चरण सिंह राजपूत
नई दिल्ली। इसे भाजपा की रणनीति कहें या फिर पार्टी के पक्ष में बना माहौल कि द कश्मीर फाइल्स की हिन्दुत्व के पक्ष में अपार सफलता के बाद आरएसएस और भाजपा के नायक रहे सावरकर पर स्वतंत्र वीर सावरकर फिल्म बनने जा रही है। यह भी कह सकते हैं कि इस फिल्म में भाजपा को राजनीति करने का पूरा मौका मिलेगा। इस के निर्माता आनंद पंडित और संदीप सिंह हैं, इसका निर्देशन महेश मांजरेकर तो सावरकर का रोल रणदीप हुड्डा कर रहे हैं। जिस तरह से भाजपा और आरएसएस कांग्रेस पर इतिहास तोड़-मरोड़ कर पेश करने की बात कर सावरकर को आजादी की लड़ाई का नायक मानती है, उसे देखकर लगता है कि इस फिल्म पर भी बवाल मचना तय है। बवाल मचेगा तो भाजपा इस फिल्म पर भी राजनीतिकरण करने से बाज नहीं आएगी। यह भी कहा जा सकता है कि भाजपा 2024 का लोकसभा चुनाव फिल्मों के राजनीतिकरण करने के बल पर जीतने की रणनीति बना रही है। हो सकता है कि भाजपा के दूसरे नायक श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीन दयाल, अटल बिहारी वाजपेयी पर भी फ़िल्में बननी शुरू हो जाये। हो सकता है कि को कुछ निर्देशक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पर भी फिल्म बनाने लगे लगें। ‘स्वतंत्र वीर सावरकर’ की फिल्म की शूटिंग जून में होने जा रही है। इस फिल्म को लंदन, महाराष्ट्र और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के विभिन्न स्थानों पर शूट करने की बात निकल कर सामने आ रही है। फिल्म एक अलग स्पेक्ट्रम से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को उजागर करेगी। यह सामग्री भाजपा के राजनीतिकरण के लिए पर्याप्त है।
निर्माता आनंद पंडित का कहना है कि ‘ये दर्शकों के लिए यादगार फिल्म होगी। सिनेमा एक रचनात्मक माध्यम है जो विभिन्न विचार प्रक्रियाओं का जश्न मनाता है। उनका कहना है कि स्वतंत्र वीर सावरकर जैसी फिल्में कहीं अधिक आकर्षक सार्वजनिक संवाद बनाने में मदद करेंगी। उन्होंने कहा है कि महेश और रणदीप के साथ, उन्हें अब यकीन है कि हम दर्शकों के लिए कुछ यादगार बनाएंगे।’ दरअसल देश की राजनीति में सिनेमा का प्रोपेगेंडा के तौर पर इस्तेमाल होता रहा है? द कश्मीर फाइल्स फिल्म का जैसे प्रधानमंत्री और आरएसएस सर संघचालक ने प्रमोशन किया है। उत्तर प्रदेश समेत भाजपा शासित 5 राज्यों में टैक्स फ्री कर दिया गया है। कई जगहों पर भाजपा समर्थक इसकी मुफ्त में स्क्रीनिंग करवा रहे हैं। ऐसे में सोशल मीडिया यूजर्स ने गुजरात दंगे पर बनी फिल्म ‘परजानिया’ का मुद्दा भी उठा दिया है, जिसे बजरंग दल और अन्य राजनीतिक कारणों से गुजरात में बैन कर दिया था। फिंल्मों के राजनीतिकरण का मुद्दा संसद में भी उठ रहा है। कांग्रेस ने तो भाजपा पर द कश्मीर फाइल्स फिल्म का राजनीतिकरण का आरोप लगाकर उसे बैन कराने की मांग कर दी है।
यदि फिल्म बैन की बात करें तो राजनीतिक वजहों से बैन होने वाली पहली फिल्म ‘गोकुल शंकर’ थी। 1963 में इस फिल्म में महात्मा गांधी और नाथूराम गोडसे की कहानी दिखाई जानी थी। इसके बाद देश के बंटवारे पर बनी बलराज साहनी की फिल्म ‘गर्म हवा’ पर 1973 में पाबंदी लगाई गई थी। इस फिल्म में एक मुस्लिम परिवार के किस्से को दिखाया गया था, जिसके बाद विवाद शुरू हुआ था। फिर इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के दौरान 1975 में गुलजार की फिल्म ‘आंधी’ पर बैन लगाया तो बवाल हो गया, लेकिन 1977 में जब जनता पार्टी सत्ता में आई तो न सिर्फ इस फिल्म से बैन हटाया बल्कि इस फिल्म को प्रमोट भी किया।इसी तरह से इंदिरा और संजय गांधी के किस्से को दिखाने के लिए ‘किस्सा कुर्सी का’ फिल्म आई तो इसने इंदिरा सरकार की जड़ों को हिला दिया था। 1974 में अमृत नाहटा की इस फिल्म पर 1975 में रोक लगा दी गई थी। इसके प्रिंट भी जब्त कर लिए गए थे।








