दिल्ली शहर में नौजवान पीढ़ी जुल्म ज्यादती, गैर बराबरी के खिलाफ, तथा लोकतंत्र की तरफदारी, हिफाजत के लिए मौजूदा सरकार की नीतियों, कारगुजारियों के खिलाफ सड़क पर अपनी आवाज बुलंद कर रही है। जिसकी गूंज पूरे मुल्क में सुनाई दे रही है। परंतु उसके साथ-साथ इस बार के आंदोलन में सरेआम जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल हो रहा है क्या वह जायज है? उन नारों को यहां दोहराने की जरूरत नहीं, हर कोई वाकिफ है। सवाल यह पैदा होता है क्या वह एक सभ्य समाज को कबूल है? हर आंदोलन में नारे, आंदोलन की ताकत को दिखाने, धार को पैना , जत्थेबंदी करने, मजबूत फौलादी इरादे दिखाने के लिए किया जाता रहा है। एक सोशलिस्ट कार्यकर्ता होने के कारण, अनगिनत आंदोलनों में भाग लेने, सरकारी दमन, पुलिस की मार खाने, जेल जाने के वक्त लगाए जाने वाले नारे, जबरदस्त राह दिखाने, जोश भरने, मकसद बयां करने वाले होते थे, आम लोगों में भी उसके प्रति संवेदना, हमदर्दी पैदा होती रही है। उत्तर भारत में हिंदी में जो नारे सोशलिस्ट आंदोलन ने गढ़े आज भी उसकी धार और मार दूर तक अपना असर करती है। ‘दम है कितना दमन में, तेरे देख लिया और देखेंगे,
अभी तो यह अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है,
जेल के फाटक टूटेंगे, सारे सोशलिस्ट छूटेंगे,
जगह है कितनी जेल में तेरे देख लिया और देखेंगे’
धन और धरती बट के रहेगी, भूखी जनता अब ना सहेगी,
मांग रहा है हिंदुस्तान, रोजी-रोटी और मकान,
कमाने वाला खाएगा, लूटने वाला जाएगा, नया जमाना आएगा,
जो हिटलर की चाल चलेगा, वो हिटलर की मौत मरेगा,
जनभाषा में पढ़ने दो, हमको आगे बढ़ने दो,
लोकतंत्र की यही परीक्षा, खुला दाखला सस्ती शिक्षा,
राष्ट्रपति का बेटा हो या चपरासी की संतान,
सबको शिक्षा एक समान, महारानी मेहतरानी के बीच की दीवार को खत्म करो, खत्म करो,
ना मारेंगे ना मानेंगे,
हमला चाहे जैसा भी हो, हाथ हमारा नहीं उठेगा,
नारी मुक्ति और समानता के लिए कहा जाता था ‘हिंदुस्तान की प्रतीक नारी सावित्री नहीं, द्रौपदी है,
‘बलात्कार और वायदा खिलाफी को छोड़कर, मर्द औरत का हर रिश्ता जायज है’
लोहिया के विशेष अवसर के सिद्धांत में भी हर तरह की नारी पिछड़ी ही होती है, मानते हुए उसको विशेष अवसर मिलना चाहिए। जोरदार नारे लगते थे। एक और खास बात की तरफ ध्यान दिलाया जाता था की नारे, विरोध, गुस्सा प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, या सूबे के सबसे बड़े पद पर तैनात अधिकारी के खिलाफ लगाओ, नाकि किसी एक मामूली पुलिस वाले, चौकीदार, कर्मचारी के खिलाफ क्योंकि यह माना जाता था कि इस बेचारे की क्या औकात इसके पीछे तो इसके मालिक की ताकत है, उसी को पकड़ो। सरकारो के लिए भी बहुत आसान हो जाता है, किसी एक व्यक्ति विशेष के खिलाफ इंक्वारी बैठ कर, लीपा पोती कर, बाद में बेगुनाह सिद्ध कर दिया जाता है, सरकार पर आंच नहीं आती। उस वक्त टेलीविजन, यूट्यूब चैनल, मोबाइल, इंटरनेट, व्हाट्सएप, फेसबुक इंस्टाग्राम, आधुनिक प्रचार प्रसार के साधन थे ही नहीं आंदोलन गली मोहल्ले, गांव देहातों, शहर की सड़कों पर लोगों तक अपनी आवाज आहिस्ता आहिस्ता पहुंचाता था, परंतु पुख्ता जमीन पैदा होती जाती थी और फिर एक दिन लावा की तरह फूट जाता था।
आज का प्रचार तंत्र इतना मजबूत है कि वह किसी को एक दिन में, एक घटनाक्रम में, जीरो से हीरो भी बना सकता है और अर्श से फर्श पर भी बैठा सकता है, फिर सवाल पैदा होता है क्या उसका असर स्थाई होगा। सामाजिक जीवन की अपनी मर्यादाएं हैं। औरत और मर्द दोनों इसकी घुरी है। किसी एक वर्ग पर निशाना साघ कर सबको एक घेरे में लेकर सामूहिक फब्ती कसने से वक्ती मस्ती तो आ सकती है परंतु इसका असर उल्टा ही पड़ता है। अफसोस तो इस बात का है कि इस तरह की सार्वजनिक एवं अमर्यादित भाषा के इस्तेमाल के समर्थक भी अपनी प्रगतिशीलता दिखाने के लिए मैदान में आ जाते हैं, परंतु क्या वे अपने घर की बच्चियों से अपने घर खानदान के बीच में बैठकर इसको सुनने के लिए दिमागी रूप से तैयार हैं, या समाज इसको स्वीकार करता है। इस तरह की भाषा के इस्तेमाल से सबसे ज्यादा खुशी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी भाजपा पार्टी को है। आंदोलन के मुख्य मुद्दे से ध्यान हटाकर इसी गाली गलौज को दिखाकर आम लोगों में आंदोलन की तस्वीर को गलत तरीके से पेश करने का मौका उनको मिल जाता है।
मैं जानता हूं, हमारे कुछ तथाकथित प्रगतिशील, मेरे इस कथन पर पोंगापंथी, दक़ियानूसी, प्रतिक्रियावादी, आंदोलन विरोधी का फतवा दे देंगे। परंतु एक उम्रदराज, आंदोलनकारी रहने, तथा वर्तमान मोदी सरकार जो चंद मालदारो, को मूल्क की सारी दौलत को सौंपने तथा हिंदू मुसलमान की नफरत को फैलाने में लगी है, उसकी मुखालफत तथा आंदोलन की कामयाबी के लिए सही बात को दर्ज करना भी अपना फर्ज मानता है।
- राजकुमार जैन








