Professor JPS Oberoi : शिक्षा शास्त्री से अधिक, इंसानियत के पैरोकार 

राजकुमार जैन

प्रोफेसर जेपीएस ओबेरॉय, के इंतकाल की खबर मिली, तो उनसे जुड़ी तकरीबन 55 साल से पुरानी यादों की तस्वीर आंखों के सामने घूमने लगी। प्रोफेसर ओबेरॉय दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में स्थित सोशियोलॉजी डिपार्टमेंट में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थे। तथा साथ ही साथ दिल्ली विश्वविद्यालय के  प्रॉक्टर पद की जिम्मेदारी भी वे निभाते थे। सोशलिस्टों का युवा संगठन ‘समाजवादी युजन सभा’ उन दिनों विश्वविद्यालय में सतत आंदोलनकारी के रूप में पहचाना जाता था। छात्रों की समस्याओं  पर मुसलसल प्रदर्शन, सभा, मोर्चा, घेराव इत्यादि चलता रहता था। प्रॉक्टर होने के नाते इन सब गतिविधियों से उनका जुड़ा रहना एक सामान्य प्रक्रिया थी।  प्रोफेसर ओबेरॉय बुनियादी रूप से  मानवतावादी, सद्भाव, सह- अस्तित्व, लोकतांत्रिक व्यवस्था में यकीन रखते थे।  धरने प्रदर्शन के दौरान कई बार भगदड़ में साथ दौड़ते हुए अप्रिय सीन भी उभर जाते थे। तनाव के उन क्षणों में एक अभिभावक के रूप में कैंपस के कॉफी हाउस में आंदोलनकारी छात्रों के समूह में पहुंचकर बहुत ही सहज ढंग से समझाते थे, उनका बर्ताव अपने पन से भरा होता था।  जिस कारण बहुत जल्द ही समस्या का समाधान हो जाता था।
मजहबी दुनियादारी से उनको सख्त परहेज था। शुरुआत के दिनों में वे बिना केश वाले  सिख थे परंतु 1984 में हुए सिखों के कत्लेआम से मर्माहत होकर  प्रायश्चित के रूप में उन्होंने पुन: केश रखकर पगड़ी बांधनी शुरू कर दी थी।
मेरे से खास तौर से उनकी निकटता थी। कॉलेज में मेरी नियुक्ति के वक्त वे वॉइस चांसलर के नुमाइंदे के रूप सिलेक्शन कमेटी के सदस्य भी थे। सिलेक्शन बोर्ड में जब मेरी  नियुक्ति के प्रश्न पर चर्चा हो रही थी तो एक माननीय सदस्य ने यह कहते हुए आपत्ति दर्ज की कि यह व्यक्ति तो मूल्त आंदोलनकारी है। मुझे बाद में बोर्ड के एक सदस्य ने बताया की प्रोफेसर ओबेरॉय ने कहां कि उसकी शैक्षणिक योग्यता को देखिए, ऐसे व्यक्ति के अपॉइंटमेंट से विश्वविद्यालय शैक्षणिक रूप से एनरिच होगा। विद्यार्थियों की हर तरह से मदद करने में सदैव तत्पर रहने वाले, दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स की कैंटीन में जब हम समाजवादियों ललित मोहन गौतम रविंद्र मनचंदा रमाशंकर सिंह विजय प्रताप नानक चंद की टीम बैठी होती थी तो प्रोफ़ेसर ओबेरॉय बिना किसी संकोच के हमारे बीच में बैठकर बड़े खुलूश और मोहब्बत के साथ मुल्क की सियासत के बारे में चर्चा करते थे। तथा कॉफी का बिल भी चुका दिया करते थे।
यूनिवर्सिटी कैंपस में हाफ पैंट पहनकर साइकिल पर घूमते हुए प्रोफेसर ओबेरॉय की याद जीवन भर बनी रहेगी। मैं उनको सिराज-एं अकीदत पेश करता हूं ।

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