बांग्लादेश की स्थिति पर सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) का रुख 

भारत सरकार ने बंग्लादेश से इस बात के लिए आपत्ति दर्ज कराई है कि हाल ही में दो हिन्दुओं माइमेनसिंह में दीपू चंद्र दास व राजबाड़ी में अमृत मण्डल की अराजक भीड़ ने पीट-पीट कर हत्या कर दी। बंग्लादेश के एक संगठन हिन्दू, बौद्ध, इसाई एकता परिषद के अनुसार अंतरिम सरकार के दौर में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हत्या आगजनी व जमीन कब्जा करने की 2,900 घटनाएं हो चुकी हैं जिसका हवाला भारत सरकार ने दिया है। भारत सरकार यह भी कह रही है कि बंग्लादेश अपने यहां हाने वाले चुनाव में सभी राजनीतिक दलों की भागीदारी सुनिश्चित करे क्योंकि ऐसी आशंका है कि शेख हसीना, जिन्होंने इस समय भारत में शरण ले रखी है, के दल आवामी लीग को चुनाव में भाग लेने न दिया जाए। वैसे बंग्लादेश के पिछले चुनाव में वहां के दूसरे बड़े राजनीतिक दल खालिदा जिया की बंग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने चुनाव का बहिष्कार किया था क्षोंकि उस समय आवामी लीग का वर्चस्व था और बंग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को यह भरोसा नहीं था कि चुनाव निष्पक्ष होंगे। किंतु उस समय भारत ने कोई प्रतिकिया नहीं व्यक्त की।
17 दिसम्बर को केरल के पालघाट जिले में छत्तीसगढ़ के एक मजदूर राम नारायण बघेल को कुछ लोगों ने बंग्लादेशी होने के शक में पीट-पीट कर मार डाला। 9 दिसम्बर को देहरादून में त्रिपुरा के 24 वर्षीय छात्र एंजेल चकमा को कुछ स्थानीय लोगों ने चीनी कहकर पीट-पीट कर मार डाला। एंजेल आखिरी दम तक कहता रहा कि वह भारतीय है। असल में 2014 में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद ऐसी घटनाओं की संख्या अचानक बढ़ गई है। 28 सितम्बर, 2015 को उत्तर प्रदेश के दादरी के निकट बिसाहडा गांव में भीड़ ने 52 वर्षीय मोहम्मद अख्लाक को गौ-हत्या के शक में पीट-पीट कर मार डाला। 18 मार्च 2016 को झारखण्ड के लातेहार में तथाकथित गौ-रक्षकों ने गायों को लेकर जा रहे 32 वर्षीय मज़लूम अंसारी व 12 वर्षीय इम्तियाज़ खान को मार कर पेड़ से उनकी लाशें लटका दीं। 1 अप्रैल 2017 को नूह, हरियाणा के दूग्ध कृषक 55 वर्षीय पहलू खान को अलवर राजस्थान में गायों को लाते हुए गौ-रक्षकों द्वारा पीट-पीट कर मार डाला गया। 29 जून 2017 को झारखण्ड में अलीमुद्दीन उर्फ असगर अंसारी को पास में गोमांस होने के शक में पीट-पीट कर मार डाला गया। 10 नवम्बर 2017 को अलवर, राजस्थान में उम्मार खान की गौ-रक्षकों ने गोली मार कर हत्या कर दी। 13 जून 2018 को दुल्लू, झारखण्ड में 35 वर्षीय सिराबुद्दीन अंसारी व 30 वर्षीय मुर्तजा अंसारी को गाय चोरी के आरोप में पीट-पीट कर मार डाला गया। 20 जून 2018 को हापुड़, उ.प्र. में 45 वर्षीय कासिम को गौ-हत्या की अफवाह में पीट-पीट कर मार डाला गया। 20 जुलाई 2018 को 31 वर्षीय रकबर खान को गौ-तस्करी के शक में अलवर में पीट-पीट कर मार डाला गया। 11 अप्रैल 2019 को गुमला, झारखण्ड में एक इसाई व्यक्ति की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। 16 मई 2019 को भदेरवाह, जम्मू-कश्मीर में 50 वर्षीय नईम अहमद शाह को गौ-रक्षकों ने गौ-तस्करी के आरोप में सिर में गोली मार दी। नईम अहमद के परिवार के मुताबिक उस समय उसके पास कोई जानवर नहीं थे। 23 सितम्बर 2019 को खुण्टी, झारखण्ड में एक आदिवासी की गौ-मांस बेचने के शक में पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। 16 अप्रैल 2020 को पालघर, महाराष्ट्र में दो साधुओं व उनके चालक को चोर समझ कर हत्या कर दी गई। 4 जून 2021 को मथुरा, उ.प्र. में 50 वर्षीय ट्रक चालक मोहम्मद शेरा की गौ-तस्करी के आरोप में गोली मार कर हत्या कर दी गई। 12 जून 2021 को तिनसुकिया, असम में 28 वर्षीय सरत मोरान की गाय चोरी करने की कोशिश के आरोप में पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। 14 जून 2021 को चित्तौगढ़, राजस्थान में बाबू भील की बैल ले जाते हुए गौ-रक्षको ंने पीट-पीट कर हत्या कर दी। 16 फरवरी 2023 को भिवानी, हरियाणा में भरतपुर निवासी 25 वर्षीय नासिर व 35 वर्षीय जुनैद की गौ-रक्षको ंने पीट-पीट कर हत्या कर दी। 10 जून 2023 को नासिक, महाराष्ट्र में 23 वर्षीय लुकमान अंसारी को गौ-रक्षकों द्वारा पीट-पीट कर मार डाला गया। 23 अगस्त 2024 को कक्षा 12 के छात्र आर्यन मिश्र को फरीदाबाद, हरयाणा में गौ-रक्षकों ने धोखे से मुस्लिम समझ कर मार डाला। 27 अगस्त 2024 को चरखी दादरी, हरियाणा में पश्चिम बंगाल से आए 26 वर्षीय साबिर मलिक को गोमांस खाने के शक में मार डाला गया। 30 अगस्त 2024 को इगतपुरी में रेलगाड़ी में जलगांव निवासी 72 वर्षीय हाजी अशरफ मुनयार को पास में गोमांस रखने के शक में मार डाला गया। 11 अगस्त 2025 को महाराष्ट्र के बेतावड़ खुर्द गांव में 30 वर्षीय सुलेमान खान पठान को उसी के हिन्दू साथियों ने पीट-पीट के मार डाला क्योंकि जामनेर के एक कैफे में वह एक हिन्दू लड़की के साथ गया था। 5 दिसम्बर 2025 को नवादा, बिहार में 55 वर्षीय मोहम्मद अतहर हुसैन, जो साइकिल पर घूम-घूम कर कपड़ा बेचते थे, को सिर्फ मुस्लिम होने के कारण एक समूह ने बर्बर तरीके से उसके साथ अत्याचार किया जिससे वह बाद में अस्पताल जाकर मर गया। अब तक इस तरह सैकड़ों लोग भारत में नफरती हिसा के शिकार हो चुके हैं। हाल में हमने यह भी देखा कि किस तरह क्रिसमस के आयोंजनों में तोड़-फोड़ की गई। क्या प्रधान मंत्री जो उसी समय एक गिरजाघर में मौजूद थे, इन घटनाओं से अनभिज्ञ थे?
इन घटनाओं को देखने के बाद हम सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि कैसे समाज का निर्माण हम कर रहे हैं? जब से नरेन्द्र मोदी और अमित शाह सत्ता में आए हैं मुसलमानों व इसाइयों के खिलाफ एक नफरत की राजनीति जिसका उद्देश्य सिर्फ हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण है, से देश में हिंसक प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिला है। पिछले कुछ वर्षों से घुसपैठियों को लेकर राजनीति हो रही है। अब हम यहां पहुंच गए हैं कि एक छत्तीगढ़ी केरल में घुसपैठिया हो जाता है और एक त्रिपुरा का युवा उत्तराखण्ड में। देखना है यह नफरत की राजनीति की और कितनी कीमत हमें चुकानी पड़ेगी सिर्फ इसलिए कि अपने आप को राष्ट्रवादी कहने वाला दल जिसने अयोध्या में एक राम मंदिर बनवाया है सत्ता में रह सके?
देश में घट रही उपरोक्त हिंसक घटनाओं और तथाकथित बंग्लादेशियों को घुसपैठिया बता कर उनके घर तोड़ना, बिना ठीक से जांच किए उन्हें बंग्लादेश में जबरदस्ती ढकेल देना, जिसमें गल्ती से एक गर्भवती भारतीय महिला को भी भेज दिया गया जो अब भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से वापस लाई गई है, का देर सबेर बंग्लादेश में प्रभाव पड़ना ही था। नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में 2002 की साम्प्रदायिक हिंसा को जायज ठहराते हुए कहा था कि हरेक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है।
अगर हम मस्जिद तोड़ेंगे तो पाकिस्तान व बंग्लादेश में मंदिर तोड़े जाएं तो इसमें कोई आश्चर्य की बात है क्या? इसी तरह यदि साम्प्रदायिक राजनीति के तहत भारत में अल्पसंख्यकों और उसमें भी खासकर मुसलमानों को निशाना बनाया जाएगा तो पाकिस्तान व बंग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा कैसे रोकी जा सकती है?
कोई यह भी कह सकता है कि पाकिस्तान व बंग्लादेश में तो पहले से ही अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न होता आया है और भारत में बाद में शुरू हुआ। यदि हम मानते हैं कि पाकिस्तान या बंग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साथ जो हुआ वह गलत है तो क्या इसके जवाब में हम भारत में भी अल्पसंख्यकों पर अत्याचार शुरू कर देंगे या हम यह कोशिश करेंगे कि भारत एक साम्प्रदायिक सद्भावना की ऐसी मिसाल बने कि देर सबेर पाकिस्तान और बंग्लादेश में भी यही भावना प्रधान बने।
यदि हम वाकई में चाहते हैं कि बंग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ हिंसक घटनाएं न हों और हम सिर्फ भारत में हिन्दू मतों के ध्रुवीकरण के लिए यह बंग्लादेशी हिन्दुओं के साथ खड़ा होने का दिखावा नहीं कर रहे हैं तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा बंद हो। इसके सिवाय और कोई रास्ता ही नहीं है। यदि भारत में मुसलमानों व ईसाइयों के खिलाफ हिंसा होती रहेगी तो हम किस नैतिक आधार पर बांग्लादेश या पाकिस्तान से कहेंगे कि वे अपने यहां अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा रोकें? बांग्लादेश में दीपू चंद्र दास व अमृत मंडल तभी सुरक्षित रह सकेंगे जब भारत में पहलू खान और मोहम्मद अतहर खान सुरक्षित रहेंगे।

संदीप पांडेय व फैसल खान

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