Indian Politics : बिहार से बीजेपी ने एक्टिवेट किया ‘प्लान 50’, नीतीश-तेजस्वी के साथ ममता को भी झटका देने की तैयारी

Bihar Politics : लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बिहार पर बीजेपी अधिक ध्यान दे रही है। बीजेपी के बड़े नेताओं का दौरा शुरू हो चुका है। होम मिनिस्टर अमित शाह तो छह महीने में पांचवीं बार बिहार आ रहे हैं। क्यों है बिहार पर बीजेपी का इतना ध्यान?  

पटना । बिहार में बीजेपी ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। किसी भी सूरत में बीजेपी 2019 के परिणाम को 2024 में भी हासिल करना चाहती है। यही वजह है कि नीतीश कुमार का साथ छोड़ने के बाद वह छोटे दलों को एनडीए में लाने का प्रयास कर रही है। बीजेपी की सक्रियता का आलम यह है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह छह महीने में पांचवीं बार बिहार आ रहे हैं। दरअसल बीजेपी को बिहार में जीत सुनिश्चित करने की बेचैनी इसलिए भी है कि इसी बहाने वह पड़ोसी राज्यों- झारखंड और पश्चिम बंगाल को भी साधना चाहती है। बिहार की सफलता का संदेश साफ-साफ पड़ोसी राज्यों में सुनाई देगा।

 

बिहार के बहाने झारखंड पर भी बीजेपी की नजर

अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के कुछ ही महीनों बाद झारखंड विधानसभा के चुनाव होने हैं। दो साल बाद 2026 में पश्चिम बंगाल में भी असेंबली इलेक्शन होंगे। झारखंड में पुख्ता जमीन और पांच साल तक सरकार चलाने के बावजूद बीजेपी सत्ता में दोबारा लौटने से चूक गयी थी। इस बार वह कोई मौका गंवाना नहीं चाहती। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी और अपनी नीतियां लागू करने में नाकाम झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के नेतृत्व वाली सरकार की किरकिरी से भाजपा उत्साहित है। राज्य सरकार की विफलताओं को भुनाने का लोकसभा चुनाव बड़ा अवसर है। बिहार से ही अलग होकर झारखंड बना है। बड़ी संख्या में बिहार के लोग झारखंड में अब भी बसे हैं। उनका बिहार कनेक्शन अब भी बना हुआ है। लोकसभा चुनाव में कामयाबी का असर असेंबली इलेक्शन पर पड़ना स्वाभाविक है। भाषा, रोजगार और बिहारियों के झारखंड में रहने को लेकर जेएमएम सरकार के मुखिया हेमंत सोरेन के बयान भी अक्सर भड़काऊ आते रहे हैं। बीजेपी को भरोसा है कि बिहार और झारखंड की इस केमिस्ट्री का फायदा उसे दोनों राज्यों में लोकसभा चुनाव के साथ असेंबली इलेक्शन में भी जरूर मिलेगा।

बंगाल में बीजेपी को अब भी है सत्ता की उम्मीद

पश्चिम बंगाल में 2021 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को भले सत्ता नहीं मिल पायी थी, लेकिन सच कहें तो वह हारी भी नहीं थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मिले वोटों के मुकाबले करीब डेढ़ प्रतिशत कम वोट विधानसभा चुनाव में आये। अगर बीजेपी को लोकसभा जितने वोट मिले होते तो उसके विधायकों की संख्या 77 की बजाय 121 होती। भाजपा को भरोसा है कि बंगाल में पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान उसे मिले 40.30 वोटों का आधार अब भी बरकरार है। भले ही विधानसभा चुनाव में उसे 38.1 प्रतिशत वोट ही मिले, लेकिन उसके पहले हुए लोकसभा चुनाव में वह 40.30 प्रतिशत का आधार तो बना ही चुकी थी। बीजेपी का बंगाल पर फोकस इसलिए भी है कि 294 सदस्यों वाली विधानसभा में 84 सीटें रिजर्व कोटे की हैं। इनमें 68 अनुसूचित जाति और 16 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। रिजर्व सीटों में 45 पर ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी जीती थी, जबकि 39 पर बीजेपी। बंगाल चुनाव के बारे में यह सर्वविदित है कि हिंसा और भय के माहौल में वहां वोट पड़ते हैं। वाम मोर्चा शासन के जमाने से चुनावी हिंसा का इतिहास रहा है। भाजपा को उम्मीद है कि ठीक से चुनाव हों तो सुरक्षित सीटों पर उसे बड़ी कामयाबी मिल सकती है।

बिहार में सीमांचल से बंगाल को साधेगी भाजपा

भाजपा की सक्रियता जब बिहार के सीमांचल में बढ़ी तो महागठबंधन के दल भी बेचैन हो गये। अमित शाह ने बिहार में लोकसभा चुनाव का शंखनाद सीमांचल से ही किया। जवाब में सात दलों के महागठबंधन ने पूर्णिया में रैली की। सीमांचल में लोकसभा की चार सीटें हैं। इनमें पूर्णिया को छोड़ तीन सीटें 2019 के चुनाव में बीजेपी गठबंधन को मिली थीं। तब जेडीयू एनडीए का हिस्सा था। अभी आरजेडी वाले महागठबंधन का हिस्सा है। भाजपा का मानना है कि विधानसभा चुनाव में जिस तरह नीतीश की पार्टी 43 सीटों पर सिमट गयी थी, उससे यह साफ है कि नीतीश कुमार का जनाधार खत्म हो रहा है। लोकसभा चुनाव में जेडीयू ने अगर 16 सीटें जीती थीं तो इसके पीछे बीजेपी का साथ और नरेंद्र मोदी का चेहरा था। सीमांचल में अगर भाजपा की रणनीति कामयाब हो जाती है तो इसका सीधा असर बंगाल पर पड़ेगा। उत्तर बंगाल के कई जिले सीमांचल से सटते भी हैं।

छोटे दलों को साथ लाने पर बीजेपी का है जोर

बिहार में बीजेपी ने अपनी रणनीति तैयार कर ली है। छोटे क्षेत्रीय दलों को साथ लाने की पूरी कोशिश में भाजपा जुट गयी है। उपेंद्र कुशवाहा, पशुपति पारस और चिराग पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी के दोनों गुट, मुकेश सहनी की वीआईपी के साथ बीजेपी की बात तो पहले से ही चल रही है। अब जीतन राम मांझी की पार्टी हम को भी भाजपा पटाने में लगी है। दरअसल भाजपा जानती है कि उसकी मर्जी के खिलाफ बिहार में जाति आधारित गणना कराने का महागठबंधन सरकार का उद्देश्य पिछड़ी जातियों को पाले में करने के लिए ही है। इसलिए बीजेपी ने सम्राट चौधरी को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना कर पहले ही उसकी तोड़ निकाल ली है। उपेंद्र कुशवाहा तो पहले से ही कुशवाहा वोटों के ठेकेदार खुद को बताते रहे हैं। आरसीपी सिंह कुर्मी जाति का समीकरण बिगाड़ेंगे। मुकेश सहनी अपनी बिरादरी के वोटों के अभी तक एकमात्र दावेदार हैं। चिराग पासवान, पशुपति पारस और अगर जीतन राम मांझी से बात बन गयी तो तीनों दलित वोट झटकेंगे। यही वजह है कि भाजपा ने छोटे दलों को अपने साथ लेने की योजना बनायी है।

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