आस्था का ‘महाकुंभ’

कृष्णा नारायण 

कुंभ
शास्त्रीय कथन के अनुसार अमृत मंथन के समय अमृत पात्र को लेकर देव एवं दानवों के बीच हुए छीना झपटी में अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी पर चार स्थानों पर गिरी| ये चार स्थान कुंभ स्थान बन गए|
ज्योतिष के अनुसार सूर्य एवं गुरु के आपसी खास कोणीय सम्बन्ध जब बनते हैं तो कुंभ का आयोजन होता है|
जब सूर्य मेष राशि में ( वैशाख माह ) होते हैं, मकर (माघ माह )और एक बार कर्क (भादो माह) में होते हैं और गुरु एक कुंभ राशि में , वृषभ राशि में और सिंह राशि में होते हैं तो इसका आयोजन किया जाता है| गुरु वृषभ में हों सूर्य मकर में तब माघ मास में प्रयागराज कुंभ मेला होता है|
आदि शंकराचार्य ने भी यह परंपरा कायम की कि इन चार स्थानों पर योगी, संत, साधु, ऋषि और भक्त एकत्रित हों| कुछ विद्वानों के मतानुसार पहले कुंभ का आयोजन ज्ञान, विज्ञान एवं धर्म के देव, आदियोगी शिव ने किया था|
कुंभ घड़े को भी कहा जाता है| घड़ा यदि खाली हो तो उसका उतना महत्व नहीं है परन्तु इसी घड़े में यदि बाहर का उष्ण जल डाल दिया जाये तो यह जल शीतल होकर हमारी प्यास बुझाने का काम करता है| जल के गुण में बदलाव घड़े का बाह्य प्रकृति के साथ एकात्म स्थापित करने की वजह से होता है| दसो दिशाओं से आने वाली वायु के स्पर्श के साथ वह अपना जुड़ाव करते हुए, उसे अपने भीतर के जल के साथ जोड़ती है| घड़ा और जल दोनों मिलकर वायु की उष्णता को शीतलता में परिवर्तित करते हैं|
संत समागम
हम ज्ञानी और विवेकपूर्ण हों, आत्मबल से भरपूर हों इसके लिए सज्जन के साथ समय बिताना, संत समागम, स्नान,दान एवं तप की राह हमें शास्त्र दिखाता है|
स्नान सिर्फ शरीर का नहीं बल्कि मन का भी| दोनों की शुचिता कायम हो|
हम खूब कमाएँ और उसी अनुपात में दान करें|
हमारा मन शिव संकल्पों से युक्त हो, हमारे सामने सही विकल्प प्रकटे इसके लिए तप करें|
अमृत धरा पर हर दिशा से आये गुणी एवं प्रबुद्ध जनों का साथ हमें संसार एवं जीवन की सूक्ष्मता को समझाते हुए हमारे जीवन को एक नया ‘अर्थ’ प्रदान करती है|
भौतिक एवं आध्यात्मिक समृद्धि
एक व्यक्ति, शारीरिक स्तर पर हर पल परिवर्तित हो रहा है| छोटी से छोटी कोशिकाएँ निरंतर बदलाव की प्रक्रिया से गुजर रही हैं|
भौतिक चीजों की प्राप्ति के लिए, भौतिक समृद्धि के लिए यह परिवर्तन आवश्यक है|
ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक स्तर पर परिवर्तित और रूपांतरित होने की जरूरत है| भौतिक परिवर्तन स्थूल परिवर्तन है और आध्यात्मिक परिवर्तन सूक्ष्म परिवर्तन है|
सिर्फ भौतिक समृद्धि पाकर हम संसार में चलेंगे तो हमारे लडख़ड़ा कर गिरने की संभावना रहेगी परन्तु भौतिक के साथ साथ आध्यात्मिक समृद्धि पाकर, दोनों के साथ चलेंगे तो हम अनंत उचाईयों को मापने में सक्षम हो सकेंगे|
‘महाकुंभ’
144 वर्षों के बाद महाकुंभ का आयोजन किया जाता है|
स्थूल रूप से ( भौतिक दृष्टि) देखा जाये तो किसी भी व्यक्ति के जीवन में ‘महाकुंभ’ के मेले में शामिल होना हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है| यदि हुआ भी तो वह एक बार ही होगा|
सूक्ष्म रूप (आध्यात्मिक दृष्टि) से देखा जाये तो शरीर का नाश होने से ‘ऊर्जा’ का नाश नहीं होता| देहान्तर के द्वारा ‘ऊर्जा’ अपना रूप परिवर्तित करते हुए रूपांतरित होती रहती है| तो परिवर्तन से रूपांतरण की इस यात्रा में हो सकता है अभी हो रहा कुंभ हमारे लिए 144वां वर्ष हो| यह हमारे लिए ‘महाकुंभ’ हो|
आस्था के इस ‘महाकुंभ’ में हम सब ज्ञान की गंगा में स्नान कर दान एवं तप के द्वारा परिवर्तित और रूपांतरित हों| ‘कुंभ’ से हमारा पुनर्जन्म हो| हम ‘कुंभज’ कहलाएं|
@ बी कृष्णा (ज्योतिषी, योग और आध्यात्मिक चिंतक )

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