नीरज कुमार
लोकतंत्र में जनता की राय ही सर्वोपरि होती है। चुनाव का अर्थ ही यह है कि मतदाता अपने विवेक से निर्णय लें, किसी दबाव, प्रलोभन या प्रचार से नहीं। लेकिन आज का दौर इस सिद्धांत से दूर होता जा रहा है। ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल जैसे माध्यम अब लोकतंत्र को दिशा देने के बजाय, उसे प्रभावित करने का उपकरण बन चुके हैं।
मैं ओपिनियन पोल का शुरू से विरोधी रहा हूं। दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान, जब छात्र संघ चुनावों में ओपिनियन पोल कराए जाने की कोशिश हुई थी, तब भी मैंने और मेरे साथियों ने उसका विरोध किया था। हमारा मानना था कि इस तरह के पोल छात्रों के स्वतंत्र निर्णय को प्रभावित करते हैं और चुनाव की निष्पक्षता को कमजोर करते हैं।
आज, वर्षों बाद भी वही स्थिति और भी गंभीर रूप में हमारे सामने है। ओपिनियन पोल अब जनमत का प्रतिबिंब नहीं, बल्कि कॉरपोरेट और राजनीतिक हितों का औजार बन गए हैं। कई मीडिया हाउस और एजेंसियां बड़े राजनीतिक दलों या उद्योग समूहों के लिए काम करती हैं। परिणामस्वरूप, आंकड़े और रिपोर्टें पहले से तय दिशा में मोड़ी जाती हैं, ताकि एक विशेष छवि बनाई जा सके — कि कौन पार्टी आगे है और कौन पीछे।
इन पोल्स का प्रभाव केवल समाचार तक सीमित नहीं रहता। यह मतदाता के मन में भ्रम और धारणा पैदा करते हैं। मतदाता को यह संदेश दिया जाता है कि “बहुमत इसी पक्ष में जा रहा है”, जिससे स्वतंत्र निर्णय की जगह ‘झुंड मानसिकता’ जन्म लेने लगती है। लोकतंत्र में विचार और विवेक का स्थान धीरे-धीरे प्रचार और मनोविज्ञान की राजनीति में बदल जाता है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि यह सब कुछ चुनावी प्रक्रिया के दौरान होता है। जब जनता को शांत और स्वतंत्र वातावरण में निर्णय लेना चाहिए, तब यह पोल्स उनके मन में अनावश्यक हलचल पैदा करते हैं। यही कारण है कि मेरा स्पष्ट मत है — चुनाव आयोग को चुनाव की घोषणा से लेकर परिणाम आने तक सभी ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना चाहिए।
लोकतंत्र में निर्णय का अधिकार केवल मतदाता के पास है। मतपेटी में जो राय दर्ज होती है, वही असली ओपिनियन पोल है — बाकी सब केवल भ्रम फैलाने का कारोबार।
लोकतंत्र को बचाने के लिए जरूरी है कि हम उसके ऊपर से कॉरपोरेट और मीडिया के इस नियंत्रण को हटाएं।
जनता का विवेक ही सच्चा जनमत है, और वही लोकतंत्र की आत्मा है।







