प्रसिद्ध दिव्यांग साहित्यकार सुरेश चन्द्र ‘सर्वहारा’ को काम आया आत्मविश्वास

कुछ बच्चे प्रारम्भ से ही शारीरिक और मानसिक विकलांगता का शिकार हो जाने के कारण बचपन के अतुलित आनन्द से वंचित रह जाते हैं। उनके लिए बचपन के ये मधुर क्षण, दूर के सुहाने ढोल बनकर रह जाते हैं। कुछ इसी प्रकार की कठोर परिस्थितियों का सामना सुरेश चन्द्र ‘सर्वहारा’ को भी करना पड़ा।

 

डॉ. सत्यवान सौरभ

सुरेश चन्द्र ‘सर्वहारा’ का जन्म 22 फरवरी सन् 1961 को झीलों की नगरी उदयपुर (राजस्थान) में हुआ। ये आत्म कथ्य में बताते है कि-“शुरू में इनका जीवन अभावों में ही सही, अच्छे भविष्य की आशा में चल रहा था कि परिवार पर एक वज्रपात हुआ। चार वर्ष की अवस्था में मुझे तेज बुखार आया घरेलू उपचार से जब तीन चार दिनों तक बुखार नहीं उतरा और मैं खड़ा होने में लड़खड़ाने लगा तो घर वालों को चिंता हुई। धीरे-धीरे शरीर के दाहिने हिस्से और गर्दन ने काम करना बन्द कर दिया। यह लकवे का आक्रमण था। बाद में उदयपुर की ही सरकारी अनुसंधान शाला में देशी इलाज़ चला जिससे गर्दन में कुछ सक्रियता आई किन्तु दाहिने हाथ और पैर में विशेष लाभ नहीं हुआ। इस घातक बीमारी ने मेरे बचपन की आज़ादी को हमेशा के लिए छीन लिया। दौड़ते-भागते पाँव अचानक थम गए।

दो-ढाई बर्ष बाद हमारा परिवार पिताजी की नियुक्ति के कारण कोटा जिले की छीपाबड़ौद तहसील में आ गया। कुछ समय बाद माँ भी वहीं सरकारी उच्च प्राथमिक विद्यालय में अध्यापिका के पद पर नियुक्त हो गई। यह मेरे लिए सौभाग्य का विषय रहा कि जब मैं सात वर्ष का हो गया तो कुछ सिखाने के उद्देश्य से माँ मुझे गोद में उठाकर विद्यालय ले जाने लगी। माँ कभी-कभी मुझे एक जगह बैठाकर भूल भी जाती थी। बाद में याद आने पर निर्धारित कक्षा-कक्ष में बैठाती। यह लड़कियों का विद्यालय था अतः मैं संकोचित ही रहता था। बालिकाओं के इसी विद्यालय से मैंने सातवीं तक की परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। यहाँ सभी सहपाठियों और शिक्षिकाओं का मेरे प्रति व्यवहार ममतामय एवं सहयोगी रहा। एक ही स्थान पर घंटों तक एक ही दशा में बैठे रहने से दाहिने पाँव के साथ बायाँ पैर भी जकड़ कर दुहरा हो गया। दायाँ हाथ निष्क्रिय हो गया, लेकिन बायें हाथ से लिखने की गति धीरे-धीरे बढ़ने लगी।

कक्षा नौ में मेरा प्रवेश, राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, छीपाबड़ौद में करवाया गया। वर्ष 1978 में दसवीं की परीक्षा कला वर्ग से 78 प्रतिशत अंकों से एवं 1979 में ग्यारहवीं कक्षा 79 प्रतिशत अंकों से उत्तीर्ण की। ग्यारहवीं की परीक्षा में माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, अजमेर (राज।) की योग्यता सूची में नवाँ स्थान प्राप्त किया। यह पढ़ाई चिमनी और लालटेन की रोशनी में ही पूरी हुई। आगामी उच्च शिक्षा के लिए कोटा महाविद्यालय में प्रवेश लिया। पिताजी के साथ अकेले, किराए के सीलन भरे कमरे में रहने, खाने-पीने की उचित व्यवस्था नहीं होने, बाहर खुली नालियों की सड़ांध के कारण स्वास्थ्य गिरने लगा और मुझे क्षय रोग ने घेर लिया। लम्बे समय तक स्वास्थ्य ठीक नहीं रहने के कारण स्वयं पाठी के तौर पर स्नातक तक की परीक्षा पास की। फिर स्नातकोत्तर परीक्षा संस्कृत विषय में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके बाद खाली समय में राजस्थान प्रशासनिक अधिनस्थ सेवा परीक्षा एवं महाविद्यालय के व्याख्याता पद हेतु राजस्थान लोक सेवा आयोग की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की, लेकिन शारीरिक विकलांगता अधिक होने के कारण साक्षात्कार में चयन नहीं हो सका।

नियोजन कार्यालय, कोटा के माध्यम से 11 सितम्बर 1987 को पश्चिम रेलवे, कोटा जंक्शन पर लेखा लिपिक के लिए मेरा चयन हो गया। कार्यस्थल आवास से दस किलोमीटर दूर था। आॅटोरिक्शा के माध्यम से आने जाने की व्यवस्था हुई। कार्यालय में एक तरफ़ से खुली कुर्सी का हत्था पकड़ कर बैठ व उतर जाता था। यह रेलवे की सेवा रुचि के अनुकूल नहीं होने पर भी आजीविका के लिए आवश्यक थी। अतः कर्म को ही पूजा समझकर अपना काम पूरे मनोयोग एवं निष्ठा के साथ किया। धीरे-धीरे विभागीय परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर अनुभाग अधिकारी (लेखा) के पद पर पदोन्नत हो गया। आगे और भी परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर सकता था, लेकिन उनके लिए अन्यत्र जाना पड़ता था जो मेरी क्षमताओं से बाहर था। अपने दायित्वों को भली-भाँति निभाने के कारण सहकर्मियों एवं अधिकारियों का भरपूर सहयोग मिला। जो भी अतिरिक्त कार्य दिया उसे बिना शिकायत सम्पन्न किया। कार्य भार की अधिकता से लेखन कार्य में शिथिलता अवश्य आई लेकिन लेखन का शौक बना रहा। सेवाकाल में ही रहकर किसी तरह एम. ए. (हिन्दी) की परीक्षा उत्तीर्ण की। रेल सेवा में रहते हुए मण्डल एवं मुख्यालय स्तर के कई पुरस्कार भी मिले।

वर्ष 2008 में बड़ी भाभी एवं वर्ष 2009 में भतीजे की असामयिक मृत्यु के कारण मन विचलित हो गया। शारीरिक दृष्टि से भी कमजोरी आने लगी थी अतः सेवा के 22 वर्ष पूर्ण होने पर 31 अक्टूबर 2009 को मैंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। अविवाहित होने से विशेष उत्तरदायित्व नहीं है, अतः पेंशन राशि से भली भाँति निर्वाहन हो जाता है। अब तक मेरे पच्चीस काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें बच्चों के लिए दस और बड़ों के लिए पन्द्रह काव्य संग्रह हैं। देश के विभिन्न भागों से प्रकाशित पत्रिकाओं में समय-समय पर मेरी कविताओं का प्रकाशन होता रहता है। देश की अनेक साहित्य संस्थाओं ने मेरे सर्जन का सम्मान करते हुए विविध सारस्वत सम्मानों से अलंकृत किया है। अब घर पर रहकर ही अध्ययन, लेखन चलता रहता है। मेरा मानना है कि मनुष्य को अपनी क्षमताओं के अनुरूप विषम परिस्थितियों से जूझते हुए जीवन में आगे बढ़ने का प्रयास करते रहना चाहिए। जीवन में आई कड़वाहटों के विष का स्वयं पान करके दूसरों को सद्व्यवहार का अमृत बाँटते रहना चाहिए। एक रास्ता बन्द होने पर सकारात्मक सोच के साथ अन्य विकल्पों की तलाश करते रहना चाहिए।”

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