आस्था का केंद्र बना शनिचरी बाजार शिव मंदिर

पंकज राकेश

सरैया (मुजफ्फरपुर)। मुजफ्फरपुर जिले के सरैया प्रखंड के रामपुर विश्वनाथ शनिचरी बाजार स्थित शिव मंदिर आसपास के क्षेत्रों में काफी चर्चित है। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में मांगी गई मन्नतें अवश्य पूरी होती है। स्थानीय लोगों के अनुसार इस मंदिर के निर्माण की कहानी भी काफी रोचक है। आज से करीब सौ साल पूर्व गांव के हीं लक्ष्मी गिरि ने मंदिर निर्माण का संकल्प लिया था। काफी गरीब परिवार से आने वाले लक्ष्मी गिरि ने हिम्मत दिखाते हुए न सिर्फ ठान लिया कि मंदिर बनाएंगे, बल्कि मंदिर निर्माण का नींव देकर घूम घूम कर चंदा इकट्ठा करने लगे। स्व. लक्ष्मी गिरि के भगिना महेंद्र गिरि ने बताया कि उस समय करीब 10 हजार रुपया मंदिर निर्माण के लिए मामा जी ने चंदा वसूल कर जमा किया था। उस समय वे मेहसी में एक लाला जी के यहां रहते थे। उस जमाने में 10 हजार रुपया का काफी महत्व था। लाला जी के यहां हीं चंदा का पैसा जमा करते थे। लाला जी ने लालच वश लक्ष्मी गिरि को जहर देकर मार दिया था और चंदा का सारा पैसा खा गए थे। उस हादसे के बाद सखींचन्द गिरि के उपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था। एकलौते पुत्र के निधन से घर वाले टूट चुके थे। कुछ वर्षों के बाद सखींचन्द गिरि की पत्नी धनवंती देवी ने अपने पुत्र के सपने को साकार करने के लिए अपने पति के साथ फिर से गांव गांव में घूमकर भिक्षाटन करना शुरू किया। कुछ पैसा इकट्ठा होने के बाद मिट्टी और ईंट की जोड़ाई से मंदिर का निर्माण कराया। उसके बाद विधिवत मंदिर में शिवलिंग की स्थापना हुई और पूजा पाठ शुरू हुआ। करीब 50 साल के बाद मंदिर जीर्ण शीर्ण अवस्था में चला गया था। जिसके बाद लक्ष्मी गिरि के भगिना, बुटन गिरि और महेंद्र गिरि ने जीर्णोद्धार की पहल शुरू किया। उस समय गांव की हीं एक महिला स्व. मंजूबाला का भरपूर सहयोग दोनों भाइयों को मिला। महिला होते हुए भी मंजूबाला ने लोगों को जागरूक किया और स्वयं भी आर्थिक रूप से सहयोग कर 2012 में मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। मंजूबाला द्वारा गांव के लोगों की किये जा रहे सहयोग को देखते हुए हीं उनके निधन के बाद ग्रामीणों ने उनको श्रद्धांजलि देने के उद्देश्य से एक कमिटी का गठन किया। जिसका नाम मंजूबाला ग्रामीण विकास समिति रखा। ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से जेनरेटर, साउंड, कुर्सी, टेबल, सामियाना, बर्तन, विछावन आदि को खरीदा। उसके बाद गांव के गरीब लोगों को निशुल्क सारी सामग्री मुहैया कराया जाता है।

कमिटी व मंदिर की बढ़ती लोकप्रियता एवं महाशिवरात्रि में लगने वाली मेला तथा सावन की सोमवारी में होने वाली भीड़ के कारण जगह कम पड़ रहा था। जिसको देखते हुए लक्ष्मी गिरि के भगिना बुटन गिरि व महेंद्र गिरि के पुत्रों ने 9 डिसमिल जमीन मंजूबाला ग्रामीण विकास समिति के नाम से दान कर दिया है। उस जमीन में एक पार्वती मंदिर, मंजूबाला जी का स्मारक एवं कार्यालय का निर्माण कार्य शुरू करने की दिशा में पहल शुरू हो गया है। अत्यंत निर्धन परिवार से आने वाले बुटन गिरि व महेंद्र गिरि के घर वालों 10 लाख से अधिक का जमीन दान किया जाना क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।

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