

सुमन के बार-बार विवादित बयान, जैसे कि आंबेडकर जयंती पर मंदिर-मस्जिद और बौद्ध मठों पर टिप्पणी, सपा के लिए मुश्किलें बढ़ा सकते हैं। ये बयान धार्मिक और सामाजिक संवेदनाओं को ठेस पहुंचा सकते हैं, जिससे सपा की छवि को नुकसान हो सकता है।

रामजी लाल सुमन प्रकरण से सपा को अल्पकालिक रूप से कुछ लाभ हो सकता है, खासकर दलित और पिछड़े मतदाताओं को एकजुट करने में। यह सपा को बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाने और अपनी PDA रणनीति को मजबूत करने का अवसर देता है। हालांकि, दीर्घकालिक रूप से, क्षत्रिय समुदाय का आक्रोश, जातिगत ध्रुवीकरण का उल्टा असर, और भाजपा की जवाबी रणनीति सपा के लिए नुकसानदेह हो सकती है। सपा को इस मुद्दे को सावधानी से प्रबंधित करना होगा ताकि यह सामाजिक न्याय के मुद्दे तक सीमित रहे और व्यापक मतदाता आधार को नाराज न करे।
2027 के विधानसभा चुनावों में इस प्रकरण का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सपा इसे किस रूप में प्रचारित करती है और विपक्षी दल इसका जवाब कैसे देते हैं। अभी के लिए, यह कहना मुश्किल है कि सपा को कितना फायदा होगा, लेकिन यह निश्चित है कि यह मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहेगा।
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