डॉ अंबेडकर ने खंड नंबर एक किताब का नाम भारत में जाति प्रथा एवं जाति प्रथा-उन्मूलन पृष्ठ संख्या 254 में उल्लेख किया है “कि यह अभिधारणा है कि राजनीतिक सुधार सामाजिक सुधार से पहले होना चाहिए तब तक एक निरर्थक प्रस्ताव रहता है जब तक कि विचार यह हो कि सरकार का काम उन लोगों की रक्षा करना होता है जिनके पास निहित अधिकार होते हैं और उनको दंड देना होता है जिनके पास कुछ नहीं होता दूसरा आधार जिस पर यह अभिधारणा के समर्थन में जोर दिया जा सकता है वह है कि वे राजनीतिक शक्ति प्राप्त करना चाहते हैं। वह प्रत्येक व्यक्ति को कानून द्वारा कुछ मूल अधिकार देना चाहते हैं। और ये तभी दिये जा सकते जब पहले राजनीतिक शक्ति प्राप्त कर ली जाए। यह बात निस्संदे ऊपर से बहुत युक्ति पूर्ण लगती है परंतु क्या इसमें कोई सार है मूल अधिकारों का विचार अमेरिकी संविधान में तथा क्रांतिकारी फ्रांस द्वारा निर्मित संविधान में उन्हें अधिनियमित करने के समय से सुवितित हो गया है। प्रत्येक व्यक्ति को मूल अधिकार प्रदान करने का विचार निसंदेह बहुत ही प्रशंसनीय है प्रश्न यह है कि उनको कारगर किस प्रकार बनाया जाए । प्रचलित मत यह है कि जब अधिकारों का विधि में अधिनियमन हो जाता है तो वह सुरक्षित हो जाते हैं यह फिर एक अनुचित मान्यता है। तो यह सिद्ध करता है की अधिकारों की रक्षा कानून के द्वारा नहीं,बल्कि समाज की सामाजिक तथा नैतिक चेतना द्वारा की जाती है। यदि सामाजिक चेतना ऐसी है कि वह उन अधिकारों को मान्यता देने के लिए तैयार है जिनका अधिनियमन कानून करता है, तो अधिकार सुरक्षित रहेंगे। परंतु यदि मूल अधिकारों का समुदाय द्वारा विरोध किया जाता है तो कोई कानून, कोई संसद, कोई न्यायपालिका, वास्तविक अर्थ में उनकी गारंटी नहीं दे सकती। अमेरिका में नीग्रो, जर्मन में यहूदीयो के लिए, भारत में अछूतों के लिए मूल अधिकारों की क्या उपयोगिता है बर्क ने कहा कि भीड़ व बहुसंख्या को दंड देने के लिए कोई तरीका नहीं मिलता। कानून एकाकी उदंड अपराधी को सजा दे सकता है।
यह यह उन लोगों के समूचे निकाय के विरुद्ध कभी करवाई नहीं कर सकता जो उसका विरोध करने का निश्चय कर लेते हैं।”वर्तमान समय में उपरोक्त कथन प्रासंगिक लगता है। वर्तमान समय में हर छोटा बड़ा नेता राजनीतिक परिवर्तन में दृढ़ विश्वास है वह राजनीति परिवर्तन से सामाजिक परिवर्तन कर देने में विश्वास रखता है यही कारण है पिछले कई दशकों से सामाजिक परिवर्तन की मुहिमें हाशिए पर धकेल दिया गया। वर्तमान समय में किसी भी पार्टी का कोई नेता हो वह यह भूल गया है जिन आदर्शों की बात कर रहा है उसके मूल में सामाजिक परिवर्तन प्रथम है वर्तमान समय में गांधी को आदर्श मान कर राजनीति करने वाले हो चाहे डॉक्टर लोहिया को आदर्श मानकर राजनीति करने वाले हो, चाहे मार्क्स को आदर्श मानकर साम्यवाद की राजनीति करने वाले हो चाहे डॉक्टर अंबेडकर व बुद्ध को आदर्श मान कर राजनीति करने वाले हो सभी लोगों ने सामाजिक परिवर्तन को पीछे धकेल दिया और सत्ता परिवर्तन को ही सामाजिक परिवर्तन मान लिया। कोई भी राजनीतिक परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन के बिना अधूरा है टिकाऊ नहीं होगा और ना ही लोक कल्याणकारी होगा सामाजिक परिवर्तन के बिना कोई भी बैचारिक (स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व पर आधारित)नेतृत्व पैदा नहीं होगा बिना वैचारिक परिवर्तन के राजनीतिक परिवर्तन हमेशा राजनीतिक परिवारवाद आधारित कथित नायक वाद को मजबूत करेगी ,देश के पूंजीपतियों के हितों को पूरा करेगी और जनता के विमर्श से वंचित होगी । और देश में वैचारिक संकट की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी इस स्थिति में सामाजिक कार्यक्रम को बढ़ावा देना भारतीय सोशलिस्ट मंच की प्राथमिकता है सामाजिक कार्यक्रम के माध्यम से नए नेतृत्व को जन्म दिया जाए वह नेतृत्व समावेशी दृष्टिकोण से लेस हो।






