जेपी क्रांति को नैतिक व शास्वत प्रक्रिया मानते थे : रघु ठाकुर

लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जयंती पर याद किया गया

. लेखक शिवदयाल की पुस्तक ‘ जयप्रकाश : परिवर्तन की वैचारिकी ‘ का हुआ विमोचन

भोपाल । ‘ लोकनायक जयप्रकाश नारायण समाज को मानसिक रूप से बदलने में विश्वास रखते थे। वे क्रांति को नैतिक और शास्वत प्रक्रिया में देखना चाहते थे। यदि वे कुछ समय और जीवित रहते तो निश्चित ही उस सम्पूर्ण क्रान्ति के अगले चरण के लिए तत्पर होते जो डॉ राममनोहर लोहिया की ही सप्तक्रांति का दूसरा नाम था।‌ जेपी ने हम सबसे बातचीत में इसकी रूपरेखा बनाई थी, लेकिन उन्हें समय नहीं मिला।’
सुप्रसिद्ध समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर ने आज भोपाल के गांधी भवन में जयप्रकाश नारायण की जयंती पर हुए वैचारिक विमर्श ‘ सप्तक्रांति से सम्पूर्ण क्रान्ति ‘ में यह विचार रखे।
समता ट्रस्ट व गांधी भवन ने मिलकर यह आयोजन किया था जिसमें माधवराव सप्रे समाचारपत्र संग्रहालय के संस्थापक विजयदत्त श्रीधर विशेष रूप से उपस्थित थे।
‘ जयप्रकाश: परिवर्तन की वैचारिकी ‘ पुस्तक का इस कार्यक्रम में विमोचन हुआ व पटना से आये इस पुस्तक के लेखक शिवदयाल ने विस्तार से जेपी की विचार व जीवन यात्रा पर प्रकाश डाला।
आयोजन की अध्यक्षता गांधी भवन के सचिव दयाराम नामदेव ने की। कार्यक्रम का संचालन महेश सक्सेना ने व धन्यवाद ज्ञापन समता ट्रस्ट के अध्यक्ष मदन जैन ने किया। मंच पर शिवदयाल जी की जीवनसंगिनी आभा सिन्हा, श्रीमती नामदेव व डॉ शिवा श्रीवास्तव की भी उपस्थिति रही। डॉ शिवा श्रीवास्तव ने शिवदयाल जी का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया।
अतिथियों का स्वागत गांधी भवन के अंकित मिश्रा ने किया।

रघु ठाकुर ने आपातकाल, सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन व जेपी के दर्शन पर विस्तार से बोलते हुए कहा कि वे ऐसे समाज की कल्पना करते थे जिसमें घृणा और गैरबराबरी न हो। उनसे बड़ा मार्क्सवाद का जानकार शायद ही कोई रहा हो लेकिन वे इस नतीजे पर पहुंचे कि मार्क्सवाद में एक भी पंक्ति बेहतर इंसान बनाने के विषय में नहीं है।
लेखक शिवदयाल जी के विषय में रघुजी ने कहा उनके परिवार के तीन सदस्य आपातकाल में जेल में रहे। कार्यक्रम में मंच के पीछे लगे बैनर को ‘ ऐतिहासिक ‘ बताते हुए उन्होंने कहा इसमें गांधीजी, लोहिया, विनोबा और जेपी एक साथ हैं। जेपी की क्रांति को लोकचेतना व लोकसंगठन का संवाहक बताते हुए रघु ठाकुर ने कहा सरकारें बदलती रहती हैं लेकिन लोगों के मन के बड़े होने की प्रक्रिया निरंतर चलनी चाहिए।
जेपी से जुड़ा संस्मरण सुनाते हुए रघु जी ने कहा कि आपातकाल से ठीक पहले जबलपुर में उमड़ी नौजवानों की भीड़ से जेपी ने कहा था कि सागर में रघु ठाकुर पानी के सवाल पर आंदोलन कर रहे हैं, सबको वहां होना चाहिए।
रघु ठाकुर ने कहा जेपी ने कभी आर एस एस को को कोई प्रमाणपत्र नहीं दिया था। यह गलत प्रचार है कि उन्होंने कभी कहा कि आर एस एस फासिस्ट है तो वे भी फासिस्ट हैं।
यह भी विडम्बना है कि आपातकाल में जेपी के आग्रह के बावजूद उन्हें जेल में अकेले रखा गया, फिर बाद में एक कर्मचारी को भेज दिया। अंग्रेजों के शासन में भी लाहौर जेल में अनुरोध करने पर लोहिया जी को उनके साथ रखा गया था जिससे वे बातचीत कर सकें।
लेखक शिवदयाल ने पुस्तक ‘ जयप्रकाश परिवर्तन की वैचारिकी ‘ पर बोलते हुए कहा यह पुस्तक रघु ठाकुर जी को समर्पित की गई है जो भारतीय राजनीति में रचनात्मक विपक्ष के उसी तरह प्रतीक हैं। हमें उन नायकों को ईमानदारी से याद करना चाहिए जो सत्ताविरक्त थे, जिन्हें सत्ता से कोई मोह नहीं था।यह समय सबको साथ रखने का समय है। आज संसदीय लोकतंत्र उल्टी दिशा में चला गया है जहां नैतिकता के लिए जगह नहीं बची। लोकतंत्र नैतिक होगा तभी राजनीति लोकाभिमुख होगी।
शिवदयाल ने जेपी की वैचारिकी व जीवन यात्रा पर विस्तार से बोलते हुए कहा कि जेपी समाजवाद को जबरदस्ती लागू करने के पक्ष में कभी नहीं रहे। वे बड़े स्तर पर लोक शिक्षण को जरूरी मानते थे जिससे ऐसे लोकतांत्रिक मूल्य विकसित हों जिनसे सबका जीवन शुभ हो। स्वतंत्रता, उपनिवेशवाद से मुक्ति, साध्य साधन की पवित्रता में उनका विश्वास निरंतर एक वैचारिक प्रक्रिया से विकसित हुआ था। वे कहते थे कि समाजवाद लागू करने के लिए मूलभूत मानवीय मूल्यों की तिलांजलि नहीं दी जा सकती। मनुष्य मात्र की स्वतंत्रता उनके जीवन का आकाशदीप और चरम मूल्य बना। कांग्रेस के अंदर सन् 1934 में जो कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनी जेपी उसके एक नायक थे। 1940 में सीएसपी की एक रिपोर्ट तैयार करते हुए सामाजिक न्याय की बात उठाई थी। कैदियों के मानवाधिकार पर उन्होंने जोर दिया। स्वराज्य की रूपरेखा उनकी आंखों के सामने स्पष्ट थी, लेकिन मानते थे कि वो सपना काफी दूर है।
पद्मश्री से विभूषित माधवराव सप्रे समाचारपत्र संग्रहालय के संस्थापक विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि जेपी ने अनेक राजनीतिक विकल्पों में प्रेम के रास्ते को श्रेष्ठ माना। इसी भावना के कारण चंबल के 405 दस्युओं ने उनके कहने पर आत्मसमर्पण किया। उन्होंने दस्युओं को आश्वस्त किया किया था उन्हें प्राणदंड नहीं होगा। बाकी जो सजा तय होगी वह तो काटनी पड़ेगी। विनोबा ने डाकू माधौसिंह को किस उद्देश्य से भेजा है यह बिना किसी चिठ्ठी और बातचीत के जेपी ने समझ लिया था। आज की राजनीति से यह बात गायब हो गई है। श्री श्रीधर ने कहा आज रघु ठाकुर में वही चमक दिखाई देती है जो जेपी में थी। वे जिस तरह राजनीति को नैतिक रूप देने की कोशिश में हैं वह एक तरह से दुस्साहस है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में गांधी भवन के सचिव दयाराम नामदेव ने कहा जेपी के करुणामूलक पक्ष को समझना जरूरी है। चंबल के बागियों के आत्मसमर्पण के लिए दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में जेपी ने जो पहली बैठक बुलाई उसमें वे स्वयं मौजूद थे। बिहार में अकाल पड़ने पर भी उन्होंने राहत कोष बनाया था जिसमें रामचंद्र भार्गव, हरिश्चंद्र आदि थे। आज जरूरत है कि जेपी जिस समाजवाद को लाना चाहते थे वह हम सामान्य जन को समझाएं।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण पर केन्द्रित आज के इस आयोजन में बड़ी संख्या में जयंत तोमर, पांडे पूर्व श्रमायुक्त, मुकेश चंद्रा, विंदेश्वरी पटेल शंभु दयाल बघेल श्याम सुंदर यादव, चांदवानी अंकित मिश्रा,जावेद उस्मानी, निसार कुरैशी, शिवकुमार कक्का बहादुर सिंह विजय नेमा धीरेन्द्र सिंह, धर्मेंद राणा,बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, व सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोग मौजूद थे। धन्यवाद समता न्यास के श्री मदन जैन ने ज्ञापित किया।

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