साहित्य में थूंक कर चाटना अगर विभत्स रस की श्रेणी में आता है तो क्या राजनीति में इसे ‘श्रृंगार’ रस की श्रेणी में आना चाहिए। अब जीएसटी या इसे लागू करने वालों को किस श्रेणी में रखा जाए ये जनता पर छोड़ देते हैं। इसलिए कि हम जनता ने ही राक्षसी बहुमत देकर कानून बदलने के नाम पर ‘हम चाहें ये करें, हम चाहे वो करें मेरी मर्ज़ी … करने की खुली छूट दे रखी है जो कि अब मनमर्जी हो गई है। नित नए नियम-कानून लागू कर देना, नित नई योजना शुरू कर देना वो भी बिना पुराने की उपलब्धियां/कमियां बताए। मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्किल इंडिया और डिजिटल इंडिया आदि इसके उदाहरण हैं।
ताज़ा मामला आठ साल पहले शुरू की गई चार-पांच स्लैब वाली जीएसटी को दो-तीन स्लैब कर देना।
अमर उजाला में प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल के अनुसार सरकार 2017 के बाद से ही इसके सुधारों पर काम कर रही है। करीब एक साल पहले विचार आया…’अब लोग समझने लगे हैं कि यह व्यवस्था क्या है?अब हमें मूल सिद्धांतों पर वापस जाना होगा। सान्याल अर्थशास्त्री भी हैं और क्रांतिकारी नामक किताब के लेखक भी। इसी तरह प्रसिद्ध उद्योगपति मुकेश अंबानी जीएसटी 2.0 उपभोक्ता मांग व कारोबार को गति मिलने वाला बता रहे हैं। अब इससे आम उपभोक्ताओं की आय कितनी बढ़ेगी यह तो अतीत के गर्भ में है पर मुकेश अंबानी की आय दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ सकती है यह सबको पता है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि आठ साल लगे वापस जाने यानी दो स्लैब तक आने में। अगर यही हाल रहा तो कौन जाने नोटबंदी 2.0 की घोषणा कर सरकार एक हज़ार और पांच सौ के पुराने नोटों को चलन में फिर ढकेल दे और मंत्री से लेकर संत्री, नौकरशाह से लेकर अमित शाह (सिर्फ तुकबंदी के लिए) और गोदी मीडिया से लेकर गोदी पत्रकार तक इसे मोदी जी का ‘मास्टर स्ट्रोक’ बताने लगें।
जीएसटी एक प्रभावी कर प्रणाली है। इस कर प्रणाली को 160 से अधिक देशों ने अपनाया है, लेकिन इसकी सफलता सरलता और कार्यान्वयन पर निर्भर करती है। न्यूजीलैंड और सिंगापुर की प्रणाली सबसे बेहतर मानी जाती है। जीएसटी का बढ़ता संग्रह रोजगार सृजन में मदद कर सकता है, बशर्ते निचले तबके को इसका लाभ मिले। कोई भी इस बात का अंदाजा लगा सकता है कि जिस देश की आधे से ज्यादा की आबादी पांच किलो मुफ्त राशन पर जीवन यापन कर रही हो उसकी माली हालत क्या होगी? हाल ही में अपने हाथों अपना गाल बजाया गया कि हम फलां देश को पछाड़ कर फलां स्थान पर आ गए हैं और कुछ ही सालों बाद फलां स्थान पर आ जाएंगे। पहले फ्रांस को पटकनी दी थी अब जापान को देने के मुहाने पर उसी तरह से खड़े हैं जिस तरह से विश्व गुरु बनने के मुहाने पर खड़े हैं। तो प्रति व्यक्ति आय और भारत की प्रति व्यक्ति आय में जमीन आसमान का अंतर है और किसी देश की आर्थिक सेहत का बेहतर मापक है। प्रति व्यक्ति आय भी है जो मायने रखती है।
बढ़ती जीएसटी : यह आर्थिक गतिविधियों खपत का संकेतक मात्र है। अधिक जीएसटी संग्रह से सरकार को राजस्व मिलता है, जिसे वह विकास परियोजनाओं में निवेश कर सकती है पर करती हुई दिखाई नहीं देती। हालांकि जीएसटी केवल अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा दर्शाता है।
प्रति व्यक्ति आय : यह देश के नागरिकों की आर्थिक समृद्धि और जीवन स्तर को। उच्च प्रति व्यक्ति आय से खपत, बचत और निवेश बढ़ता है, जो अर्थव्यवस्था को और मजबूत करता है। प्रति व्यक्ति आय को देश का आधार माना जाना चाहिए, क्योंकि यह लोगों की वास्तविक आर्थिक स्थिति को दर्शाता है। इसलिए बल्लियों मत उछालिए कि हमारे जीएसटी दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है। सवाल यह है कि हम कितना आगे बढ़ रहे हैं।
नोट बंदी के दौरान कहा गया कि इससे कालाधन वापस आएगा, आतंकवादियों की कमर टूटेगी और नक्सलवाद समाप्त होगा। इसमें से कौन सी एक चीज़ सच साबित हुई? 2014 से पहले कहा गया कि, गर कालाधन वापस आ जाएं तो सबके खाते में 15-20 लाख रुपए यूं ही आ जाएंगे, आये। आये तो नहीं पर गोदी मीडिया से लेकर गोदी पत्रकार तक हर चीज़ को मोदी जी का ‘मास्टर स्ट्रोक’ बताने लगते हैं। 2017 में जब जीएसटी लागू हुआ था न तब और जब स्लैब कम किया तब यह बताया था कि, पे एंड यूज़ शौचालयों में कितने फ़ीसद जीएसटी लगती थी और जीएसटी 2.0 में कितने फीसद है। निजी ऑपरेटरों द्वारा संचालित इन शौचालयों पर आज़ भी 18% जीएसटी लागू है।
जीएसटी एक प्रभावी कर प्रणाली है। जिसे 160 से अधिक देशों ने अपनाया है, लेकिन इसकी सफलता सरलता और कार्यान्वयन पर निर्भर करती है। न्यूजीलैंड और सिंगापुर की प्रणाली सबसे बेहतर मानी जाती है। जीएसटी का बढ़ता संग्रह रोजगार सृजन में मदद कर सकता है, बशर्ते निचले तबके को इसका लाभ मिले। कोई भी इस बात का अंदाजा लगा सकता है कि जिस देश की आधे से ज्यादा की आबादी पांच करोड़ मुफ्त राशन पर जीवन यापन कर रही है उसकी माली हालत क्या होगी? हाल ही में अपने हाथों अपना गाल बजाया गया कि हम फलां देश को पछाड़ कर फलां स्थान पर आ गए हैं और कुछ ही सालों बाद फलां स्थान पर आ जाएंगे। पहले फ्रांस को पटकनी दी थी अब जापान को देने के मुहाने पर उसी तरह से खड़े हैं जिस तरह से विश्व गुरु बनने के मुहाने पर खड़े हैं। तो प्रति व्यक्ति आय और भारत की प्रति व्यक्ति आय में जमीन आसमान का अंतर है जो किसी भी देश की आर्थिक सेहत का बेहतर मापक है। प्रति व्यक्ति आय भी है जो मायने रखती है।
बढ़ती जीएसटी : आये दिन यह सुनवाया जाता है कि जीएसटी संग्रह में हमने ये किला फतह कर लिया, गोया कद्दू में तीर दिया। पर नौकरियां कितनों को दिया। रोज़गार के कितने अवसर सृजित किए? यह नहीं बताएंगे और ज़ो बताएगा उसे राष्ट्रद्रोही कहेंगे।
जीएसटी आर्थिक गतिविधियों का संकेतक मात्र है। अधिक जीएसटी संग्रह से सरकार को राजस्व मिलता है, जिसे वह विकास परियोजनाओं में निवेश कर सकती है पर करती हुई दिखाई नहीं देती। हालांकि जीएसटी केवल अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा दर्शाता है।
प्रति व्यक्ति आय : यह देश के नागरिकों की आर्थिक समृद्धि और जीवन स्तर को। उच्च प्रति व्यक्ति आय से खपत, बचत और निवेश बढ़ता है, जो अर्थव्यवस्था को और मजबूत करता है। प्रति व्यक्ति आय को देश का आधार माना जाना चाहिए, क्योंकि यह लोगों की वास्तविक आर्थिक स्थिति को दर्शाता है। इसलिए बल्लियों मत उछालिए कि हमारे जीएसटी दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है। सवाल यह है कि हम कितना आगे बढ़ रहे हैं।
अमर उजाला का संपादकीय इसे जीएसटी का दूसरा दौर (दूसरी क्रांति) बता रहा है। वरिष्ठ पत्रकार नारायण कृष्णमूर्ति ‘नये युग का सूत्रपात’ तो फिर 2017 का जीएसटी-1 क्या था? किस युग की शुरुआत थी? मैं ये सवाल खड़े नहीं करूंगा कि, एक युग कितने साल का होता है और न ही ये कि धर्म ग्रंथों के अनुसार चार ही युग होते हैं, ये युग कहां से आ टपका!
सरकार के अनुसार जीएसटी छूट उन वस्तुओं और सेवाओं पर लागू होती है, जिन्हें जीएसटी परिषद ने शून्य कर स्लैब में रखा है, ताकि ये आम जनता के लिए सस्ती और सुलभ रहें। 22 सितंबर 2025 से लागू जीएसटी 2.0 (दो स्लैब: पांच और 18 और विशेष 40 फीसद स्लैब) के तहत छूट वाली वस्तुओं और सेवाओं की सूची में कुछ बदलाव आए हैं। यह निर्णय 56वीं जीएसटी परिषद की तीन-चार सितंबर 25 को हुई बैठक में लिया गया। गर ये बैठक में लिया गया निर्णय था तो 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से पीएम मोदी ने इसके संकेत ‘दिवाली तोहफे’ के रूप में क्यों दिये थे। इधर कुछ दिनों से एक नया फैशन चलन में आ गया है वह यह कि हर चीज को तोहफे से जोड़ दी जाती है। मसलन कर्मचारियों को एक तय समय सीमा के बाद डीए देना ही होता है लेकिन जब इसकी घोषणा होती है तो यह क्यों जोड़ दिया जाता है कि यह कर्मचारियों के लिए तोहफा है। यह तो पहले से यह तय चला आ रहा है कि हर 10 साल के बाद केंद्रीय कर्मचारियों के लिए वेज बोर्ड का गठन होना है। अब वेज वेज बोर्ड की घोषणा होगी जिसे आठवें वेतन आयोग के रूप में जाना जाएगा तो यह प्रचारित किया जाएगा कि, यह सरकार का अपने कर्मचारियों के प्रति दिया गया तोहफा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 जुलाई 2017 की मध्य रात्रि को संसद के सेंट्रल हॉल में जीएसटी लॉन्च किया और इसे अच्छा और सरल कर कहा। यह प्रणाली मल्टी-लेयर टैक्स प्रणाली की जगह एक ही टैक्स सिस्टम लाने वाली थी। उन्होंने इसे “एक राष्ट्र, एक कर” की तरफ़ एक बड़े कदम के रूप में प्रस्तुत किया और कहा कि यह भारत के लिए नए सशक्त आर्थिक संघ की नींव होगा।
मोदी ने 15 अगस्त 2017 को लाल किले से कहा था कि इससे ट्रक परिवहन में 30% की दक्षता बढ़ी, इंटर‑स्टेट चेकपोस्ट हटने से समय व रुपये की बचत हुई।
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जीएसटी को लोकतंत्र की परिपक्वता और समझ का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था निर्यात को प्रतिस्पर्धी बनाएगी और उद्योगों को एक समतल व्यापारिक उपयोगिता उपलब्ध कराएगी।
वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा कि इसको देश की अब तक की सर्वश्रेष्ठ और सबसे महत्वाकांक्षी टैक्स सुधार बताया, जिसमें केंद्र और राज्यों ने मिलकर सहयोग किया।
उन्होंने सभी राजनीतिक दलों के सहयोग के लिए धन्यवाद दिया और यह सुधार व्यापार और आम जनता दोनों के लिए फायदेमंद बताए। तब के कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इसको “गब्बर सिंह टैक्स कहा, क्योंकि इसके तहत 28% की उच्च दर और कई रिटर्न फॉर्म के कारण इसे जटिल बताया था। विपक्ष ने कहा कि सरकार ने उनकी सलाह को अस्वीकार कर केवल दिखावे के लिए यह मध्य रात्रि लॉन्च किया गया। और अब मोदी जी इसे बूस्टर डोज़ बता रहे हैं और सरकारी विज्ञापन आधारित गोदी मीडिया सरकार के पक्ष में बैटिंग कर रहा है। वैसे कर प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जिससे देश की बहुसंख्यक जनता को राहत महसूस हो।
अरुण श्रीवास्तव








