लीचीपुरम उत्सव-2025 का भव्य हुआ समापन

 मेहसी बना लीची की राजधानी
 विज्ञान और संस्कृति का अद्भुत संगम

मोतिहारी / राजन द्विवेदी ।

बिहार के प्रमुख लीची उत्पादक क्षेत्रों में अग्रणी मेहसी अब ‘लीची की राजधानी’ के रूप में अपनी पहचान मजबूत करता जा रहा है। इसी क्रम में ऐतिहासिक तिरहुत उच्च विद्यालय परिसर में आयोजित तीन दिवसीय 17वें लीचीपुरम उत्सव-2025 का भव्य समापन सोमवार, 14 रात सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रंगीन छटा के बीच हुआ।
यह आयोजन लीची की खेती, कृषि, विज्ञान, परंपरा और लोकसंस्कृति का अनूठा संगम रहा, जिसमें देशभर से आए वैज्ञानिकों, कलाकारों और किसानों ने भाग लिया।
उत्सव की भव्य शुरुआत
उत्सव का शुभारंभ लीची अनुसंधान केंद्र, मुसहरी (मुजफ्फरपुर) के निदेशक डॉ. विकास दास, प्रसिद्ध लीची वैज्ञानिक डॉ. उपग्ज्ञा, डॉ. आलोक मिश्रा, मुखिया संघ अध्यक्ष राकेश पाठक और उत्सव समिति के पदाधिकारियों द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।
इस अवसर पर 40 पन्नों की एक रंगीन स्मारिका पुस्तक का विमोचन भी किया गया, जिसमें मेहसी की लीची विरासत और इस आयोजन की यात्रा को दर्शाया गया है।

‘शाही लीची का संरक्षण और जियो-टैगिंग की घोषणा

डॉ. विकास दास ने अपने संबोधन में कहा कि मेहसी में मौजूद दो से तीन सौ साल पुराने शाही लीची के वृक्ष को बिहार की धरोहर घोषित कर उसे सरकारी संरक्षण और जियो-टैगिंग के दायरे में लाया जाएगा। उन्होंने इस ऐतिहासिक वृक्ष को रजिस्टर्ड करने की प्रक्रिया भी शुरू करने की बात कही। उन्होंने कहा कि लीचीपुरम मेहसी में लीची को लेकर इतना बड़ा आयोजन बेमिसाल है और एन‌आरसी आगे कार्यक्रमों में शामिल होंगी।
इसके साथ ही उन्होंने स्थानीय किसानों को सीधे लीची अनुसंधान केंद्र से जोड़ने और उन्हें वैज्ञानिक सलाह, प्रशिक्षण व तकनीकी सहायता देने की प्रतिबद्धता जताई।

 

“किसानों की सेवा मेरा कर्तव्य”: डॉ. उपग्या

 

स्वयं मेहसी से जुड़ी लीची वैज्ञानिक डॉ. उपग्या ने कहा, “मैं इस क्षेत्र की बहू हूं और यहां के किसानों की सेवा मेरा धर्म है।” उन्होंने किसानों को अनुसंधान केंद्र की योजनाओं से अधिकतम लाभ दिलाने के लिए व्यक्तिगत रूप से प्रयासरत रहने का वादा किया।
प्रसिद्ध हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. आलोक मिश्रा ने बिहार की लीची को अंतरराष्ट्रीय मंच दिलाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि यह उपज वैश्विक ब्रांड बनने की क्षमता रखती है।

 

लोककलाओं में दिखा बिहार का रंग:

 

तीन दिनों तक चले इस उत्सव के दौरान लोकनृत्य, नुक्कड़ नाटक, योग गीत, छठ गीत, देशभक्ति गीत समेत दर्जनों सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्तार आलम, मंजीत प्रकाश के गायन, लेवाना पब्लिक स्कूल, चकिया, बुद्धा गर्ल्स स्कूल, वैशाली, और मेहसी सेंट्रल स्कूल के बच्चों ने सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों पर सुंदर प्रस्तुतियाँ दीं।
सबसे बड़ा आकर्षण दरभंगा की सृष्टि फाउंडेशन की टीम रही जिसने शिव स्तुति, मिथिला लोकनृत्य, झूमर, राधा-कृष्ण नृत्य जैसी प्रस्तुतियों से समां बांध दिया। टीम का नेतृत्व गुरु जयप्रकाश पाठक ने किया और प्रमुख कलाकारों में श्रुति सिंह, रितु रानी, कुमुद शर्मा, माही गुप्ता आदि शामिल रहे।
कार्यक्रम का संचालन दीपक गुड्डू व सुदिष्ट नारायण ठाकुर ने संयुक्त रूप से किया।

 

एक सफल परंपरा, लीची को नई पहचान

 

लीचीपुरम उत्सव की शुरुआत वर्ष 2008 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा की गई थी। तब से यह आयोजन पूर्वी चंपारण ही नहीं, बल्कि पूरे बिहार के लिए गौरव का विषय बन चुका है। यह किसानों, वैज्ञानिकों और संस्कृति प्रेमियों को एक साझा मंच प्रदान करता है।
पिछले वर्षों में पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी समेत कई बड़े नेता भी इस आयोजन में शिरकत कर चुके हैं। अब यह बिहार के पाँच प्रमुख वार्षिक आयोजनों में गिना जाने लगा है।

 

समिति की सक्रिय भूमिका

 

इस उत्सव को सफल बनाने में लीचीपुरम उत्सव समिति की केंद्रीय भूमिका रही। समिति के महासचिव सुदिष्ट नारायण ठाकुर, उपाध्यक्ष राकेश पाठक, सत्यदेव राय आर्य, मनोज मेहसवी, विनोद दुबे, अरविंद कुमार गुप्ता, बी के बीरेंद्र, शंकर कुशवाहा, डॉ मनोज कुमार, कृत नारायण कुशवाहा, जयंत कुमार मोनू, राजीव कुमार, मीडिया प्रभारी हामिद रज़ा और अन्य सदस्यों ने दिन-रात मेहनत कर आयोजन को भव्य रूप दिया।

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