नीतीश कुमार का सियासी खेल ‘सदा’ ने बिगाड़ा

मंत्री रत्नेश के कारण सीएम खत्म करेंगे शराबबंदी?

दीपक कुमार तिवारी

पटना/सीतामढ़ी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की शराबबंदी पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। विरोधी हों या साथी, समय-समय पर शराबबंदी पर सवाल उठाते कहते रहे हैं। शराबबंदी के बाद शराब माफियाओं की झोली तेजी से भर रही है। कहा जाता है कि शराबबंदी के नाम पर सबसे अधिक दलित जेलों में बंद पड़े हैं। यही कारण है कि समय-समय पर पूर्व सीएम जीतन राम मांझी नीतीश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल देते हैं। अब इस कड़ी में नीतीश कैबिनेट के साथी मद्य निषेध, उत्पाद एवं निबंधन विभाग के मंत्री रत्नेश सदा का भी नाम जुड़ गया है। माना जा रहा है कि बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सदा का यह बयान नीतीश का सियासी खेल बिगाड़ सकता है।
सीतामढ़ी में एक कार्यक्रम को संबोधित करते मंत्री रत्नेश सदा ने कहा कि बिहार में शराब की होम डिलीवरी हो रही है। शराब माफिया थोड़े पैसे का लालच देकर गरीब और एससी-एसटी समुदाय के लोगों से शराब की होम डिलीवरी कराते हैं। शराब माफिया तो बच जाते हैं लेकिन इस समाज के लोग पकड़े जाते हैं। दरअसल मंत्री रत्नेश सदा सीतामढ़ी में आयोजित शराबबंदी जागरूकता कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि नशे से सर्वाधिक प्रभावित होते हैं गरीब गुरबा, इससे मुक्त होना जरूरी है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी-एसटी) समुदाय के अशिक्षित, गरीब और निसहाय लोगों को शराब माफिया थोड़े पैसे का लालच देकर शराब की होम डिलीवरी कराते हैं।
सीएम नीतीश कुमार के शराबबंदी का हम के संस्थापक अध्यक्ष जीतन राम मांझी हमेशा विरोध करते रहे हैं। हाल ही में केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी एक बार फिर शराबबंदी नीति की जम कर आलोचना की। उन्होंने कहा कि प्रदेश में पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारी और यहां तक की जज भी शराब पी रहे हैं। होम डिलीवरी हो रहा है। मेरे कहने का मतलब शराबबंदी को लेकर सरकार पर निशाना साधना नहीं है बस एक सुझाव सरीखा है। हम नीतीश कुमार के मित्र, उनके साथी हैं, इसलिए कहना चाहते हैं कि जो बात गलत है, उसका परिमार्जन कीजिए। मेरे कहने पर तीन-तीन बार परिमार्जन (प्रदेश के शराब कानून में संशोधन) किया, उसके लिए धन्यवाद है, लेकिन पूर्ण परिमार्जन नहीं किया गया। मैंने कहा था कि शराब नहीं पीने वाले को नहीं पकड़ा जाएगा, लेकिन आज क्या हो रहा है, उनको भी पकड़ रहे हैं। आज स्थिति है कि बड़े-बड़े अधिकारी शराब का सेवन करते हैं। लेकिन जेल में कौन बंद है? पता कर लें मजदूर और गरीब दलित या पिछड़ी जाति के लोगों को जेल भेजा जा रहा है। कोई भी बड़ा शराब तस्कर नहीं पकड़ा जा रहा है। मेहनत और मजदूर करने वाले मजदूर गिरफ्तार किए जाते हैं।
लोजपा (आर) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने भी नीतीश कुमार की शराबबंदी की जम कर आलोचना की। जब राज्य में जहरीली शराब पीने से मौत हो रही थी तब चिराग पासवान ने नीतीश कुमार पर एफआईआर दर्ज करने तक की मांग कर दी थी। तब चिराग विपक्ष की राजनीति कर रहे थे। जो पिएगा वो मरेगा नीतीश कुमार के इस बयान की भी चिराग पासवान ने काफी आलोचना करते हुए कहा था कि जो पिएगा वह मरेगा तो पिलाने वालों का क्या होगा?
चिराग पासवान ने तो यहां तक कह दिया था कि नीतीश कुमार जानबूझकर लोगों को जहरीली शराब पीला रहे हैं। बिहार में शराबबंदी के बावजूद सत्ता के संरक्षण में शराब का अवैध कारोबार धड़ल्ले जारी है। हर जगह शराब उपलब्ध है और धड़ल्ले से होम डिलीवरी की जा रही है। सत्ता के नशे में नीतीश कुमार बिहार में शराबबंदी का सिर्फ नाटक कर रहे हैं। असल में वे शराब माफियाओं के संरक्षक हो गए हैं। उनके संरक्षण में शराब के जरिए समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई है।
नीतीश कुमार ने एक अच्छी सोच के साथ शराब बंदी लाई। शुरुआत में तो सब ठीक ठाक लग रहा था। बाजार में शराब पीकर लफड़ा करते नहीं दिखा। लेकिन बाद में शराब माफिया सक्रिय हुए और नीतीश कुमार के शराब बंदी को पंचर करने का काम किया। शराब माफिया और ब्यूरोक्रेसी की मिली भगत से शराब ज्यादा कीमतों पर उपलब्ध होते रहे। लेकिन हो यह रहा था कि गरीब लोग पैसे की लालच में अवैध शराब के कारोबार में शामिल हो जाए। ये गरीब लोग ही जमीन पर सक्रिय हो गए। इस वजह से सलाखों के पीछे जाने वालों में गरीब ,दलित लोग अधिक हैं। यह दलितों की राजनीति कर रहे नेताओं के लिए गले की फांस बन गई है। इसलिए मांझी हो या चिराग, इनका विरोध दलित राजनीति का ही एक हिस्सा है। लेकिन अब ये समय आ गया है कि इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक कराकर शराब बंदी नीति की समीक्षा होनी चाहिए। और साथ ही साथ इस प्रसंग में जेलों में बंद कैदियों के बारे में भी एक मूल्यांकन होनी चाहिए।

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