क्यों गांधी की तरह बैठके कातेंगे चर्खा

क्यों गांधी की तरह बैठके कातेंगे चर्खा,
लेनिन की तरह देंगे न दुनिया को हिला हम।।

इन शेर को लिखने वाले हसरत मोहानी का आज जन्म दिवस है। हसरत ने ही 1920 में पहली बार ‘इंक़लाब-जिंदाबाद’ का नारा दिया था। जंग-ए-आज़ादी के दौरान तो इस नारे ने अपना असर दिखाया ही, आज भी यह नारा हिन्दुस्तान ही नहीं, पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी आंदोलनों की जान है।

यही नहीं मोहानी ने ही सबसे पहले पूर्ण स्वराज का मसला उठाया था, जिसके चलते उन्हें जेल भी जाना पड़ा। 27 दिसंबर, 1921 को कांग्रेस के अधिवेशन में गांधी-नेहरू जैसे नेताओं के सामने ही इन्होंने पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव रखा था। लेकिन महात्मा गांधी सहित अन्य बड़े नेता तब डोमेनियन रूल के पक्ष में थे, लिहाजा मोहानी का प्रस्ताव पास नहीं हो सका।

दरअसल, उन्हें गांधी की तरह बैठकर विमर्श करना पसंद नहीं था, वे लेनिन की तरह दुनिया हिला देने में यकीन रखते थे। लेनिन का भी उन पर काफी प्रभाव था। भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना में उनका अहम रोल रहा। वे इसके फाउंडर मेंबरों में से एक थे। मुस्लिम लीग के साथ भी इनका जुड़ाव रहा, लेकिन कभी भी इन्होंने अपने विचारों से समझौता नहीं किया। मुस्लिम लीग में रहते हुए ये लगातार जिन्ना की मुख़ालफ़त करते रहे। इन्होंने द्विराष्ट्र के सिद्धांत का पुरजोर विरोध किया।

यकीनन, मोहानी के लिये मादर-ए-वतन से बढ़कर कुछ भी नहीं था। देश आज़ाद हुआ, तो वे पाकिस्तान नहीं गये। इसी मिट्टी पर आखिरी सांस ली। उर्दू अदब का यह अजीमुश्शान शायर 13 मई 1951 को मौत की आगोश में समा गया। हालांकि मोहानी जैसे कलमनवीस मरते नहीं। ऐसे लोगों का नाम काल के कपाल पर टंक जाता है-

हम ख़ाक में मिलने पे भी नापैद न होंगे,
दुनिया में न होंगे तो किताबों में मिलेंगे।।

-नागरिक अखबार

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