19 अगस्त बलिया की स्वतंत्रता दिवस की स्मृतियां 

9 अगस्त सन् 1942 को तड़के 5 बजे बम्बई में ब्रिटिश हुकूमत ने गाॅंधी जी के अलावा स्वतन्त्रता आन्दोलन से जुटे अनेक नेताओं को गिरफतार कर नजरबंद कर लिया। कानों-कान बम्बई की खबर बलिया पहुंच गयी। बलिया के लगभग सभी नेता फर्जी मुकदमों में पहले ही बन्दी बनाये जा चुके थे । गिरफ्तार लोगों में चित्तू पाण्डेय, ठाकुर जगन्नाथ सिंह, युवा पीढ़ी के नेता तारकेश्वर पाण्डेय, शिवपूजन सिंह, बालेश्वर सिंह, युशूफ कुरेशी शामिल थे।राधा मोहन सिंह, राधा गोविंद सिंह व परमात्मा नन्द सिंह भी गिरफ्तार किये गये और राम अनन्त पाण्डेय गिरफ्तार होने से बच गये।

दस अगस्त को आठ बजे ओक्डेनगंज पुलिस चौकी के सटे पूरब चौराहे पर उमाशंकर ने गाॅंधी जी की जय और इन्कलाब जिन्दाबाद के नारों के अलावा उन्होंने अंग्रेजों भारत छोड़ो का शंखनाद भी किया। नारों की गूॅंज सुनकर सैकड़ों लोग इकट्ठे हो गये। भीड़ जुलूस की शक्ल में तब्दील हो गई। उमाशंकर व सरजू प्रसाद जुलूस का संचालन कर रहे थे। जुलूस माल गोदाम के करीब से गुजर रहा था,तभी मनियर निवासी कम्युनिस्ट कार्यकर्ता विश्वनाथ प्रसाद ‘मर्दाना’ ने, जो एक सप्ताह पूर्व ही बरेली जेल से दो वर्षों की नजरबंदी के बाद रिहा हुए थे, जुलूस का स्वागत किये और उसे सम्बोधित करते हुए कहा कि ‘हर एक भूखा रोटी चाहता है,हर एक नंगा कपड़ा चाहता है,हर एक बेघर वाला घर चाहता है उसी प्रकार यदि हर ग़ुलाम, आजादी चाहता है तो यह स्वाभाविक ही है।आपका उत्साह सफल हो।’

11 अगस्त को भी बलिया शहर में विशाल जुलूस निकाला गया। करीब 20 हजार से अधिक नागरिकों और विद्यार्थियों का सैलाब मुख्य सड़कों से होता हुआ चौक में पहुंचा और सभा में तब्दील हो गया।सभा को कांग्रेस द्वारा नियुक्त ‘डिक्टेटर’ राम अनन्त पाण्डेय ने सम्बोधित किया। उन्होंने कहा कि अहिंसात्मक रहते हुए भी वे सभी कार्य करने हैं जिनसे प्रशासन ठप पड़ जाये और जिले के सारे प्रशासनिक केन्द्रों पर जनता का अधिकार हो जाये। जुलूस से भयभीत होकर कचहरी में पहले ही तालाबंदी कर दिया गया था। रानीगंज में भारत रक्षा कानून के तहत लोगों को गिरफतार किया गया। सिकंदरपुर के थानेदार ने खेजूरी मंडल कांग्रेस कमेटी कार्यालय के कागजात जब्त कर लिया और भवन पर ताला लगा दिया।

12अगस्त को आन्दोलन ने तब नया मोड़ ले लिया जब बनारस, इलाहाबाद और लखनऊ के कालेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले बलिया के छात्र पढ़ाई छोड़कर आन्दोलन का नेतृत्व करने अपने घरों को वापस आ गये। छात्रों ने आन्दोलन की धार को तीव्र किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले बलिया के अनेक छात्र बृज बिहारी सिंह,देव नन्दन राय, शिवशंकर सिंह, उदयभान सिंह तथा शिवमंगल सिंह आन्दोलन में सक्रिय रहे। ये लोग 12 अगस्त को कचहरी तथा इलाहाबाद हाईकोर्ट भवन पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के उस ऐतिहासिक जुलूस में भी शामिल रहे जिसमें छात्राओं और छात्रों पर पुलिस ने धुॅंआधार लाठियां और गोलियां चलाई। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र नेता लाल पद्मधर घटना स्थल पर ही शहीद हो गये । उनकी शहादत की स्मृति में इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ भवन के सामने उनकी मूर्ति स्थापित किया गया है।

आक्रोशित छात्रों ने 13 अगस्त को विशाल प्रदर्शन किया। महिलाएं भी आन्दोलन में सक्रिय हो गयीं।जानकी देवी के नेतृत्व में जुलूस निकाला गया। जुलूस सिविल जज के कार्यालय में पहुंचा। महिला नेत्रियों ने सिविल जज को अपनी कुर्सी छोड़कर जुलूस में शामिल होने और देश की आजादी के लिए लड़ने का निमंत्रण दिया। सिविल जज द्वारा इनकार करने पर महिलाओं ने अपनी चूड़ियां निकालकर सिविल जज को सौंपते हुए कहा कि ‘इसे आप लोग पहनकर घरों में बैठें , हमलोग देश को आजाद करा लेगीं।’। महिलाओं से भयभीत होकर कलक्टर जे०निगम इजलास छोड़ कर चले गये थे। हाकिम परगना भी अपनी कुर्सी छोड़कर चले गए।जानकी देवी हाकिम परगना की कुर्सी पर आसीन हो गयी, लोग इन्कलाब जिन्दाबाद के नारे लगाते रहे।

14 अगस्त को जिले के अनेक स्थानों पर विद्रोह उग्र होने लगा।बेल्थरा रोड स्टेशन जला दिया गया।माल तथा पार्सल लूट लिए गए। स्टेशन पर तैनात सिपाहियों को भीड़ ने पिटाई कर दी। उत्तेजित भीड़ डाक घर की टिकट,कार्ड, लिफाफा फूॅंक दिये किशोर गांव के राम नगीना राय स्कूल के छोटे बच्चों की जुलूस पर सिकन्दरपुर का थानेदार घोड़ा दौड़ा दिया जिससे अनेक बच्चे घायल होकर गिर पड़े। 15 अगस्त को रेवती में अंग्रेजी सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था ध्वस्त हो गयी और उसकी जगह स्वतन्त्र पंचायती सरकार कार्य करने लगी। रेवती के आन्दोलनकारियों में बच्चा तिवारी और सूरज प्रसाद सिंह शामिल रहे।15 हजार की भीड़ ने बैरिया थाना पर धावा बोल दिया, थानेदार काजिम हुसैन ने आत्मसमर्पण कर दिया और थाना पर तिरंगा झंडा भी फहराने दिया। भीड़ की एक टुकड़ी ने सुरेमनपुर स्टेशन पर चढ़ाई कर दिया और उसे ध्वस्त कर दिया।

16 अगस्त को भारी भीड़ गड़हा के चौरा गांव में एकत्र हुई और लोग वहां से चितबड़ागांव स्टेशन के लिए कूच किए।नरही और सोहांव के लोग भी शामिल हुए। स्टेशन पर तोड़ फोड़ हुआ और कागजात फूंक दिए गए।नरही का थानेदार सुन्दर सिंह आत्मसमर्पण कर दिया और थाने पर राष्ट्रीय झंडा अपने हाथों से फहरा कर उसे सलामी दिया। बलिया शहर में निषेधाज्ञा लागू रहा। निषेधाज्ञा की परवाह न करके बाजार जोर-शोर से लगा रहा। तहसीलदार ने पुलिस लारी को बाजार की भीड़ पर चढ़ा दिया और पुलिस ने गोली चलायी जिसमें नौ लोग मारे गए।

17 अगस्त को रसड़ा स्टेशन जला दिया गया और प्लेटफॉर्म पर रखा हुआ माल लूट लिया गया। भीड़ डाकघर की ओर बढ़ी और कागजात जला डाले। जनसमूह थाना और कचहरी की ओर बढ़ा। तहसीलदार ने गाॅंधी टोपी पहनकर अपने हाथों से झंडा फहराया।व्यवसायी गुलाब चन्द के हाता में भीड़ इकट्ठा हुई।हाता का गेट बंद कराकर थानेदार ने भीड़ पर गोली चलवा दिया और 5-6 व्यक्ति शहीद हो गए। सहतवार में भी डाकघर फूॅंका गया और बांसडीह की वीर जनता ने थाना और तहसील पर पूरी तौर पर अधिकार कर लिया।

बैरिया थाना के थानेदार ने राष्ट्रीय झंडा को उखाड़ फेंका।18 अगस्त को करीब 25 हजार लोग थाना पर एकत्र हो गए। इसमें महिलाएं भी थीं। युवा कौशल कुमार थाने की छत पर चढ़ गया और हाथ से झंडा निकाल कर उसे थाने पर फहराने लगा तभी सिपाही ने कौशल कुमार पर गोलियां दाग़ दी। झंडा लिए कौशल कुमार लुढ़क गए और शहीद हो गए।
19 अगस्त सन् 1942 क्रान्तिकारी संघर्ष का निर्णायक दिवस रहा। बांसडीह,सिकन्दरपुर, रसड़ा सहित प्रत्येक सड़क से हजारों लोग बलिया आ रहे थे। भीड़ जेल की ओर मुड़ रही थी। भीड़ के दबाव में कलक्टर जेल का फाटक खुद ही खुलवा दिया और स्वतंत्रता के सभी सैनिक जेल से बाहर आ गये ।चित्तू पाण्डेय रिहा हो गए और स्वराज सरकार की ओर से स्वतंत्र बलिया के प्रथम जिलाधिकारी नियुक्त किए गए।

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