आपराधिक बैकग्राउंड वालों को नहीं राहत, प्रदर्शन पर जानें SC ने क्या कहा –

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकारें प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को बंद करने या वापस लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। अपने 28 जुलाई के अंतरिम आदेश पर उठे भ्रम को दूर करते हुए कोर्ट ने यह साफ किया है कि जांच जारी रखने के लिए कहने का अर्थ यह नहीं था कि राज्य सरकारें कानूनी प्रक्रिया अपना कर मुकदमा वापस नहीं ले सकतीं। चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने यह स्पष्टता तब दी जब याचिकाकर्ताओं ने बताया कि केंद्र ने मामलों को वापस लेने का आश्वासन दिया है। इसके बावजूद राज्यों के अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेश का हवाला देकर कह रहे हैं कि वह जांच जारी रखेंगे। इस पर जजों ने कहा कि उन्होंने मुकदमे वापस लेने पर कोई रोक नहीं लगाई है।

 

 

आपराधिक बैकग्राउंड के कितने लोग थे?

 

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के लिए पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार छात्रों को राहत देने के पक्ष में है, लेकिन भीड़ में शामिल आपराधिक तत्वों को रियायत नहीं मिल सकती. दिल्ली में ऐसे 2,738 लोगों की पहचान हुई है, जिन पर हत्या, रेप और डकैती जैसे बड़े अपराधों में शामिल होने का आरोप है. यह लोग हिंसा और उपद्रव के लिए प्रदर्शन में आए थे।

याचिकाकर्ता पक्ष की तरफ से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी, गोपाल शंकरनारायण, वृंदा ग्रोवर जैसे वकीलों ने पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि वह अपराधी तत्वों को बचाने के पक्ष में नहीं हैं। लेकिन इसकी आड़ में मामूली अपराधों या राजनीतिक आंदोलन के लिए दर्ज मुकदमों वाले लोगों को निशाना नहीं बनाना चाहिए।

 

 

आपराधिक बैकग्राउंड वालों को नहीं राहत: SC

 

इस पर कोर्ट ने कहा, ‘छात्रों की आड़ में छिपे अपराधी किसी रियायत के हकदार नहीं हैं, लेकिन यह बात गंभीर अपराध के आरोपियों पर लागू होगी.’ कोर्ट ने कहा कि ‘आपराधिक पृष्ठभूमि’ के आधार पर कार्रवाई का दायरा सिर्फ गंभीर और जघन्य अपराधों तक रहेगा। छोटे या मामूली मामलों में नामजद छात्र इसके दायरे में नहीं आएंगे। वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण ने छात्रों पर अत्यधिक बल प्रयोग का मसला उठाया. उन्होंने कहा कि बिना वर्दी के लाठी चला रहे लोगों पर अभी तक सरकार ने कोई सफाई नहीं दी है. इस पर चीफ जस्टिस ने कहा, ‘अगर किसी पुलिस अधिकारी ने कानून का उल्लंघन किया है तो उसे संरक्षण नहीं मिलेगा।

‘एकतरफा सुनवाई नहीं होनी चाहिए’

 

घायल पुलिसकर्मियों के परिवार की तरफ से पेश एक वकील ने कहा कि मामले की एकतरफा सुनवाई नहीं होनी चाहिए। प्रदर्शन के दौरान पुलिस के लोगों पर हमले हुए. उन्हें गंभीर चोट पहुंचाई गई. महिला पुलिस अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार हुआ और उन्हें भीड़ की ओर खींचा गया. कोर्ट ने आश्वस्त किया कि वह जिस कमिटी का गठन करेगा, वह सभी पहलुओं को देखेगी. जजों ने मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त को तय करते हुए कहा कि उस दिन वह स्वतंत्र कमिटी बनाने और उसका कार्यक्षेत्र तय करने पर विचार करेंगे. इस कमिटी की अध्यक्षता किसी पूर्व जज को दी जाएगी. अगली सुनवाई में आंदोलनों पर कार्रवाई के लिए उचित प्रोटोकॉल पर भी विचार किया जाएगा।

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