प. बंगाल में महाराष्ट्र वाला खेल, बागी गुट हुआ असली टीएमसी!

उद्धव ठाकरे वाला हुआ ममता बनर्जी का हाल, टूट गई टीएमसी
विधानसभा अध्यक्ष ने बागी गुट को दी मान्यता, ऋतब्रत बनर्जी हुए प्रतिपक्ष नेता

 

चरण सिंह 

आखिरकार टीएमसी का भी वही हाल हुआ जो महाराष्ट्र में शिवसेना का हुआ था। 58 विधायकों के गुट को विधानसभा अध्यक्ष ने मान्यता दे दी है। ऋतब्रत बनर्जी प्रतिपक्ष नेता होंगे। अब ऋतब्रत बनर्जी ने अब पूरी टीएमसी पर दावा कर दिया है। निर्णय विधानसभा अध्यक्ष और चुनाव आयोग को करना है। जगजाहिर है कि विधानसभा अध्यक्ष और चुनाव आयोग वही करेंगे जो पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह कहेंगे। तो महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे की तरह ऋतब्रत बनर्जी गुट ही   असली टीएमसी माना जाएगा। यह बात आज की परिस्थिति में तय है कि टीएमसी का वजूद तो ख़त्म होगा ही साथ ही बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को जेल जाना पड़ेगा।
भले ही ममता बनर्जी ने 8 जून को दिल्ली में इंडिया गठबंधन की मीटिंग बुला ली है पर बीजेपी अब उनका पूरा खेल ही खत्म करने जा रही है। वैसे भी इंडिया गठबंधन के प्रति ममता बनर्जी का जो रवैया रहा है, उससे लगता नहीं कि कांग्रेस और दूसरे क्षेत्रीय दलों का मजबूत साथ उन्हें मिल पाएगा। इंडिया गठबंधन पर जोर देने वाली ममता बनर्जी ही विपक्षी एकता को कमजोर करने वाली थीं। दिल्ली में जब इण्डिया गठबंधन की तीसरी मीटिंग चल रही थी तो ममता बनर्जी ने संयोजक के लिए मल्लिकार्जुन का नाम पेश कर नीतीश कुमार को नाराज कर दिया था। जब नीतीश कुमार ने विपक्षी एकता को मजबूती दी थी तो संयोजक पद पर उनका ही दावा बनता था। वैसे भी अब उनके पास ऐसा कुछ बचा ही नहीं कि विपक्ष के दूसरे दल उन्हें भाव दे। 29 सांसदों में से 20 सांसद भी टूटने जा रहे हैं। यह भी जमीनी हकीकत यह कि यदि विपक्ष के दल एकजुट न हुए तो भले ही कांग्रेस का कुछ न बिगड़े पर क्षेत्रीय दलों का वजूद खत्म होने से कोई रोक नहीं पाएगा।  इंडिया गठबंधन की मीटिंग से पहले ही आम आदमी पार्टी ने इस गठबंधन से बाहर रहने की बात कर दी है। अखिलेश यादव को छोड़ दिया जाए तो अब विपक्ष के दूसरे दल ममता बनर्जी को कोई खास भाव नहीं देने जा रहे हैं।
पश्चिम बंगाल में विद्रोही गुटों ने है दावा किया है कि वह असली टीएमसी है। पार्टी से निकाले गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी समेत 58 बागी नेताओं को विधानसभा स्पीकर ने मंजूरी दे दी है।   स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दी है।

 

दलबदल विरोधी कानून में एक अपवाद

 

दरअसल भारत का दलबदल विरोधी कानून भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है। आमतौर पर अगर कोई एक विधायक या फिर विधायकों का कोई छोटा समूह अपनी पार्टी के खिलाफ विद्रोह करता है तो उन्हें विधानसभा से अयोग्य घोषित किया जा सकता है, लेकिन इस कानून में एक बड़ा अपवाद है। अगर किसी पार्टी के कम से कम दो तिहाई निर्वाचित विधायक एक साथ अलग हो जाते हैं तो उन पर दलबदल विरोधी कानून लागू नहीं होता और उनकी सदस्यता सुरक्षित रहती है।

 

दो तिहाई आंकड़ा है साथ में

 

विधानसभा में टीएमसी के 80 विधायक थे। संवैधानिक फार्मूले के तहत कानूनी रूप से दो तिहाई का आंकड़ा पार करने के लिए कम से कम 54 विधायकों की जरूरत थी. रिपोर्ट्स के मुताबिक ऋतब्रत बनर्जी के खेमे ने 58 विधायकों के हस्ताक्षर सौंपे। इस वजह से गुट को कानून के तहत सुरक्षा का दावा करने का मौका मिल गया।

 

राजनीतिक दल और विधायी दल के बीच अंतर

 

भारतीय कानून एक राजनीतिक दल और उसके विधायी विंग के बीच अंतर करता है। राजनीतिक दल से मतलब उस संगठन से है जो पार्टी नेतृत्व द्वारा कंट्रोल होता है और विधायी दल से मतलब उस पार्टी के चुनाव चिन्ह पर निर्वाचित विधायकों या फिर सांसदों से है।

 

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने ऐसे दावों को मजबूती दी

 

शिवसेना में हुए राजनीतिक विभाजन से जुड़े पिछले फसलों में अदालत और संवैधानिक संस्थाओं ने इस बात की जांच की थी कि क्या चुने हुए ज्यादातर विधायक विधानसभा के अंदर किसी गुट के पार्टी की पहचान और चुनाव चिह्नों पर दावे को मजबूत कर सकते हैं। इन मिसालों की वजह से पार्टी में फूट पड़ने पर विधायकों की संख्याबल काफी ज्यादा अहम हो जाती है।

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