युवाओं की जिस माँग (शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा) को लेकर वे अडिग हैं, वह मांग मान लिये जाने के बाद भी शिक्षा की खामियों में कोई सुधार होने वाला नहीं है क्योंकि मोदी जी उनकी जगह अन्य किसी भाजपा नेता को शिक्षा मंत्री बना भी देंगे तो भी शिक्षा में जो खामियां अभी हैं, वे बरकरार ही रहेंगी। इन कमियों को सुधारने के लिये देश की शिक्षा नीतियों में बड़े बदलावों की जरूरत है। इसलिए शिक्षा में सुधार के उद्देश्य से शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की माँग “सोने का कंगन बनाने के उद्देश्य से कौड़ी की माँग” जैसी बात है जिससे असल मायने में कोई फायदा होने वाला नहीं है। शिक्षा व्यवस्था में बड़े सुधार हेतु भाजपा के नेतृत्व वाली वर्तमान केन्द्र सरकार को बदलना जरूरी है।
मानवतावाद एवं भारतीय दर्शन-आध्यात्म की समझ के अनुसार भी सोनम वांगचुक या अन्य किसी भी व्यक्ति को अपनी जान पर जोखिम लेने के निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है। शरीर प्रकृति की सम्पत्ति है जो कुछ समयकाल हेतु उपयोग के लिये प्रदान की गई है। इसलिए मृत्यु जैसे निर्णय प्रकृति के अधिकार में ही रहने चाहिये, व्यक्ति को यह निर्णय लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए चाहे वह अन्य किसी के शरीर के सन्दर्भ में हो या खुद के। प्रकृति द्वारा दिये गये शरीर को खुद का मानकर अपनी जान पर जोखिम लेना या समय पूर्व अपनी मृत्यु का निर्णय लेना प्रकृति के अधिकार क्षेत्र में बड़ी छेड़छाड़ करने जैसा है।







