ऐसे ही नहीं लगे संसद में जय भीम और जय समाजवाद के नारे?

चरण सिंह
जो नारे मंचों पर गूंजते रहे हैं वे नारे अब संसद में गूंज रहे हैं। वह भी सांसद पद की शपथ लेते हुए इस तरह के नारे उन सांसदों ने लगाये जो कुछ कर गुजरने के लिए लोकसभा में पहुंचे हैं। आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ने जय भीम और जय मंडल के नारे लगाये तो समाज पार्टी की सांसद डिंपल यादव और धर्मेंद्र यादव ने जय समाजवाद और असदुद्दीन ओवैसी ने जय भीम के साथ ही जय फिलीस्तीन का नारा भी लगा दिया। ऐसा ही नहीं विपक्ष के सांसदों ने ही संसद में नारे लगाये गये हों। सत्तापक्ष के सांसद भी भला कहां पीछे रहने वाले थे। बीजेपी सांसद छत्रपाल गंगवार ने जय हिन्दू राष्ट्र का नारा लगाया तो रवि किशन ने हर हर महादेव का नारा लगा दिया। मतलब क्या इस सत्र में भी नारेबाजी ही होगी ?
इसमें दो राय नहीं कि १८वीं लोकसभा में विपक्ष के सांसदों की संख्या ठीकठाक है। मतलब २३४ सांसदों के साथ दस साल बाद देश को मजबूत विपक्ष मिला है। राहुल गांधी के प्रतिपक्ष नेता बनने के बाद विपक्ष की स्थिति और मजूबत हुई है। तो क्या मजबूत विपक्ष नारेबाजी और शोर शराबा तक ही सिमट हो रह जाएगा या फिर जनहित के मुद्दों पर केंद्र सरकार को घेरेगा? जिस तरह के मुद्दे संसद में उठ रहे हैं उसके आधार पर कहा जा सकता है कि १८वीं लोकसभा का पहला सत्र ही शोर शराबे की भेंट चढ़नेे वाला है। समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद आरके चौधरी ने संसद में स्थापित सेंगुल का मुद्दा भी उठा दिया है। उन्होंने कहा कि संसद में स्थापित सेंगुल को हटाकर यहां पर संविधान स्थापित किया जाए। सेंगुल राजशाही का प्रतीक है। यह राजदंड है। लोकतंत्र में इसकी कोई जगह नहीं होनी चाहिए। सपा मुखिया अखिलेश यादव ने अपने सांसद की इस मांग का समर्थन करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री जी सेंगुल के सामने झुके थे। सांसद पद की शपथ लेते हुए वह भूल गये होंगे पर हमारे सांसद ने उन्हें याद दिला दी है।

राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही ओर से लचीला रुख अपनाया जाना चाहिए। पर हो यह रहा है कि सत्ता पक्ष विपक्ष को उकसा रहा है। जहां सत्ता पक्ष को डिप्टी स्पीकर पद विपक्ष को देना चाहिए वहीं विपक्ष को भी सदन चलाने में पूरा सहयोग देना चाहिए। प्रधानमंत्री यह तो कह रहे हैं कि बहुमत से सत्ता चलती है देश को चलाने के लिए तो सहमति होनी चाहिए। पर यदि सत्तापक्ष पहले ही बड़ा दिल दिखाता तो यह नौबत न आती। वैसे भी सत्र शुरू होने से पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को चेतावनी दे दी थी कि नखरे और हंगामा नहीं चाहिए। मतलब खुद प्रधानमंत्री चाहते हैं कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ओर से बवाल हो। नहीं तो ईमरजेंसी पर प्रधानमंत्री इतनी हायतौबा न मचाते। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को निंदा प्रस्ताव न लाने देते। न केवल लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला बल्कि राष्टपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रधानमंत्री की बात को आगे बढ़ा दिया। अब ऐसे में विपक्ष शांत कैसे रह सकता है? देखने की बात यह भी है कि संसद में जय भीम और जय समाजवाद के नारे ऐसे ही नहीं लगे हैं। इसके पीछे बड़े कूटनीतिक प्रयास हैं।

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