चरण सिंह
विपक्ष भारत में नेपाल जैसे क्रांति की बात कर रहा है पर विपक्ष की ओर से ऐसा कोई आंदोलन भी देखने को नहीं मिला कि जिसमें क्रांति तो दूर की बात है बदलाव की भी कोई झलक दिखाई पड़ी हो। विपक्ष की स्थिति यह है कि आंदोलन के नारे भी लगने बंद हो गए हैं। उनकी जगह चाटुकारिता के नारों ने ले ली है। विभिन्न पार्टियों में कार्यकर्ता आगे बढ़ने के लिए काम नहीं बल्कि शॉर्टकट रास्ता अपना रहे हैं। भले ही उसके लिए उन्हें कितना भी गिरना पड़े। भारत में तो नेताओं ने ऐसा माहौल बना दिया है कि क्रांति तो बहुत दूर की बात है आंदोलन होने ही बंद होते जा रहे हैं। जहां तक नेताओं को टारगेट करने की बात है तो लोगों में इतनी चाटुकारिता और गुलामी है कि नेताओं के चक्कर में आपस में ही लड़ मरें।
किसी समय विपक्ष के कार्यक्रमों में हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है, इंकलाब जिंदाबाद, जुल्मी जब तक जुल्म करेगा सत्ता के गलियारे से चप्पा चप्पा गूंज उठेगा इंकलाब के नारों की गूंज दिखाई पड़ती थी। पर आज की तारीख में ये क्रांतिकारी नारे गौण हो रहे हैं। इनकी जगह चाटुकारिता के नारों ने ले ली है।
मोदी मोदी, राहुल राहुल, अखिलेश अखिलेश, पार्टी के मुखिया को लेकर जिंदाबाद नारे लगाए जाने लगे। नेता भी जेब के नेताओं और कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाते हैं। यह स्थिति समाज में पैदा हो गई है। कॉलेज, कार्यालयों, घरों सभी जगह तो चाटुकारिता और चापलूसी का माहौल है। गलत बात के विरोध की प्रवृत्ति तो माता पिता भी अपने बच्चों में पैदा नहीं होने देते। ऐसे क्या क्रांति होगी ?
क्रांति देश में उस दिन होगी जब लोगों के सामने भूखे मरने की नौबत आ जाएगी। युवाओं के पास किसी भी तरह का रोजगार नहीं होगा। जब तक फ्री का राशन लोगों को मिलता रहेगा तब तक देश में क्रांति की बात सोचना बेमानी है। देश में जातीय संघर्ष हो सकता है। दंगे हो सकते हैं पर क्रांति की दूर दूर तक कोई संभावना नहीं। ऐसा नहीं कि देश में क्रांति जैसे हालात नहीं हैं।
दरअसल क्रांति होने की संभावना इसलिए कम है क्योंकि विपक्ष के नेता सत्ता लोभी हैं तो आम लोग स्वार्थी। नेताओं को किसी तरह से बस सत्ता मिल जाये लोगों का अपना काम। वैसे भी विपक्ष के अधिकतर दल किसी न किसी रूप में सत्ता में रहे हैं। ये नेता देश और समाज के लिए संघर्ष करने को तैयार नहीं। न ही इन्हें देश और समाज की कोई चिंता है। बस सत्ता चाहिए।
यह भी जमीनी हकीकत है कि देश में क्रांति का माहौल बनता भी है तो ये नेता क्रांतिकारियों को आपस में ही लड़ा देंगे। जाति और धर्म को लेकर युवाओं में मन में जो जहर घोला हुआ है। एक जली हुई तिल्ली दिखाने की जरुरत है। युवाओं का हुजूम आपस में ही लड़ने लगेगा। इस समय यह चर्चा तेजी से चल रही है कि यदि विपक्ष बिहार हार जाता है तो विपक्ष मोदी सरकार पर वोट चोरी का आरोप लगाकर सड़कों पर उतर सकता है।
विपक्ष का प्रयास होगा कि आंदोलन को जन आंदोलन का रूप दे दिया जाए। यदि ऐसा होता है तो इसके विरोध में मोदी के समर्थक भी सड़कों पर उतर सकते हैं। फिर क्या होगा किसी को बताने की जरुरत नहीं है। बीजेपी के समर्थक बीजेपी विरोधियों को टारगेट कर सकते हैं। मतलब भारत में नेताओं को निशाना बनाने की कोई गुंजाइश नहीं है। यह भी जमीनी हकीकत है कि लोग आपस में लड़ मरेंगे। जिस दिन नेताओं को टारगेट बनाया जाएगा तो सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों एक हो जाएंगे।
भारत में नेताओं का कुछ नहीं बिगड़ने जा रहा है। जनता में गलत के खिलाफ लड़ने वाले लोग है कहां ? जो थोड़े बहुत हैं उन्हें काम कौन करने कौन देता है। जिनके लिए ये लड़ते हैं, उनको ही इनकी कद्र नहीं रहती। हर क्षेत्र में ईमानदार आदमी को ही तंग किया जाता है। यदि जनता जाति-धर्म और स्वार्थ की राजनीति से बाहर निकल आ जाए तो देश में क्रांति हो सकती है और नेताओं को भी सुधारा सकता है। क्रांति देश में एक ही सूरत में हो सकती है जब आज़ादी की लड़ाई की तरह लोगों में देशभक्ति कूट कूट कर भरी हो। सब कुछ छोड़कर देश और समाज के प्रति समर्पण भाव का जूनून हो।







