ओवैसी को ‘ना’ कहने के बिना दूर किया
मुस्लिम वोट बैंक बचाने की कवायद तेज़
पटना/नई दिल्ली। दीपक कुमार तिवारी।
बिहार की राजनीति में एक बार फिर लालू यादव की रणनीति चर्चा में है। वक्फ बोर्ड संशोधन बिल के संसद में पास होने के बाद भले ही सत्तारूढ़ दल ने राहत की सांस ली हो, लेकिन असल सियासी हलचल विपक्ष के पाले में दिख रही है। खासकर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और उनके MY समीकरण (मुस्लिम-यादव गठजोड़) को लेकर जो सियासी संदेश उन्होंने दिया है, वह ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के लिए एक कड़ा इशारा है।
हाल ही में लालू यादव ने एआईएमआईएम को सीधे-सीधे ‘ना’ नहीं कहा, लेकिन अपने सांसदों को त्याग और सेकुलर एकता का पाठ पढ़ाकर साफ कर दिया कि गठबंधन की कुंजी उनके ही पास है। राजद की ओर से इस बार मुस्लिम मतदाताओं को लेकर ‘वोट बंटवारे के खतरे’ का नैरेटिव जोरशोर से उठाया गया है।
लालू यादव की नई पिच: धर्मनिरपेक्षता के नाम पर ‘ना’
राजद प्रवक्ता प्रो. मनोज झा का बयान – “अगर ओवैसी साहब भाजपा को हराना चाहते हैं, तो चुनाव ही न लड़ें” – ने इस पूरे विवाद को एक नया मोड़ दे दिया है। झा ने कहा कि चूंकि एआईएमआईएम का आधार हैदराबाद में है, इसलिए अगर उनकी मंशा वाकई सांप्रदायिक ताकतों को हराने की है, तो वह बिहार में चुनाव न लड़कर भी इसमें भूमिका निभा सकते हैं।
राजद की इस रणनीति के दो बड़े लक्ष्य दिख रहे हैं:
1. मुस्लिम वोट बैंक को एकजुट रखना, खासकर सीमांचल क्षेत्र में।
2. एआईएमआईएम को भाजपा की ‘बी टीम’ के तौर पर स्थापित करना, ताकि ओवैसी को नैतिक दबाव में लाया जा सके।
सीमांचल में नई सियासी जंग:
पिछले विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने सीमांचल की पांच सीटें जीतकर साबित कर दिया कि वह मुस्लिम मतों में सेंधमारी कर सकती है। इसी को लेकर राजद अब सजग हो गया है। एआईएमआईएम ने महागठबंधन में शामिल होने की पेशकश भी की थी, लेकिन लालू यादव की तरफ से कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिला।
अब ओवैसी के पास दो ही विकल्प हैं:
या तो अकेले लड़ें, जिससे ‘बी टीम’ की छवि और मजबूत हो।
या किसी थर्ड फ्रंट के साथ जाएं, जो फिलहाल स्पष्ट नहीं है।
थर्ड फ्रंट की संभावना और PK फैक्टर:
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर ओवैसी को सीमांचल में राजनीतिक जमीन बरकरार रखनी है, तो उन्हें किसी गठबंधन की छांव जरूरी होगी। इस क्रम में प्रशांत किशोर की जनसुराज एक विकल्प के रूप में सामने आ सकती है, लेकिन यहां भी अड़चन है — जनसुराज अभी तक किसी दल से गठबंधन नहीं करता, बल्कि छोटे दलों को मर्ज करता है, जैसा आरसीपी सिंह की पार्टी के साथ हुआ।
अगर ओवैसी इस जोखिम से बचते हैं और विधानसभा चुनाव नहीं लड़ते, तो बिहार में उनका राजनीतिक आधार धीरे-धीरे खत्म हो सकता है। वहीं, अगर चुनाव लड़ते हैं और मुस्लिम वोट बंटते हैं, तो राजद सीमांचल की कई सीटें गंवा सकती है, लेकिन सियासी ठीकरा फिर एआईएमआईएम पर ही फूटेगा।
🔍 राजनीतिक विश्लेषण:पहलू स्थिति
मुस्लिम वोट बैंक राजद का मजबूत आधार, बंटवारे की चिंता
ओवैसी की रणनीति गठबंधन की तलाश, लेकिन विकल्प सीमित
राजद की चाल नैतिक दबाव बनाकर बाहर करना, राजनीतिक संवाद में “ना” कहना
PK और जनसुराज गठबंधन नहीं, विलय की नीति; असदुद्दीन के लिए मुश्किल राह
क्या आगे हो सकता है?
ओवैसी सीमांचल में कुछ सीटों पर प्रत्याशी उतारकर सीमित लड़ाई लड़ सकते हैं।
जनसुराज जैसे नए विकल्पों से गठजोड़ की कोशिश हो सकती है।
या फिर खुद को बिहार की राजनीति से कुछ समय के लिए अलग रख सकते हैं।
लालू यादव भले ही सीधे टकराव से बच रहे हों, लेकिन राजनीतिक ‘ना’ कहने का उनका तरीका एआईएमआईएम के लिए सियासी चुनौती बन गया है। आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा कि ओवैसी गठबंधन की छांव तलाशते हैं या अपनी राह खुद बनाते हैं।








