मानवाधिकार प्राकृतिक अधिकारों के रूप में संरक्षित : डा. राजेश कुमार यादव 

सुभाष चंद्र कुमार

समस्तीपुर। पूसा प्रखंड स्थित उमा पाण्डेय महाविद्यालय के पूर्वी परिसर में ‘राजनीति विज्ञान’ विभाग द्वारा ‘मानवाधिकार’ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता करते हुए  राजनीति विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डा० रंजीत कुमार राम ने कहा कि मानव अधिकार विश्व भर में मान्य व्यक्तियों के वे अधिकार हैं। जो उनके पूर्ण शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यावश्यक हैं। इन अधिकारों का उदभव मानव की अंतर्निहित गरिमा से हुआ है। विश्व निकाय ने 1948 में मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा को अंगीकार और उदघोषित किया। साथ ही इन्होंने उक्त विषय की राजनीतिक व संवैधानिक पहलुओं को विस्तार पूर्वक समझाया।

 

कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि डॉ राजेश कुमार यादव ने कहा कि सौहार्द के वातावरण में एक व्यक्ति का मानवीय अधिकार दूसरे व्यक्ति पर कर्तव्य आरोपित करता है। कर्तव्य के अनुपालन को विधि के द्वारा सुनिश्चित कराया जाता है। इस प्रकार इनसे सामाजिक सौहार्द के लिए सभी प्रकार के सिद्धान्तों को प्रबलता प्राप्त होती है। मानवाधिकार प्राकृतिक अथवा सार्वभौम अधिकारों के रूप में संरक्षित हित है । डा. वृंदावन लाल जाटव विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, ने उक्त विषय की साहित्यिक व्याख्या करते हुए कहा कि दरअसल मानवाधिकार के प्रकारों की कोई निश्चित संख्या नही है। मानवाधिकार की सूचि में समय के साथ बदलाव होता रहता है। मानवाधिकारों को सामान्य तौर पर प्राकृतिक अधिकार, नैतिक अधिकार, कानूनी अधिकार, नागरिक अधिकार, मौलिक अधिकार और आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकार की श्रेणियों में बांटा गया है।

विभागाध्यक्ष, समाजशास्त्र विभाग ने अपना व्याख्यान उपर्युक्त विषय के ऐतिहासिक व सामाजिक सहकारिता पर विस्तार पूर्वक दर्शाया। डा. वंदना कुमारी, विभागाध्यक्ष, दर्शनशास्त्र विभाग व डा मो कौसर अली, विभागाध्यक्ष, उर्दू विभाग भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान छात्र-छात्राओं द्वारा अपना विचार रखा गया जिसमें मुख्यरूप से प्रिया कुमारी, नैना कुमारी, काजल कुमारी, शांतनु, शिव, शिवम, जूली, सत्यम, सीमा, रंजन कुमार और रजनीश कुमार आदि ने अपना विचार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन स्नातक हिंदी प्रतिष्ठा का छात्र शिवम सरोज ने किया अंत मे धन्यवाद ज्ञापन प्रिया कुमारी ने किया।

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