विपक्ष के लिए आरएसएस का एजेंडा है मोदी-योगी से भी बड़ी चुनौती!

चरण सिंह राजपूत

पांच राज्यों में से चार राज्यों में जीत का परचम लहराने के बाद भाजपा से निपटना विपक्ष के लिए और मुश्किल हो गया है। आरएसएस और भाजपा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विकल्प माने जाने वाले योगी आदित्यनाथ के फिर से सरकार बना लेने के बाद विपक्ष के लिए मोदी से बड़ी चुनौती योगी आदित्यनाथ हो गये हैं। भले ही योगी आदित्यनाथ आरएसएस के प्रचारक न रहे हों पर आरएसएस की पहली पसंद योगी ही हैं। हिन्दुत्व के बल पर लगातार जीत का परचम लहरा रही भाजपा में आज की तारीख में योगी आदित्यनाथ नरेंद्र मोदी और अमित शाह से बड़ा हिन्दुत्व चेहरा माना जा रहा है। भाजपा की इस जीत के बाद आरएसएस अपने एजेंडे को लागू करने के लिए तैयारी में लग चुका है। देश के मीडिया को हाइजेक करने के बाद आरएसएस के एजेंडे को लागू करने में थोड़ा बहुत रोड़ा विदेशी मीडिया है। आरएसएस ने अब इस डर को भी निकालने की तैयारी कर ली है। आरएसएस ने इस अभियान को विदेशियों के देश के लोगों में पैदा की जा रही गलतफहमी को दूर करने का नाम दिया गया है।दरअसल संघ के लिए शीर्ष निर्णय लेने वाली संस्था अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की अहमदाबाद में हुई बैठक में इस तरह की बात निकल कर सामने आई है। आरएसएस ने यह प्रचार करना शुरू कर दिया है कि बैठक में भारतीय समाज, उसके हिंदू समुदाय, उसके इतिहास, संस्कृति और जीवन शैली की एक सच्ची तस्वीर पेश करने के तरीकों पर चर्चा की गई है। मतलब यह अभियान भी आरएसएस एजेंडे का एक हिस्सा है। यह भी अपने आप में सोचने का विषय है कि जब भाजपा चार राज्यों में जीत का जश्न मना रही है तो भाजपा शासित राज्य मध्य प्रदेश के होशंगाबाद के नर्मदापुरम में जिला मुख्यालय से लगभग 40 किमी दूर स्थित एक 50 साल पुरानी दरगाह को भगवा रंग से रंग दिया गया।
यह भी जमीनी हकीकत है कि विपक्ष भले ही भाजपा को चुनौती मानकर चल रहा हो पर देश के सामने असली चुनौती आरएएस का एजेंडा है। देश के लिए पंजाब में जीत हासिल करने के बाद भले ही आम आदमी पार्टी अपने को भाजपा का विकल्प देने में लग गई हो, भले ही कांग्रेस में २०२४ का चुनाव जीतकर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की तैयारी चल रही हो पर आरएसएस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,म गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपना एजेंडा लागू कराने में लग गया है। भले ही राजनीतिक मैनेजर माने जाने वाले प्रशांत किशोर ने पांच राज्यों की जीत से आम चुनाव से कोई मतलब न होने की बात कही हो पर जिस तरह से उत्तर प्रदेश में लहर के बावजूद अखिलेश यादव की सरकार नहीं बनी है, ऐसे में आरएसएस के एजेंडे के और प्रभावी होने के आसार बन गए हैं। जिस तरह से सीडब्ल्यूसी की बैठक में सोनिया गांधी समेत दूसरे कांग्रेस नेता निराश दिखाई दिये उसके आधार पर कहा जा सकता है कि आने वाले समय में कांग्रेस भी बीजेपी और आरएसएस के सामने कमजोर पड़ने वाली है। विपक्ष को यह समझ लेना होगा कि आरएसएस के एजेंडे पर चलकर देश की सत्ता हथियाने वाली आज की भाजपा उतनी ही मजबूत है जितनी आजादी के बाद कांग्रेस थी। जिस पैटर्न पर 2019 को आम चुनाव लड़ा गया जिस तरह से ये पांच राज्यों के चुनाव लड़े गए उस पैटर्न से बीजेपी और आरएसएस से पार बसाना नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और आरएसएस के सामने चुनौती पेश करने के लिए बंगलों और वातानुकूलित कमरों की राजनीति छोड़कर जनहित में सड़कों पर आना होगा। जमीनी संघर्ष करना होगा। जिस तरह से कांग्रेस से अलग होकर डॉ. राम मनोहर लोहिया, लोक नारायण जयप्रकाश और आचार्य नरेंद्र देव ने जमीनी राजनीति की थी उस राजनीति को अमल में लाना होगा। जेपी क्रांति की तर्ज पर जन आंदोलन खड़ा करना होगा।

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