BRICS (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) और पश्चिमी देशों (मुख्य रूप से G7 देशों जैसे अमेरिका, यूरोपीय देश, जापान आदि) के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए, यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह एक नए शीत युद्ध (Cold War) की शुरुआत हो सकती है। हाल के घटनाक्रमों, जैसे कि 2025 में रियो डी जनेरियो में हुए 17वें BRICS शिखर सम्मेलन और अमेरिका द्वारा BRICS देशों पर अतिरिक्त टैरिफ की धमकी, ने इस बहस को और हवा दी है। हालांकि, स्थिति जटिल है और इसे कुछ बिंदुओं के आधार पर समझा जा सकता है:
BRICS का उदय और उसका दृष्टिकोण
वैश्विक प्रभाव: BRICS अब केवल एक आर्थिक गठबंधन नहीं है, बल्कि यह एक भू-राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर रहा है, जो वैश्विक दक्षिण (Global South) के हितों का प्रतिनिधित्व करता है। 2024 में इसके विस्तार के बाद, जिसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और इंडोनेशिया जैसे नए सदस्य शामिल हुए, BRICS अब वैश्विक आबादी के लगभग 60% और वैश्विक GDP का 40% से अधिक हिस्सा प्रतिनिधित्व करता है।
पश्चिमी संस्थानों के खिलाफ आवाज: BRICS ने विश्व बैंक और IMF जैसे पश्चिमी वित्तीय संस्थानों में सुधार की मांग की है और डी-डॉलरीकरण (de-dollarization) को बढ़ावा दे रहा है, जैसे कि स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और SWIFT के विकल्प तलाशना। यह अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देता है।
गैर-पश्चिमी मंच: BRICS को गैर-पश्चिमी देशों के लिए एक मंच के रूप में देखा जाता है, जो नॉन-अलाइन्ड मूवमेंट (NAM) की विरासत को आगे बढ़ाता है। यह पश्चिमी प्रभुत्व के खिलाफ एक वैकल्पिक व्यवस्था बनाने की कोशिश करता है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से “पश्चिम-विरोधी” नहीं है, जैसा कि रूस के उप-विदेश मंत्री सर्गेई रयाबकोव ने कहा।
पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया
पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया
अमेरिकी चिंता: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने BRICS को “अमेरिका-विरोधी” करार देते हुए इसके सदस्य देशों पर 10% अतिरिक्त टैरिफ की धमकी दी है। उन्होंने BRICS के डी-डॉलरीकरण प्रयासों को अमेरिकी डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व के लिए खतरा बताया।
पश्चिमी चिंताएं: पश्चिमी देश, विशेष रूप से अमेरिका, BRICS के बढ़ते प्रभाव और इसकी नई वित्तीय संरचनाओं, जैसे न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB), को अपनी आर्थिक और भू-राजनीतिक प्रभुता के लिए चुनौती के रूप में देखते हैं।
NATO का बदलता रुख: NATO, जो परंपरागत रूप से एक सैन्य गठबंधन है, अब साइबर सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी सहयोग जैसे क्षेत्रों में विस्तार कर रहा है, जो BRICS के आर्थिक और तकनीकी पहल के जवाब में देखा जा सकता है।
क्या यह शीत युद्ध है?
समानताएं:
शीत युद्ध की तरह, BRICS और पश्चिमी देशों के बीच वैचारिक और आर्थिक विभाजन दिखता है। BRICS वैश्विक दक्षिण के लिए एक मल्टीपोलर विश्व व्यवस्था की वकालत करता है, जबकि पश्चिमी देश एकपक्षीय (unipolar) व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं।
डी-डॉलरीकरण और वैकल्पिक वित्तीय प्रणालियों का विकास शीत युद्ध-युग की आर्थिक प्रतिस्पर्धा की याद दिलाता है, जब सोवियत संघ ने पश्चिमी प्रणालियों को चुनौती दी थी।
रूस और ईरान जैसे देशों पर पश्चिमी प्रतिबंधों और BRICS के उन प्रतिबंधों को बायपास करने के प्रयासों से तनाव बढ़ता है।
अंतर:
BRICS एक सैन्य गठबंधन नहीं है, जैसा कि शीत युद्ध के दौरान पूर्वी ब्लॉक था। यह मुख्य रूप से आर्थिक और भू-राजनीतिक सहयोग पर केंद्रित है।dxbnewsnetwork.com
BRICS के सदस्य देशों, जैसे भारत और यूएई, के पश्चिमी देशों के साथ भी मजबूत संबंध हैं। भारत, उदाहरण के लिए, BRICS को एक गैर-पश्चिमी मंच के रूप में देखता है, न कि पश्चिम-विरोधी।
BRICS के भीतर मतभेद, जैसे भारत-चीन सीमा तनाव, इसे एक एकजुट ब्लॉक बनने से रोकते हैं, जो शीत युद्ध-युग के सोवियत नेतृत्व वाले ब्लॉक से अलग है।
क्या शीत युद्ध छिड़ने वाला है?
संभावना: अभी के लिए, BRICS और पश्चिमी देशों के बीच तनाव एक पूर्ण शीत युद्ध में बदलने की बजाय एक आर्थिक और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के रूप में अधिक दिखता है। BRICS देशों का लक्ष्य पश्चिमी प्रभुत्व को संतुलित करना है, न कि सैन्य टकराव शुरू करना।
जोखिम: यदि अमेरिका अपनी टैरिफ नीतियों और प्रतिबंधों को और सख्त करता है, या यदि BRICS एक साझा मुद्रा या SWIFT जैसी प्रणाली को पूरी तरह लागू करता है, तो यह तनाव को बढ़ा सकता है। ट्रम्प की टैरिफ धमकियां और BRICS का जवाबी रुख इस जोखिम को दर्शाता है।
भारत की भूमिका: भारत BRICS में एक संतुलनकारी शक्ति है, जो इसे पश्चिम-विरोधी बनने से रोकता है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया है कि BRICS को वैश्विक संस्थानों को बदलने की कोशिश के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
शीत युद्ध की तरह, BRICS और पश्चिमी देशों के बीच वैचारिक और आर्थिक विभाजन दिखता है। BRICS वैश्विक दक्षिण के लिए एक मल्टीपोलर विश्व व्यवस्था की वकालत करता है, जबकि पश्चिमी देश एकपक्षीय (unipolar) व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं।
डी-डॉलरीकरण और वैकल्पिक वित्तीय प्रणालियों का विकास शीत युद्ध-युग की आर्थिक प्रतिस्पर्धा की याद दिलाता है, जब सोवियत संघ ने पश्चिमी प्रणालियों को चुनौती दी थी।
रूस और ईरान जैसे देशों पर पश्चिमी प्रतिबंधों और BRICS के उन प्रतिबंधों को बायपास करने के प्रयासों से तनाव बढ़ता है।
अंतर:
BRICS एक सैन्य गठबंधन नहीं है, जैसा कि शीत युद्ध के दौरान पूर्वी ब्लॉक था। यह मुख्य रूप से आर्थिक और भू-राजनीतिक सहयोग पर केंद्रित है।dxbnewsnetwork.com
BRICS के सदस्य देशों, जैसे भारत और यूएई, के पश्चिमी देशों के साथ भी मजबूत संबंध हैं। भारत, उदाहरण के लिए, BRICS को एक गैर-पश्चिमी मंच के रूप में देखता है, न कि पश्चिम-विरोधी।
BRICS के भीतर मतभेद, जैसे भारत-चीन सीमा तनाव, इसे एक एकजुट ब्लॉक बनने से रोकते हैं, जो शीत युद्ध-युग के सोवियत नेतृत्व वाले ब्लॉक से अलग है।
क्या शीत युद्ध छिड़ने वाला है?
संभावना: अभी के लिए, BRICS और पश्चिमी देशों के बीच तनाव एक पूर्ण शीत युद्ध में बदलने की बजाय एक आर्थिक और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के रूप में अधिक दिखता है। BRICS देशों का लक्ष्य पश्चिमी प्रभुत्व को संतुलित करना है, न कि सैन्य टकराव शुरू करना।
जोखिम: यदि अमेरिका अपनी टैरिफ नीतियों और प्रतिबंधों को और सख्त करता है, या यदि BRICS एक साझा मुद्रा या SWIFT जैसी प्रणाली को पूरी तरह लागू करता है, तो यह तनाव को बढ़ा सकता है। ट्रम्प की टैरिफ धमकियां और BRICS का जवाबी रुख इस जोखिम को दर्शाता है।
भारत की भूमिका: भारत BRICS में एक संतुलनकारी शक्ति है, जो इसे पश्चिम-विरोधी बनने से रोकता है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया है कि BRICS को वैश्विक संस्थानों को बदलने की कोशिश के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।






