“स्क्रॉल संस्कृति और अंधविश्वास: तकनीक के युग में मानसिक गुलामी”

डॉ. सत्यवान सौरभ

आज का युग तकनीक और सूचना का है। हर हाथ में मोबाइल है, हर जेब में इंटरनेट। लेकिन क्या वास्तव में हम ज़्यादा जागरूक हुए हैं, या बस स्क्रीन पर फिसलती उंगलियों के गुलाम बन गए हैं?

विज्ञापन, वीडियो, मीम्स, रील्स और टोटकों की अंतहीन दुनिया में लोग उलझे हुए हैं। “स्क्रॉल संस्कृति” ने हमारे ध्यान की डोर काट दी है। पहले जो बातें गहराई से समझी जाती थीं, वे अब 30 सेकेंड के शॉर्ट्स और 280 कैरेक्टर की पोस्ट में सिमट चुकी हैं।

हमारा मस्तिष्क सतही जानकारी से भर चुका है, लेकिन ज्ञान की गहराई खो चुकी है। एक समय था जब हम अख़बार में लंबा लेख पढ़ते थे, चर्चा करते थे, विचार करते थे। अब हम “स्क्रॉल” करते हैं – बिना रुके, बिना सोचे। नतीजा?

मानसिक थकावट, एकाकीपन, दिखावे की होड़ और डिजिटल अवसाद। लोग मुस्कुराते हुए सेल्फी पोस्ट करते हैं लेकिन भीतर से टूटे हुए होते हैं। ‘हैशटैग हैप्पी’ के पीछे एक गहरा खालीपन छिपा होता है।

सोशल मीडिया पर तथाकथित ‘इन्फ्लुएंसर’ अब जीवन के हर क्षेत्र में सलाह दे रहे हैं – स्वास्थ्य, शिक्षा, रिश्ते, यहां तक कि अध्यात्म भी। लेकिन इनका ज्ञान सतही है, और उद्देश्य? व्यूज और लाइक्स। जिन्हें खुद का मानसिक स्वास्थ्य संभालना नहीं आता, वे ‘मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट’ बन बैठे हैं। स्क्रॉल संस्कृति ने हमारी सोच को टुकड़ों में बाँट दिया है। एक तरफ ‘माइंडफुलनेस’ की बात हो रही है, दूसरी तरफ हम खुद से कटते जा रहे हैं।

सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करते हुए लोग घंटों बर्बाद कर देते हैं लेकिन वास्तविक संवाद की शक्ति खो चुके हैं। एक क्लिक में हजारों राय मिलती हैं, लेकिन उनकी वैधता कौन जाँचे?

तकनीकी युग में यह उम्मीद थी कि अंधविश्वास खत्म होगा। लेकिन अब ये ‘डिजिटल भूत-प्रेत’ बन चुके हैं। व्हाट्सएप पर: “रात को ये मंत्र ज़रूर पढ़ें…” फेसबुक पर: “इस फोटो को 5 लोगों को भेजो, नहीं तो दुर्भाग्य आएगा” यूट्यूब पर: “पितृ दोष हटाने का चमत्कारी उपाय”

क्या ये डिजिटल इंडिया है? या अंधविश्वास का नया किला?

शिक्षित लोग भी वैज्ञानिक सोच की बजाय “महादेव वाले अंकल” की वीडियो से समाधान खोज रहे हैं। लोग जीवन की अनिश्चितता से डरते हैं। इस डर में वे अंधविश्वास का सहारा लेते हैं, जिससे उन्हें भावनात्मक सुरक्षा का भ्रम मिलता है।

इंटरनेट पर जानकारी है, लेकिन छँटाई करने की क्षमता नहीं सिखाई गई। नतीजतन, झूठ भी सच लगता है।

हर कोई मोटिवेशनल स्पीकर, लाइफ कोच, एस्ट्रोलॉजर बन गया है। बिना प्रमाणिकता के। इनका मकसद है ट्रैफिक और पैसा। बचपन में सवाल करने पर डांटा जाता है – ‘श्रद्धा रखो।’ यही सोच वयस्क होते ही भ्रम फैलाने वाली सामग्री को ग्रहण करने में सक्षम बना देती है।

एक रिपोर्ट के अनुसार, औसतन भारतीय युवा रोज़ाना 4-6 घंटे सोशल मीडिया पर बिताता है। इस दौरान वह कितनी बार खुद से जुड़ता है?

स्क्रॉल करते हुए हम दूसरों की ज़िंदगी की झलक देखते हैं – उनकी पार्टियों, छुट्टियों, खुशियों की तस्वीरें – और अपनी ज़िंदगी से असंतुष्ट हो जाते हैं। यह तुलना भीतर एक बेचैनी और अवसाद को जन्म देती है। हमने जीवन को रील में बदल दिया है। जो दिखता है वही बिकता है – यही सोच आत्मा को खोखला कर रही है।

नींद की कमी, ध्यान भटकाव, सोशल एंग्जायटी, आत्म-संदेह, आत्महत्या की प्रवृत्ति – ये सब स्क्रॉल संस्कृति की भेंट चढ़ते मानसिक परिणाम हैं। कई शोधों में पाया गया है कि इंस्टाग्राम, टिकटॉक और फेसबुक का अधिक प्रयोग किशोरों और युवाओं में आत्म-संकोच और डिप्रेशन बढ़ाता है।

टीवी चैनल्स भी अब ‘रहस्यमयी मंदिर’, ‘भूतिया हवेली’, ‘ज्योतिष समाधान’ जैसे कार्यक्रमों से टीआरपी बटोरते हैं। विज्ञापन कंपनियाँ भी ‘राहु-केतु दोष’ जैसे शब्दों से डराकर उत्पाद बेचती हैं। जब संस्थान ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण के खिलाफ काम करें, तो जनता कैसे जागरूक हो?

रोज़ 1 घंटा मोबाइल-मुक्त समय बिताएं। सप्ताह में 1 दिन डिजिटल डिटॉक्स करें। रात को सोने से 1 घंटा पहले स्क्रीन न देखें। अधूरी जानकारी के आधार पर राय न बनाएं। हर बात पर शक नहीं, पर हर बात पर सोच ज़रूर हो। बच्चों को सवाल पूछने के लिए प्रोत्साहित करें। विज्ञान, लॉजिक और तथ्य आधारित शिक्षा प्रणाली अपनाएं।

स्कूलों में ‘सूचना की जाँच कैसे करें’ जैसे पाठ्यक्रम हों। ‘फैक्ट चेकिंग’ एक सामाजिक आदत बने। यू-ट्यूब पर देखी गई हर बात को सच न मानें। धर्म को आत्मा से जोड़ें, डर से नहीं। श्रद्धा का मतलब है समझना, अंधा पालन नहीं। तथाकथित चमत्कारी समाधानों की जांच-पड़ताल करें।

तकनीक ने हमें जोड़ने का दावा किया था, लेकिन आज हम सबसे कट चुके हैं — खुद से भी, और समाज से भी। हम स्क्रीन पर हैं, लेकिन जीवन से बाहर हैं। हम क्लिक करते हैं लेकिन महसूस नहीं करते।

सोशल मीडिया के इस कोलाहल में आत्मचिंतन की आवाज़ कहीं गुम हो गई है। आज सबसे बड़ी जरूरत है डिजिटल डिटॉक्स और मानसिक वैचारिक पुनर्जागरण की। वरना ये स्क्रॉल संस्कृति और अंधविश्वास मिलकर हमें उस अंधे युग में ले जाएंगे, जहां रोशनी होगी — सिर्फ स्क्रीन से निकलती — पर भीतर घुप्प अंधेरा होगा।

ज्ञान कभी स्क्रॉल में नहीं आता, वह ठहराव माँगता है। श्रद्धा कभी अंधी नहीं होती, वह तर्क से ताकत पाती है। और आज के समय में सबसे बड़ा विद्रोह है — सोचना।

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