अब पत्नी क्या पति का सम्मान नहीं करती

बदलते दौर में सम्मान का बदलता स्वरूप – पति-पत्नी के रिश्ते की नई परिभाषा बन गई है ।आधुनिक विवाह और सम्मान का सवाल: दोष नहीं, बल्कि दोनों में ।समझ की ज़रूरत है ” पति और पत्नी का संबंध केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि आत्मा और हृदय का मिलन होता है। यह रिश्ता दो लोगों के बीच प्रेम, विश्वास, सम्मान और सहयोग की नींव पर टिका होता है। पति का सम्मान पत्नी की पूजा है” एक सुंदर भाव हो सकता है, यदि उसमें प्रेम, समर्पण और सम्मान हो — लेकिन यह एकतरफा नहीं, बल्कि दोतरफा होना चाहिए।जब दो व्यक्ति विवाह के बंधन में बंधते हैं, तो वे केवल एक घर या एक छत के नीचे नहीं आते, बल्कि वे एक-दूसरे की दुनिया बन जाते हैं।समय के साथ समाज, सोच और संबंधों की परिभाषाएँ बदल रही हैं। जहां पहले पति-पत्नी का रिश्ता परंपरा और कर्तव्य पर आधारित था, वहीं अब यह समानता, समझ और व्यक्तिगत अधिकारों पर आधारित होता जा रहा है। ऐसे में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि “क्या आजकल की पत्नियाँ अपने पतियों को पहले जैसा सम्मान नहीं देतीं?” जब पत्नी अपने पति का सम्मान करती है, तो वह एक तरह से उसे ईश्वरतुल्य मानकर उसकी पूजा करती है। यह उस दृष्टिकोण को दर्शाता है जहाँ पति को पत्नी के जीवन में एक आदर और श्रद्धा का स्थान दिया गया है।
पति का सम्मान, पत्नी की पूजा है।
लेकिन जब पति भी पत्नी को देवी मान ले,
तभी रिश्ता सच में पूजनीय बनता है।”
पति-पत्नी एक-दूसरे के पूरक होते हैं। जहां पति कभी-कभी कठोर परिस्थितियों में परिवार के लिए ढाल बनता है, वहीं पत्नी उस घर को ममता, स्नेह और अपनापन से संवारती है। दोनों की भूमिकाएँ अलग हो सकती हैं, पर उद्देश्य एक ही होता है – एक-दूसरे को खुश और सुरक्षित रखना।भारतीय संस्कृति में पति-पत्नी का रिश्ता सिर्फ एक सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि आत्मिक संबंध माना गया है। जब कोई कहता है — “पति का सम्मान पत्नी की पूजा है”, तो यह केवल परंपरा की बात नहीं होती, बल्कि उस गहरे प्रेम और समर्पण की बात होती है, जो एक स्त्री अपने जीवनसाथी के लिए रखती है। हालाँकि, आज के समय में इस सोच को एक नया रूप देने की आवश्यकता है — ऐसा रूप जहाँ सम्मान एकतरफा नहीं, बल्कि पारस्परिक हो।जहाँ पत्नी पति की पूजा करे, वहीं पति भी पत्नी को देवीतुल्य माने।
रिश्ता तभी स्थायी और सुंदर बनता है जब दोनों एक-दूसरे को समझें, सुनें और सम्मान दें।
सम्मान की परिभाषा बदल गई है । पहले सम्मान का मतलब था पति के हर निर्णय को स्वीकार करना, उसके आदेशों को मानना, और सार्वजनिक रूप से सिर झुकाकर चलना। आज सम्मान का मतलब है – एक-दूसरे की भावनाओं, विचारों और स्वतंत्रता की कद्र करना। बहुत सी पत्नियाँ आज भी अपने पतियों को सम्मान देती हैं, लेकिन वह पुराने तरीके से नहीं, बल्कि बराबरी और साझेदारी के भाव से।
विवाह एक ऐसा सफर है जिसमें सुख-दुख, उतार-चढ़ाव, सफलता-विफलता – सब कुछ साझा होता है। एक सच्चा जीवनसाथी वही होता है जो न केवल हँसी के पलों में साथ हो, बल्कि आँसुओं में भी कंधा देने को तत्पर रहे।
आज की स्त्रियाँ शिक्षित हैं, आत्मनिर्भर हैं, और उन्हें अपनी पहचान व अधिकारों का बोध है। वे केवल “पत्नी” नहीं हैं, बल्कि एक सोचने-समझने वाली व्यक्ति भी हैं। जब उन्हें लगता है कि उनके विचारों या अस्तित्व की अनदेखी की जा रही है, तो वे चुप रहने के बजाय सवाल करती हैं। यह विरोध सम्मान की कमी नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान की अभिव्यक्ति हो सकती है।
समय के साथ व्यक्ति बदलते हैं, परिस्थितियाँ बदलती हैं, लेकिन जो रिश्ता समझ और सहानुभूति से बंधा होता है, वह हर तूफान को झेल जाता है। पति-पत्नी जब एक-दूसरे को समझने लगते हैं, तो वे बिना कहे भी एक-दूसरे की भावनाओं को पढ़ लेते हैं।
पति का व्यवहार भी मायने रखता है । सम्मान एकतरफा नहीं होता – वह अर्जित किया जाता है। यदि पति पत्नी की भावनाओं, सपनों या योगदान को नजरअंदाज़ करता है, तो यह स्वाभाविक है कि पत्नी भी वैसा ही व्यवहार लौटाए। आज की पत्नी पूछती है – “अगर मुझे बराबरी का दर्जा नहीं मिला, तो मैं क्यों झुकूँ?” यह सवाल अनुचित नहीं है।
एक सफल दांपत्य जीवन की कुंजी है – विश्वास। जब पति-पत्नी एक-दूसरे पर विश्वास करते हैं और एक-दूसरे को अपनी स्वतंत्रता के साथ स्वीकारते हैं, तो उनका रिश्ता और भी मजबूत हो जाता है। यह विश्वास ही है जो दूरी में भी समीपता बनाए रखता है।
बदलती सामाजिक संरचना। पहले महिलाएँ घरेलू भूमिकाओं तक सीमित थीं और आर्थिक रूप से पति पर निर्भर रहती थीं। अब वे बाहर काम कर रही हैं, निर्णय ले रही हैं और परिवार चलाने में बराबरी से भागीदारी निभा रही हैं। जब भूमिका समान है, तो अधिकार और सम्मान भी बराबर की अपेक्षा रखना स्वाभाविक है।पति का सम्मान महत्वपूर्ण है, लेकिन उतना ही पत्नी का सम्मान भी आवश्यक है।पति की पूजा” या “पत्नी की पूजा” से ज्यादा ज़रूरी है कि दोनों एक-दूसरे को इंसान के रूप में समझें, अपनाएँ और सम्मान दें।
किसी भी रिश्ते की सबसे मजबूत डोर प्रेम होती है। पति-पत्नी का प्रेम समय के साथ और गहराता है। यह प्रेम केवल शारीरिक आकर्षण या जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक ऐसी भावना है जिसमें दोनों की आत्माएँ जुड़ती हैं।संवाद की कमी। कई बार समस्या सम्मान की नहीं, संवाद की होती है। पति-पत्नी दोनों अपनी-अपनी अपेक्षाओं में उलझे रहते हैं, और एक-दूसरे की सोच को समझने की कोशिश नहीं करते। नतीजा – शिकायतें बढ़ती हैं और सम्मान घटता दिखता है। पति और पत्नी वास्तव में एक-दूसरे के लिए ही बने होते हैं। जब वे एक-दूसरे को समझते हैं, सम्मान देते हैं और साथ निभाते हैं, तो उनका रिश्ता केवल विवाह तक सीमित नहीं रहता – वह एक जीवनभर की साझेदारी बन जाता है। यह रिश्ता जितना गहरा होता है, उतना ही सुंदर भी।यह कहना कि “आजकल की पत्नियाँ पति को सम्मान नहीं देतीं” एकपक्षीय और अधूरा निष्कर्ष होगा। असल में आज की पत्नी चाहती है कि वह भी सम्मान पाए, उसके विचारों को सुना जाए, और उसे सिर्फ “कर्तव्यों” की नज़र से न देखा जाए। इस बदलते समय में ज़रूरत है:- पति और पत्नी में आपसी संवाद की , समझ की और संवेदनशीलता की। और सबसे बढ़कर, रिश्ते को बराबरी और साझेदारी के आधार पर निभाने की। जब पत्नी अपने पति का सम्मान करती है, तो वह एक तरह से उसे ईश्वरतुल्य मानकर उसकी पूजा करती है।भारत की कई परंपराओं में, पति को “स्वामी” या “परमेश्वर” के रूप में देखा गया है।व्रत जैसे करवा चौथ या वट सावित्री में पत्नी पति की लंबी उम्र के लिए पूजा करती है। यह विचारधारा कई धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं में देखने को मिलती है। यह उस दृष्टिकोण को दर्शाता है जहाँ पति को पत्नी के जीवन में एक आदर और श्रद्धा का स्थान दिया गया है। जब पति पत्नी को इज़्ज़त देगा, तो पत्नी भी वही लौटा देगी – और यह सम्मान कहीं अधिक गहरा और सच्चा होगा।
 ऊषा शुक्ला

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