राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने आस्था को बनाया प्रोपेगेंडा!

बंदना पाण्डेय 

देश भर से जब करोड़ो लोग कुंभ में स्नान हेतु एक जगह इकट्ठा हो रहे है तो कुछ नेता इसे आस्था, धर्म और परंपरा न समझ कर इसे राजनीति का अड्डा समझ रहे है 144 साल बाद महाकुंभ लगा है भ्रांति फैला कर लोगों को भ्रमित करके अपना चेहरा और राजनीति चमकाना चाह रहे है, कुंभ की व्यवस्था और आम जनमानस की व्यवस्था की जगह VIP कल्चर और अपने चेहरे और राजनीति चमकाने पर केंद्रित कर रहे है। कुंभ सनातनियों के लिये आस्था का पर्व है लेकिन सरकार ने इसे सरकारी प्रोपेगेंडा बना दिया है।
144 साल बाद महाकुंभ लगा यह अर्ध सत्य है, खुद संत कह रहे हैं ये भ्रांति फैलाई गई। इसप्रकार की भ्रांति ख़ुद सरकार फैला कर लोगों के आस्था के साथ खिलवाड़ या विश्वासघात कर रही है, लोगों को लग रहा है कई पीढ़ियों बाद ऐसा कुंभ आता है। जिसके कारण करोड़ों लोग प्रयागराज की ओर भाग रहे हैं। सरकार की पूरी व्यवस्था न होने के कारण भगदड़ मच रही है, लेकिन सरकार मौन है क्योंकि सरकार को कुंभ की व्यवस्था से ज़्यादा कुंभ की क्रेडिट लेकर अपने राजनीतिक चेहरे को चमकाना है। कितने प्रतिदिन नहा रहे है सरकार प्रतिदिन आकड़े जारी कर के स्वयं अपनी पीठ थपथपा रही है लेकिन उसी सरकार को कुंभ में अव्यवस्था के कारण कितनी जगह भगदड़ हुई है ये तक पता नहीं चल पा रहा है भगदड़ में मरने वालों का आकड़ा कैसे पता चलेगा। इस सरकार के लापरवाह सिस्टम ने कुंभ की श्रद्धा को अव्यवस्था के कारण मौत का खतरा बना दिया है। इससे पहले भी प्रत्येक 12 वर्ष बाद कुंभ लगता रहा है तब भी भीड़ होती थी उस समय कुंभ में अपनों से बिछड़ने का डर होता था इस प्रकार मरने का खौप कभी मन में नहीं आया था।
सरकारी तंत्र इतना लापरवाह हो गया है कि भगदड़ केवल कुंभ में ही नहीं, कभी भी कही हो जा रही है नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर कुंभ में जाने वाले यात्रियों की भीड़ बढी तो भगदड़ मच गई हर तरफ चीख, हर तरफ घायल और लाशें की लाइन लग गई। कुंभ के साथ साथ अब कुंभ से हज़ार किलोमीटर दूर कुंभ में जाने वाली भीड़ इस सरकार से सँभाली नहीं जा रही है तो कुंभ की व्यवस्था इनसे क्या सँभाली जायेगी? कुंभ की व्यवस्था तो ख़ुद जनता और भगवान सम्भाल रहे है। अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा में आस्था को प्रोपेगेंडा बनाया जा रहा है, जनता की जान से खेला जा रहा है।
सरकार और उनके पालतू मीडिया द्वारा पहले किसी भी घटना को छिपाने का काम किया जा रहा है प्रयागराज में भगदड़ हुई तो उसे छिपाने के लिए नकारा गया ठीक उसी प्रकार नई दिल्ली में भी रेलमंत्रालय द्वारा भगदड़ न मानकर ‘भगदड़ जैसी स्थिति’ कहना शुरू किया लेकिन पोल खुलने पर स्वीकार किया।
‘भगदड़ जैसी स्थिति’ कुछ नहीं होती है या तो भगदड़ होती है या भगदड़ नहीं होती है। ‘भगदड़ जैसी स्थिति’ वाक्य ये ग़ुमराह करने और सत्य को छिपाने के लिये किया जाता है जो बहुत ही निंदनीय है।
जिस भी अव्यवस्था और नाकामी को छिपाने या नकारने की कोशिश होने लगती है उसे सुधारने की गुंजाइश ही नहीं बचती है।
वहीं इस कुंभ में कुछ विपक्षी राजनेता भी अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने में लगे हुए है, सत्ता पक्ष के पीआर को देख ये लोग बुरी तरह से बौखला हुए है और कुंभ पर हो रहे राजनीतिक पीआर की जगह कुंभ पर ऊलजुलूल बकने लगे है कि कुंभ स्नान करने से गरीबी दूर नहीं होगी इस तरह का बयान दे रहे है।
कुंभ में आने वाला कोई भी व्यक्ति यहाँ ग़रीबी दूर हो जाये इस कामना से नहीं आता है, वह अपनी आस्था श्रद्धा से अपने द्वारा अनजाने में किये गये कर्म जिसे पाप भी कह सकते है उससे मुक्ति पाने या कहे कि धुलने यहाँ आ रहा है। यदि हिंदुओं की आस्था श्रद्धा का सम्मान नहीं कर सकते तो कम से कम अपमान तो मत कीजिए।
आने जाने से लेकर कुंभ तक में भारी अव्यवस्था, महंगाई, भ्रष्टाचार भयंकर भीड़ इत्यादि सब के बावजूद यदि करोड़ो लोग संगम स्नान में आ रहे है तो यह हमारी आस्था है श्रद्धा है ,हिंदू सनातन धर्म में गंगा स्नान और कुंभ नहाना एक पवित्र परंपरा मानी जाती है जो सदियों से है।
वर्तमान में हिंदू समाज कई तरह की जातियों में बंटा हुआ है जहाँ जातिगत भेदभाव ऊंच नीच छुआछूत आदि आज भी कई जगह गाँव कस्बों में देखी जा सकती है , लेकिन कुंभ के इस पवित्र मेले में यहाँ हर कोई बराबर है, कुंभ में जाति ढूँढने से भी नहीं मिलेगी क्यूंकि संगम में एक ही जगह सब एक साथ नहा रहे है, एक ही भंडारे में खा पी रहे है, और साथ में उठ बैठ रहे है।
यहाँ कुंभ में आने वाला हरेक श्रद्धालु स्वयं को हिंदू समझ कर आ रहा है , वो अपने मन से अपनी जाति को यहाँ संगम स्थल पर भूल चुका है।

 

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