लालू यादव के ‘लाडले’ अखिलेश सिंह की कटने वाली है गुड्डी!

 इस्तीफों और पप्पू यादव प्रकरण से कांग्रेस है नाराज?

दीपक कुमार तिवारी

पटना/नई दिल्ली। कहा तो यह जाता है कि बिहार में कांग्रेस वही करती है जो राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव चाहते हैं। तो प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह से क्यों नाराज है कांग्रेस आलाकमान? ऐसी क्या-क्या गलतियां की, जिसके कारण कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की भृकुटी तन गई है। जानते हैं उन आरोपों को जिनके लपेटे में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह आते दिख रहे हैं।
राजद से कांग्रेस में आने और फिर अखिलेश प्रसाद सिंह के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद उनकी स्वीकार्यता कांग्रेस में बन नहीं रही थी। आरोप यह लग रहे थे कि कांग्रेसी कल्चर के विरुद्ध इनका आचरण है। कार्यकर्ता तो दूर जिला अध्यक्ष तक को मिलने का कारण बताना पड़ता था। जबकि होता यह था कि दरबार लगी है आप अपनी बात कहिए। लेकिन इनके आने के बाद इनके ब्यूरोक्रेट व्यवहार से नेताओं को तकलीफ होने लगी। सबसे पहले तो कांग्रेस के दिग्गज नेता अनिल शर्मा ने पार्टी को अलविदा कहा। फिर दो विधायक सिदार्थ और मुरारी गौतम ने पार्टी को अलविदा कहा। कांग्रेस प्रवक्ताओं में असित नाथ तिवारी, कुंतल कृष्ण ने भी पार्टी से विदा ली। कांग्रेस आलाकमान को यह अच्छा नहीं लगा।
प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह ने पप्पू यादव के लिए जो ‘नो इंट्री’ की बोर्ड लगाई, वह भी आलाकमान को पसंद नहीं आई। हालांकि कांग्रेस के केंद्रीय नेताओं के समक्ष पप्पू यादव ने अपनी पार्टी जनाधिकार पार्टी का कांग्रेस में विलय कर कांग्रेस की सदस्यता ली। पर यह कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह को स्वीकार्य नहीं हुआ। प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश सिंह ने इस प्रकरण पर कहा कि दागी नेताओं के लिए कांग्रेस में कोई जगह नहीं। और यह सब सिर्फ राजद सुप्रीमो लालू यादव के इशारे पर किया गया ताकि उनके उम्मीदवार बीमा भारती को पूर्णिया से लड़ाया जा सके। कांग्रेस आलाकमान को यह बात भी नागवार लगी।
प्रदेश अध्याध अखिलेश सिंह पर यह भी आरोप है कि पार्टी से ज्यादा उन्होंने खुद की चिंता की अपने बेटे की चिंता की। कांग्रेसी के बजाय बाहरी को उम्मीदवार बनाने की चिंता की। राज्यसभा कार्यकाल पूरा होने के बाद किसी और को राज्यसभा भेजने के बजाय खुद दूसरी बार राज्यसभा चले गए। बेटे आकाश को 2019 लोक सभा चुनाव में पहले उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी से मोतिहारी लोकसभा लड़वाया। चुनाव हार भी गए। पर अखिलेश सिंह ने अपने बेटे को कांग्रेस का डेलीगेट बना दिया। 2024 लोकसभा के चुनाव में महाराजगंज लोकसभा से भाजपा के कद्दावर नेता जनार्दन सिग्रीवाल के विरोध उतार दिया। चुनाव भी हार गए।
प्रदेश अध्यक्ष पर बाहरी उम्मीदवार उतारने के भी आरोप लगे। रालोसपा से कांग्रेस आए आकाश को महाराजगंज से, बसपा होते कांग्रेस आए मनोज कुमार को सासाराम से, भाजपा से कांग्रेस आए अजय निषाद को मुजफ्फरपुर से और जदयू के मंत्री रहे महेश्वर हजारी के पुत्र सन्नी हजारी को टिकट देना हार का कारण बना।
आरोप यह लगा कि पारंपरिक सीट औरंगाबाद को राजद के हवाले कर दिया। इस कारण से कांग्रेस की बनी बनाई जमीन वाली सीट राजद के पास चली गई। बेगूसराय कांग्रेस का गढ़ रहा। वहां कांग्रेस नेता को उतारने के बदले यह सीट वाम को चली गई। पूर्णिया से पप्पू यादव की पूरी तैयारी थी पर यह सीट राजद की झोली में डाल दी। आज पप्पू यादव कांग्रेस में होते तो कांग्रेस के खाते में एक सीट का इजाफा होता।
आगामी विधान सभा चुनाव को लेकर आलाकमान जरूर चिंतित होगा। पर क्या बदलाव जरूरी है या नियंत्रण। अभी बीच बहस में अखिलेश प्रसाद सिंह के हालात को तौलना है। और जैसा कि अखिलेश प्रसाद सिंह राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की पसंद हैं और कांग्रेस आलाकमान लालू यादव की सुनते हैं, ऐसे में यह जानना जरूरी है कि लालू प्रसाद यादव क्या बदलाव चाहते हैं? अभी ऐसे सवालों के घेरे में है प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी है। शायद कुछ दिन और लगेगा कि बदलेगी या रहेगी अखिलेश प्रसाद सिंह की कुर्सी।

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