प्रेम, अविश्वास और हिंसा

डॉ. योगेन्द्र

हमने कैसा समाज बनाया है? क्या समाज इतना निर्दय और क्रूर हो सकता है? क्या समाज की संवेदना पूरी तरह चुक गयी है? कोई कल्पना कर सकता है कि एक नाबालिग युवती के साथ 32 लोग पाँच दिनों तक रेप करे? राजस्थान के श्रीनगर ज़िले में यह दुर्घटना घटी है। रेप करने वाले में उसका प्रेमी भी है, निम्न वर्ग का रिक्शेवाला भी है और उच्च- मध्य वर्ग के युवा भी। तीन विभिन्न होटलों में युवती को बंधक बनाकर रखा गया । मुझे तो राम मंदिर में हुई चंदा चोरी से यह बड़ा मामला लगता है। यह मामला बताता है कि तमाम धार्मिक कांड- कुकांड बाद भी मनुष्य की नैतिकता का क्षरण हुआ है । हिंदू समाज की आस्था मंदिरों में चोरी से हिल जाती है। ऐसी घटनाओं से तो समाज को बेचैन हो जाना चाहिए । युवती के बारे में सोच कर देखिए और सोचिए उसके परिवार के बारे में। कभी निर्भया कांड हुआ था तो पूरे भारत में आंदोलन हुए । ऐसा लगा था कि आगे बहुत कुछ सुधर जायेगा, मगर सुधार हुआ नहीं । उसके बाद भी लगातार सामूहिक बलात्कार की घटनाएँ घट रही हैं ।
बलात्कार जघन्यतम अपराध है। अपराध के लिए दंड भी है। बावजूद इसके ऐसी दुर्घटनाएँ घट नहीं रही। इधर के दिनों में एक नया ट्रेंड चला है। पत्नी अपने प्रेमी से मिल कर पति की हत्या कर रही है, वैसे ही पति भी। समाज में यह बीमारी बढ़ती जा रही है । कौन किस पर विश्वास करे ? प्रेम के नाम पर धंधे चल रहे हैं । ऐसी घटनाएँ क्या राजनीतिक सत्ता बदलने से ठहर जाएगी? या फिर समाज के अंदर सांस्कृतिक क्रांति करनी होगी ।

आदमी पहले इंसान को इंसान तो समझे! जिस समाज में महा करूणा के प्रतीक बुद्ध हुए, वहाँ मनुष्य को मनुष्य नहीं समझा जा रहा। अजीब तरह की दुर्गंध युक्त समाज में फैलती और चेतना को निगलती जा रही है । दुर्भाग्य यह है कि ऐसी दुर्घटनाएँ प्रेम के नाम पर हो रही हैं । प्रेम एक कोमल- भाव है, इंसान से इंसान को जोड़ने वाला भाव, जिसमें विश्वास भी है, संवेदना भी है । प्रेम एक उदात्त भाव है। वह आदमी को ही आदमी से नहीं जोड़ता, बल्कि आदमी को पशु- पक्षी, पेड़-पौधे, सागर और नदी से जोड़ता है। कहना चाहिए कि कायनात से जोड़कर आदमी की चेतना को भाव- संपन्न करता है। देश में कई संगठन ऐसे हैं, जिसका दावा है कि वे युवाओं को प्रशिक्षित कर रहे हैं कि वे देश के लिए मर मिटें। देश कोई मिट्टी का लोंदा नहीं है । देश तो बना है धरती पर रहने वाले तमाम लोगों, जीवों, पशु – पक्षियों, जल , ज़मीन , जंगल से। देश प्रेम के नाम पर वैमनस्य फैलाना कहीं से भी देशभक्ति नहीं है ।

धरती पर विभिन्न तरह के धर्म और संस्कृति है। लोग अपने अपने धर्म और संस्कृति में जीते हैं, किसी को भी किसी के धर्म या संस्कृति पर हमला करने का हक नहीं है । अगर धर्म में विकृति आ गई है जो मनुष्य को मारती है तो उस पर संवाद हो। उसे दूर करने की कोशिश निरंतर करना चाहिए, न कि नफ़रत फैलाने का किसी को अधिकार मिल जाए । आज बहुत से धर्म गुरु उपज गए हैं । उनकी बोली- वाणी सुनिए तो वे कहीं से भी धर्म गुरु नहीं लगते। गुरु वह है जिसके पास आत्मिक ज्ञान है और जो मानवीयता से भरा रहता है । प्रेम के नाम पर जो विकृत घटनाएँ घट रही हैं, उसका इलाज शिक्षा में है। शिक्षा आज मनुष्य को मनुष्य नहीं बना रही, बल्कि उसे संपत्ति और शोहरत में बदल रही है । जब देश की बुनियाद ही कमजोर है तो पाँच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था हो जाय या देश की, क्या अंतर पड़ता है!

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