चरण सिंह
समाजवाद के प्रणेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि जब सड़कें शांत हो जाती हैं तो संसद आवारा हो जाती है। उनके कहने का मतलब मात्र विपक्ष के आंदोलन से ही नहीं था उनका सीधा सा मतलब था कि सत्ता की खामियों को उजागर करने के साथ ही गलत निर्णयों का विरोध होना जरूरी है। वैसे भी लोकतंत्र के लिए विपक्ष का मजबूत होना जरूरी है। विपक्ष में विपक्षी पार्टियों के साथ ही लोकतंत्र के प्रहरी भी होते हैं। सत्ता के नकेल कसने की बड़ी जिम्मेदारी मीडिया की होती है। मीडिया का काम सत्ता की खामियों को जनता तक पहुंचाना और कमजोर की आवाज बनना होता है और मीडिया कर क्या रहा है ? सरकार की महिमामंडन और उपलब्धि गिनाने का काम कर रहा है।
दरअसल सरकार की उपलब्धियों का बखान करने के लिए तो पार्टियों के मुखपत्र और प्रवक्ता होते हैं। या फिर पार्टियां विज्ञापन देती हैं। जो काम पार्टी के मुखपत्र, प्रवक्ताओं का होता था वह मीडिया करेगा तो जनता भ्रमित होती है और देश का बड़ा नुकसान होता है। सरकार में तानाशाही बढ़ने के साथ ही जिम्मेदारी से बचने की प्रवत्ति बढ़ती है। यही सब वजह है कि केंद्र सरकार लगातार जनता की भावनाओं की बेकद्री कर रही है। कहने को तो सत्ता में बैठे लोग अपने सबसे बड़े राष्ट्रवादी बोलते हैं। आतंक का मुंह तोड़ जवाब देने की बात करते हैं। भारत माता की जय जयकार करते हैं पर जिस तरह से विभिन्न हमलों के विरोध में सरकार ने लीपापोती की है। लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश की है। उससे लगने लगा है कि जैसे सब कुछ सत्ता के लिए ही हो रहा हो।
22 अप्रैल को पहलगाम में आतंकी हमला होने पर जिस तरह से पीएम मोदी सऊदी अरब का दौरा रद्द कर भारत आ धमके थे। ऐसा लगा था कि जैसे अब पीएम मोदी पाकिस्तान के खिलाफ बड़ा कदम उठाएंगे। पर क्या हुआ ? सिंधु समझौता रद्द करने और पाकिस्तानियों का वीजा रद्द कर उन्हें पाकिस्तान भेजने के अलावा कुछ खास नहीं किया। सिंधु समझौते से भी कुछ खास दबाव पाकिस्तान पर नहीं पड़ा। शायद यही वजह रही होगी कि 1965 और 1971 दोनों ही युद्ध में सिंधु समझौता रद्द नहीं हुआ था। जिस तरह से पीएम मोदी ने तीनों सेनाओं के प्रमुख के साथ ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और सीडीएस के साथ मीटिंग की।
सेना प्रमुख को खुली छूट देने की बात सामने आई। तो लगा कि अब कुछ बड़ा होने वाला है। देश का मीडिया चला भी ऐसा ही रहा था। पर क्या हुआ जब कैबिनेट की बैठक हुई। देश किसी पाकिस्तान के खिलाफ बड़े ऐलान का इंतजार कर रहा था तो सूचना प्रसारण मंत्री अश्वनी वैष्णव से जातीय जनगणना होने की बात मीडिया से कहलवा दी गई। मतलब आठ दिन में सरकार ने जो मंथन किया उसका परिणाम जातीय जनगणना के रूप में आया। मतलब सरकार का उद्देश्य पहलगाम आतंकी हमले का बदला लेने से ज्यादा बिहार चुनाव जीतने में है। जातीय जनगणना पर बिहार चुनाव जीतने की बिसात एनडीए बिछा रहा है।
ऐसा नहीं है कि सरकार ने पहलगाम आतंकी हमले से ही लोगों का ध्यान हटाने के लिए जातीय जनगणना कराने की बात कही हो। 2019 में पुलवामा आतंकी हमले में सीआरपीएफ की 40 जवान शहीद हो गए। 300 किलोग्राम आरडीएक्स कहां से आया ? आज तक पता नहीं चला। बाराकोट एयर स्ट्राइक कर केंद्र सरकार ने वाहवाही लूट ली थी और आतंकी हमले का बदला लेने के नाम पर 2019 का लोकसभा चुनाव जीत लिया था। 2020 गलवान में चीनी सैनिकों के साथ खुनी झड़पों में 20 सैनिक शहीद हो गए।
केंद्र सरकार ने चीन के कुछ ऐप बंद कर लोगों का ध्यान गलवान से हटा दिया। अब जब पहलगाम आतंकी हमला हुआ तो बदला लेना तो भूल गए अब जातीय जनगणना ज्यादा जरुरी हो गई। क्योंकि बिहार चुनाव जातीय आंकड़ों पर होता है और चुनाव जो जीतना है। केंद्र सरकार ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं। एक से लोगों का ध्यान आतंकी हमले से भटका दिया है दूसरा बिहार चुनाव जीतने की पूरी व्यवस्था कर दी है।








