तिरुवनंतपुरम : चुनाव आयुक्त ज्ञानेशकुमार विवादों में हैं। लगभग दो दशक पहले, मलेशियाई प्रोजेक्ट ऑफिसर के सुसाइड नोट में नाम आने के बाद ज्ञानेश कुमार केरल में विवादों में घिर गए थे। CEC के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों के बीच, वर्क्स सेक्रेटरी के तौर पर उनके विवादित केरल कार्यकाल का मुद्दा फिर से उठ खड़ा हुआ है, क्योंकि सीनियर CPM नेता टी.एम. थॉमस इसाक ने सोशल मीडिया पोस्ट में इस मामले को फिर से उठाया है।
2006-11 के दौरान वित्त मंत्री रहे इसाक ने याद दिलाया कि तत्कालीन लोक निर्माण विभाग (PWD) सेक्रेटरी ज्ञानेश कुमार उन अधिकारियों में शामिल थे जिनका नाम मलेशियाई अधिकारी ली बीन सीन के सुसाइड नोट में था।
कौन थे ली बीन सीन
ली बीन सीन, केरल में सड़क परियोजना के लिए मलेशियाई फर्म PATI और भागीरथ कंस्ट्रक्शन्स के जॉइंट वेंचर, PATI-BEL के केरल ऑपरेशन्स के इंचार्ज थे। घटना नवंबर 2006 की है। केरल से लौटने के बाद ली बीन सीन ने कुआलालंपुर में ली ने आत्महत्या कर ली।
ज्ञानेश कुमार का सुइसाइड नोट में था नाम
इसाक के अनुसार, ली बीन सीन ने मरने से पहले एक सुसाइड नोट लिखा था। इस नोट में PWD अधिकारियों के भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और उत्पीड़न के आरोप लगाए गए थे। नोट में जिन अफसरों के नाम थे, उनमें ज्ञानेश कुमार भी थे। वह तब पीडब्ल्यूडी में सचिव के पद पर थे। नोट में कथित तौर पर रिश्वत की मांग का भी आरोप लगाया गया था।
विजिलेंस जांच हुई थी
इन आरोपों के बाद विजिलेंस जांच हुई और 2006 के अंत से पहले ही ज्ञानेश कुमार का PWD से तबादला कर दिया गया। इसके बाद वे केंद्रीय रक्षा मंत्रालय चले गए। इसाक के मुताबिक, वहां ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल ने उन्हें BJP सरकार की नजरों में अच्छा बनने में मदद की।
कॉन्ट्रैक्टर के पेमेंट में हुई थी देरी
इसाक ने दावा किया कि जिस प्रोजेक्ट का शुरुआती अनुमान 216 करोड़ रुपये था, उसे पूरा करने के लिए आखिरकार कम से कम 330 करोड़ रुपये की जरूरत पड़ी। उन्होंने पेमेंट में देरी और कॉन्ट्रैक्टर के कथित उत्पीड़न को ली की आत्महत्या से जोड़ा और उनकी मौत को सरकारी अधिकारियों द्वारा कंपनी के साथ किए गए व्यवहार का नतीजा बताया।
मैंने व्यक्तिगत रूप से ली बीन सीन का सुसाइड नोट नहीं पढ़ा है, लेकिन उस समय अधिकारियों द्वारा रिश्वत लेने और पैसे की मांग करने के आरोपों पर चर्चा हो रही थी। आरोपों में जिन लोगों के नाम थे, उनमें ज्ञानेश कुमार भी शामिल थे।
जांच का नहीं आया था नतीजा
मौत के बाद, राज्य के विजिलेंस विभाग ने जांच तो की, लेकिन अधिकार क्षेत्र से जुड़े मुद्दों और अधिकारियों की दिलचस्पी न होने के कारण जांच किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। उस समय तैनात रहे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने मामले के नतीजे के बारे में अनभिज्ञता जताई। एक रिटायर्ड शीर्ष पुलिस अधिकारी ने कहा, विजिलेंस ने जांच की थी। हालांकि, वह किसी नतीजे पर नहीं पहुंची। उस समय, जनता के भारी विरोध के बावजूद सरकारी तंत्र इस मामले को आगे बढ़ाने में बहुत उत्सुक नहीं था।
उस समय, इस विवाद ने केरल के इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में हलचल मचा दी थी। इस मौत ने अनियमितताओं और ठेकेदार को भुगतान करने के सरकार के तरीके को लेकर आरोपों के बीच एक राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया था।
घटना में फंसने के बाद केंद्र पहुंचे
सीपीआईएम नेता थॉमस इसाक ने कहा कि ज्ञानेश कुमार केरल कैडर छोड़ना पड़ा था। दो-तीन महीनों के भीतर वे रक्षा विभाग के तहत केंद्रीय सेवा में जाने में कामयाब रहे। फिर वे कुछ वर्षों तक वहां रहे, जब तक कि 2011 में यूडीएफ सरकार सत्ता में नहीं आई। फिर 2012 में, वे दिल्ली में केरल हाउस के रेजिडेंट कमिश्नर बने। 2016 में वामपंथी एक बार फिर सत्ता में आए, वे फिर से केंद्रीय सेवा में चले गए। उन्होंने आरोप लगाया कि वहां वे कश्मीर राज्य को विखंडित करने में सहायक थे।
थॉमस इसाक ने कहा कि ऐसी अफवाह है कि मुझे इसके बारे में प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं है कि वे आए, अमित शाह के पसंदीदा बन गए। उनके पास किसी राज्य को खत्म करने के शानदार विचार थे। मुझे लगता है कि वे कई ऑपरेशनों के लिए एक तरह के मास्टरमाइंड थे, उदाहरण के लिए राम जन्मभूमि मंदिर।
20 साल पहले की घटना के रिकॉर्ड कर दिए गए होंगे नष्ट
इसाक ने कहा कि प्रोजेक्ट में देरी मुख्य रूप से जमीन अधिग्रहण की समस्याओं के कारण हुई, जिसमें कॉन्ट्रैक्टर और PWD धीमी प्रगति की जिम्मेदारी को लेकर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहे। विभाग की लापरवाही की वजह से सारा दोष केरल सरकार पर आ गया। मुझे पक्का नहीं पता कि विजिलेंस विभाग के पास अब भी उस जांच का रिकॉर्ड है या नहीं, क्योंकि पुरानी फाइलें आम तौर पर नष्ट कर दी जाती हैं। यह घटना 20 साल पहले हुई थी। हो सकता है कि मलेशियाई कंपनी ने भी इस मामले को आगे न बढ़ाया हो।







