विश्वासघाती चीन से अंतरंगता देशहित में नहीं : अजय खरे

हिंदी चीनी भाई-भाई के नारे लगाकर भारत के साथ विश्वासघात करने वाला चीन आज भी घुसपैठ कर रहा

चीन जैसी एकदलीय शासन व्यवस्था के जरिए भारत में लोकतंत्र खत्म करने की साज़िश तो नहीं हो रही

रीवा । समता सम्पर्क अभियान के राष्ट्रीय संयोजक लोकतंत्र सेनानी अजय खरे ने कहा कि इतिहास गवाह है कि भारत के लिए चीन से दोस्ती काफी घातक साबित हुई है। हिंदी चीनी भाई भाई नारा लगाकर पीठ में छुरा भोंका गया। एक स्वतंत्र देश‌ तिब्बत को हड़पने के बाद सन् 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण करके 40000 वर्ग किलोमीटर से भी अधिक भूभाग पर जबरिया कब्जा कर रखा है। श्री खरे ने कहा कि करीब 67 साल पहले तक चीन की दक्षिणी सीमाएं तिब्बत से मिलती थीं, भारत से नहीं। इतिहास में चीन कभी भारत का पड़ोसी नहीं था। दरअसल भारत की उत्तर दिशा में मौजूद पड़ोसी देश तिब्बत था। भारत और तिब्बत सीमा का निर्धारण मैक मोहन रेखा करती थी। चीन के द्वारा तिब्बत को हड़पने के बाद मैक मोहन रेखा को मानने से इंकार कर भारत के साथ सीमा विवाद बनाए रखा। चीन कभी नहीं चाहता कि भारत तिब्बत के सवाल को विश्व मंच पर रखे। इसके लिए उसने भारत के कई हिस्सों पर अपना दावा ठोकते हुए जानबूझकर सीमा विवाद की स्थिति निर्मित की है। एक तरफ उतरी सीमाओं एवं तिब्बत के सवाल को लेकर तत्कालीन नेहरू सरकार की आलोचना की जाती है और दूसरी तरफ चीन की लगातार घुसपैठ के बावजूद मोदी सरकार ,भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा उससे अच्छे संबंध बनाने की कोशिश दोहरा चरित्र है। लंबे समय से चल रहे भारत चीन सीमा विवाद के बीच इधर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधिमंडल का दिल्ली में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं से मुलाकात और उनके कार्यालय में हुई गुप्त बैठक को महज़ शिष्टाचार भेंट कहना सही नहीं है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का प्रतिनिधिमंडल यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या सरकार में बैठे हुए लोगों से कोई बात करता तो इसे कूटनीतिक संवाद कहा जा सकता है लेकिन साम्यवादियों और खासतौर से चीन से नफरत का दिखावा करने वाली भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अपने कार्यालय में उन्हें आमंत्रित करना सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस समय एक देश एक चुनाव की बात पर जोर दे रहे हैं। भारत में बहुदलीय लोकतंत्र है जबकि चीन में एक दलीय शासन व्यवस्था है। भारतीय जनता पार्टी जिस तरह से पूरे देश में एक पार्टी का शासन चाहती है और केंद्र – राज्य में डबल इंजन सरकार के नाम पर वोट मांगती है इससे ऐसा लगता है कि वह भी चीन की तर्ज पर भारत में भी एक दलीय शासन व्यवस्था थोपना चाहती है। यदि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपने दफ्तर में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधिमंडल को आमंत्रित करती तो निश्चित रूप से भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और यहां तक मोदी सरकार की ओर से भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलतीं। देखने को मिलता है कि लंबे समय से भाजपा नेताओं एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों का चीन का दौरा और उनके प्रति झुकाव बना हुआ है। ऐसे समय जब चीन भारतीय सीमाओं के अंदर घुसपैठ बनाए हुए है, उसका मुंहतोड़ जवाब देने की जगह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि मंडल से अंतरंग होना बहुत शर्मनाक है। अब सवाल यह है कि मोदी सरकार, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दोहरे मापदंड क्या देश और लोकतंत्र के लिए घातक नहीं है ?

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