पैसा लेना है तो सड़कों पर उतर जाइये सहारा मीडिया के साथियों!

चरण सिंह

सहारा मीडिया फिर से उबाल आया है। यह उबाल तब आया है जब प्रबंधन ने अखबार बंद कर दिया है और बोल दिया है कि 4 महीने का वेतन लो और चलते बनो। दबी जुबान में आक्रोश तो सभी यूनिटों में है पर खुलकर सड़क पर अभी तक लखनऊ के साथी ही आए हैं। अभी समय है सभी यूनिटों की साथी सड़कों पर आ जाएं और पूरे हिसाब की बात करें। डीएलसी के बस की बात नहीं है सहारा से निपटना। नोएडा का उदाहरण सामने है। आरसी कटी हुई है। पैसा तो नहीं मिला न। एक मात्र आंदोलन ही है जो पैसा दिलवा सकता है। सरकार को दिक्कत होगी तभी सरकार हरकत में आएगी।

 

सहारा शहर कब्ज़ा लिया न सरकार ने ? सड़कों पर आओगे तो दूसरे संगठन भी साथ आने लगेंगे। पैसा चाहिए तो सहारा प्रबंधन के खिलाफ जनांदोलन खड़ा करो। निवेशकों की लड़ाई लड़ रहे संगठन भी मदद करेंगे। मैं अपने संगठनों के साथ आप लोगों का साथ दूंगा। अब जब कोई रास्ता नहीं बचा तो सहारा मीडिया के साथियों की समझ में आया कि सहारा प्रबंधन कितना गिरा हुआ है। ओपी श्रीवास्तव जेल में क्यों बंद है ? अनिल इब्राहम क्यों जेल में है ? समझ में नहीं आ रहा था क्या ? जब सहारा की सम्पत्ति बेची जा रही थी बवाल क्यों नहीं किया ?जेबी राय, सुशांतो राय सीमांतो राय विदेश क्यों भाग गए ? यह बात भी इन साथियों की समझ में नहीं आई ? जब कर्मचारियों को वेतन नहीं मिल रहा है तो ऐसे में सुमित राय को लाखों रुपए का वेतन क्यों दिया जा जा रहा है ? इन साथियों की समझ में नहीं आया ? अभी जो जो आवाज उठाता रहा है उसे बाहर का रास्ता दिखाया जाता रहा और दूसरे साथी चुप होकर बैठ गए। कुछ प्रबंधन के मुखबिर बने रहे। इनको लग रहा था कि ये जो साथी हक़ हकूक की लड़ाई लड़ रहे हैं ये पागल हैं। गत साल में जब मैं खुद नोएडा के गेट पर निवेशकों की लड़ाई पहुंचा और मीडिया के साथियों को भी आंदोलन में शामिल होने का आह्वान किया।

इन साथियों को लग रहा था कि इनकी नौकरी चल रही है। इनको वेतन देना प्रबंधन की मज़बूरी है। पीड़ा होती है कि 22 साल जिन साथियों के साथ काम किया उनमें से किसी एक का भी सहारा छोड़ने के बाद एक भी फोन हालचाल जानने के लिए नहीं आया। यह मेरी सहारा आंदोलन के प्रति प्रतिबद्धता थी कि विषम परिस्थितयों में हर स्तर से सहारा मीडिया के साथ ही सहारा निवेशकों के हक़ में अपनी आवाज बुलंद करता रहा।याद है न 2015-16 का आंदोलन ? इसी प्रबंधन के बहकावे आये थे न ? क्या मिला ? जलालत, विश्वासघात, अभाव, बेबसी। रिपोर्टिंग के साथी तो यह सोच रहे थे कि आंदोलन उनके वेतन के नहीं हो रहा है ? उनको वेतन की चिंता नहीं थी। कारण सब जानते थे। जिन साथियों का चूल्हा वेतन के अभाव में जल रहा था उनके बारे में इन लोगों ने कुछ न सोचा और अख़बार निकाल दिया। इनको लगता था की अख़बार निकलता रहेगा तो उनका काम तो चलता ही रहेगा।याद है न किन किन साथियों ने आंदोलन होते हुए अख़बार निकाला था ? किन लोगों ने आंदोलन से गद्दारी की थी ? आप लोगों ने अपनी कमजोरी खुद प्रबंधन को दी है।

सहारा प्रबंधन जान गया है कि ये कमजोर और बेबस लोग हैं। मेरा दावा है कि अब भी कितने साथी 4 महीने का वेतन लेकर समझौता कर लेंगे। क्योंकि लड़ना इनके बस की बात है ही नहीं। अभी भी किसी चमत्कार का इन्तजार कर रहे हैं। लखनऊ को छोड़ दिया जाए तो अभी भी खुलकर दूसरी यूनिटों के साथी सामने नहीं आए हैं। गुस्सा तो बहुत आता है सहारा मीडिया के उन साथियों पर जिन्होंने 2015-16 के आंदोलन से विश्वासघात किया और प्रबंधन के बहकावे में आ गए। वह भी बिना किसी तरह के वेतन लिए।फिर भी वेतन न मिलने पर क्या स्थिति होती है मैं बखूभी जानता हूं। विस्तार पर नहीं जाना चाहूंगा पर इतना जरूर कहना चाहूंगा कि यह जो अब सहारा प्रबंधन की मनमानी चल रही है। 4 महीने के वेतन के नाम पर इस्तीफा मांगा जा रहा है। वह भी जबरदस्ती। न बकाया भुगतान की चर्चा की जा रही है। न ग्रेच्युटी की। न पीएफ की और न ही वीआरएस की। यह नौबत क्यों आई ? आप लोगों ने अपने को कमजोर साबित किया। कमजोर आदमी हमेशा छोटे लालच में ठगा जाता है नुकसान उठाता है। यही सहारा मीडिया के साथ हो रहा है। फिर भी खड़े हों। हम लोग हैं। कंधे से कंधा मिलाकर साथ देंगे।

 

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