ऑक्सफैम रिपोर्ट : भारत के 98 अरबपतियों के पास 55.5 करोड़ लोगों के बराबर संपत्ति, 84 प्रतिशत परिवारों की आय घटी 

डॉ. सिद्धार्थ 
नई दिल्ली| जहां एक ओर आरएसएस-भाजपा ने पूरे देश में एक धार्मिक उन्मादी माहौल खड़ा करके लोगों को हिंदू-मुसलमान में बुरी तरह उलझा दिया है, वहीं दूसरी तरफ देश के चंद अरबपति देश की संपत्ति पर बहुत ही तेजी से कब्जा जमा रहे हैं और देश की बहुसंख्यक आबादी की आय में गिरावट हो रही है। इन तथ्यों की पुष्टि  ऑक्सफैम की ‘इनइक्वैलिटी किल्स’ रिपोर्ट से होती है। यह रिपोर्ट वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दावोस एजेंडा से पहले जारी की गई। भारत के संदर्भ में रिपोर्ट के निष्कर्ष यह बताते हैं कि कोरोना काल एक ओर भारत के चंद अमीरों के लिए अंधाधुंध कमाई का अवसर बनकर आया है, दूसरी तरफ भारत की बहुसंख्यक आबादी के लिए आर्थिक बर्बादी और तबाही लेकर आया है।
यह रिपोर्ट बताती है कि 2021 में भारत के सबसे सौ अमीर लोगों की सामूहिक संपत्ति रिकॉर्ड 57.3 लाख करोड़ रूपए के उच्च स्तर पर पहुंच गई है। इस वृद्धि का लगभग पांचवां हिस्सा अकेले अडानी घराने के हिस्से में गया है। आर्थिक गैर-बराबरी की स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि इस देश में 55.5 करोड़ लोगों जितनी कुल संपत्ति है, उतनी संपत्ति सिर्फ इस देश के 98 अरबपतियों की है यानी देश के 55.5 करोड़ लोगों की कुल जितनी आर्थिक हैसियत है, उतनी अकेले 98 लोगों की है। कोरोना काल के दौरान सिर्फ एक साल (सन् 2021) में 40 नए अरबति पैदा हुए हैं और इस दौरान अरबपतियों की संख्या 102 से बढ़कर 142 हो गई है यानी अरबपतियों की संख्या में 39 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

142 अरबपतियों में दो अरबपतियों अडानी और अंबानी की संपत्ति तो एक साल में कई गुना बढ़ गई है। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के अमीरों की सूची में गौतम अडानी 24 वें स्थान पर हैं, जबकि भारत में दूसरे स्थान पर हैं, उनकी कुल संपत्ति 2021 में बढ़कर 50.5 अरब डॉलर हो गई है, जबकि 2020 में यह सिर्फ 8.9 अरब डॉलर थी। इस तरह उनकी संपत्ति में एक साल (2021) में आठ गुना की बढ़ोत्तरी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार इसी समय सन् 2021 में मुकेश अंबानी की संपत्ति दोगुनी होकर 85.5 अरब डॉलर हो गई है, जबकि 2020 में 36.8 अरब डॉलर थी। रिपोर्ट बताती है कि चीन और अमेरिका के बाद भारत में सबसे अधिक अरबपति हैं यह रिपोर्ट यह भी बताती है कि देश के सिर्फ 10 सबसे अमीर लोगों की संपत्ति 25 साल तक देश के हर बच्चे को स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा देने के लिए पर्याप्त है। जहां एक ओर अरबतियों की संख्या और उनकी संपत्ति दोनों में बेतहाशा वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी ओर देश के बहुसंख्यक आबादी की आय में गिरावट हुई, इसके साथ ही सरकार द्वारा व्यापक आबादी के कल्याण के लिए किए जा रहे खर्चे में तेजी से कमी आई है। रिपोर्ट बताती है कि भारत के 84 प्रतिशत परिवारों की आय घटी है, बचे हुए 16 प्रतिशत में 13 प्रतिशत लोगों की आय स्थिर है यानी सिर्फ 3 प्रतिशत लोगों की आय इस दौरान देश में बढ़ी है। जिन 13 प्रतिशत लोगों की आय स्थिर है, यदि मुद्रास्फीति के संदर्भ में देखें तो उनकी भी आय घटी है यानी देश के 97 प्रतिशत लोग पहले से बदतर जिंदगी जीने को अभिशप्त हुए हैं। रिपोर्ट बताती है कि इसी बीच 4.6 करोड़ भारतीय भयानक गरीबी के शिकार हुए हैं, जो विश्व में गरीबी के शिकार आबादी के करीब आधे हैं। ऐसे समय में जब 84 प्रतिशत परिवारों की आय घटी हो, तब यह उम्मीद की जाती है कि सरकार लोगों के कल्याण के मद में ज्यादा खर्च करेगी, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार हुआ इसके उलट है। वित्तीय वर्ष 2020-2021 के दौरान ( संशोधित अनुमान) स्वास्थ्य बजट में 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, यानी सरकारों ने स्वास्थ्य पर खर्चा बढ़ाया नहीं, बल्कि घटा दिया। यही स्थिति शिक्षा के मद में भी देखने को मिली। इस रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा के आवंटन में 6 प्रतिशत की कटौती हुई। इसका अर्थ है कि शिक्षा और स्वास्थ्य की हालत और आम आदमी की उस तक पहुंच बद से बदतर हुई है। इतना ही नहीं सामाजिक सुरक्षा योजनाओं  के लिए केंद्रीय बजट के आवंटन में भी बड़े पैमाने पर गिरावट आई है। कुल  बजटीय आवंटन 1.5 प्रतिशत से गिरकर 0.6 प्रतिशत हो गया है।
84 प्रतिशत लोगों की आय में गिरावट, सरकार द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के खर्चों के मदों में भारी कटौती ऐसे समय में हो रही है, जब बेरोजगारी सारे रिकॉर्ड तोड़ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी की दर करीब 15 प्रतिशत है। गरीबी, बेरोजगारी और आय में गिरावट बहुसंख्यक भारतीयों की कमर तोड़ दी है।
ऐसे समय में जब अमीरों की संख्या और उनकी संपत्ति में बेतहाशा वृद्धि हो रही है और बहुसंख्य लोगों की आय घट रही, तब उम्मीद की जाती है कि सरकार अमीरों पर टैक्स लगाकर गरीबों को राहत मुहैया कराएगी, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार हुआ, इसके उलट है। रिपोर्ट बताती है कि भारत की केंद्र सरकार ने बीते चार सालों में कार्पोरेट टैक्स में कमी की है और अप्रत्यक्ष करों ( जनता की रोजमर्रा की चीजों पर टैक्स) में वृद्धि की गई है।
कार्पोरेट मीडिया के बहुलांश हिस्से ने आरएसएस-भाजपा का सहयोग करके पूरे देश को हिंदू मुसलमान झगड़े और छद्म राष्ट्रवाद नशे में जानबूझकर उलाझा रखा है, ताकि इस स्थिति का फायदा चंद अमीर उठा सकें, अपनी संपत्ति में बेतहाशा वृद्धि कर सकें और बहुसंख्य भारतीयों को तबाही-बर्बादी को ओर धकेल सकें और सारा खेल बिना किसी भारी विरोध के चलता रहे। ( जनचौक से साभार )

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