आजम खां, पप्पू यादव और चंद्रशेखर की अनदेखी कर कैसे हो सकती है पीडीए की बात ?

चरण सिंह 

क्या सपा मुखिया अखिलेश यादव मो. आजम खां के लिए लड़ रहे हैं ? क्या मुलायम सिंह यादव के समय मो. आजम खां की यह दुर्गति हो सकती थी ? क्या मुलायम सिंह यादव ने कार्यकर्ताओं से मो. आजम खां के लिए सड़कों पर उतरने के लिए नहीं कहा था ? क्या अखिलेश यादव ने सपा कार्यकर्ताओं को सड़कों पर उतारा ? योगी आदित्यनाथ का दूसरा कार्यकाल चल रहा है पर अखिलेश याादव ने योगी सरकार के खिलाफ कोई बड़ा आंदोलन नहीं किया, जबकि वह विधानसभा में प्रतिपक्ष नेता रहे। अब तो अखिलेश यादव लोकसभा में पहुंच चुके हैं तो उत्तर प्रदेश में उनका संघर्ष क्या होगा ? अखिलेश यादव का रवैया चंद्रशेखर आजाद के प्रति ठीकठाक नहीं रहा। पीडीए का राग अलापने वाले अखिलेश यादव ने ऐन वक्त में चंद्रशेखर आजाद बीच मझधार में छोड़ दिया। ऐसा ही बिहार में लालू प्रसाद यादव ने पप्पू यादव के साथ किया। उनकी पार्टी का कांग्रेस में विलय भी करा दिया और जब पूर्णिया से चुनाव लड़ने क बात आई तो जदयू छोड़कर राजद में आईं बीमा भारती को पूर्णिया से चुनाव लड़ा दिया। मतलब वंशवाद पर टिके नेतृत्व को जमीनी नेतृत्व से असुरक्षा होती है। ये लोग दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यकों की बात तो करेंगे पर किसी दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक नेता को उभरते नहीं देख सकते हैं। क्या मो. आजम खां अल्पसंख्यक नेता नहीं हैं ? क्या पप्पू यादव पिछड़ा नेता नहीं हैं ? क्या चंद्रशेखर आजाद दलित नेता नहीं हैं ?

समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव लोकसभा में ३७ सीटें जीतकर फूले नहीं समा रहे हैं। यही वजह रही कि समाजवाद की बात करने वाली पार्टी में पीडीए का राग अलापा जा रहा है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि अखिलेश यादव का पीडीए का नारा वोटबैंक के लिए ही है या फिर पीडीए के लिए कुछ करना भी है। यदि समाजवादी पार्टी की गतिविधियों की बात करें तो पार्टी विपक्ष में रहने के बावजूद सड़कों पर कहीं दिखाई नहीं दे रही है। पीडीए के पक्ष में कोई बड़ा आंदोलन समाजवादी पार्टी ने नहीं किया। समाजवादी पार्टी के नेतृत्व पर बड़ा आरोप मोहम्मद आजम खां के पक्ष में खड़े न होना माना जा रहा है। नगीना से सांसद बने चंद्रशेखर आजाद को ऐन वक्त पर टिकट न देने के अखिलेश यादव के फैसले की बड़ी आलोचना हुई थी।
चंद्रशेखर आजाद ने जिस तरह से नगीना से लोकसभा चुनाव जीता है उसको लेकर अखिलेश यादव पर हमले बोले जा रहे हैं। यह माना जा रहा है कि अखिलेश यादव ने वंशवाद में अपने पिता मुलायम सिंह यादव को भी पीछे छोड़ दिया। पांच सांसद अखिलेश यादव, डिंपल यादव, अक्षय यादव, आदित्य यादव व धमेंद्र यादव तो अखिलेश यादव के खुद के परिवार के हैं। भले ही इन चुनाव में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, लोजपा (रामविलास), शिवसेना (उद्धव) राजद, एनसीपी, झामुमो का प्रदर्शन इन चुनाव में ठीकठाक रहा हो पर देखने की बात यह है कि वंशवादियों ने हर प्रदेश की राजनीति कब्जा ली है। भले ही संविधान बचाने और आरक्षण खत्म करने के नाम पर इंडिया गठबंधन का ठीकठाक प्रदर्शन रहा हो पर वंशवाद पर टिके नेतृत्व में अभी भी खास जान नहीं मानी जा रही है। सत्ता पक्ष में भी जयंत चौधरी, चिराग पासवान वंशवाद पर टिका नेतृत्व है। बीजेपी में अनुराग ठाकुर, जितेंद्र प्रसाद, करण शरण सिंह, पंकज सिंह जैसे कितने नेता वंशवाद के दम पर राजनीति कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के बाद उनके बेटे अखिलेश यादव, बिहार में लालू प्रसाद यादव के बाद उनके बेटे तेजस्वी यादव, झामुमो में शिबु सोरेन के बाद उनका बेटा हेमंत सोरेन, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और उनके बाद उनका बेटा आदित्य ठाकरे, एनसीपी में शरद पवार के बाद उनके बेटी सुप्रिया सुले, तमिलनाडु में करुणानिधि के बाद उनके बेटा एमके स्टालिन राजनीति में जमे हैं। गौर करने की बात यह है कि यह उत्तर प्रदेश में वंशवाद पर टिके नेतृत्व में असुरक्षा की भावना ही है कि चंद्रशेखर आजाद जैसे जुझारू नेता को इंडिया गठबंधन ने भी अपने हाल पर छोड़ दिया था। अंत समय में अखिलेश यादव ने चंद्रशेखर आजाद के लिए एक सीट भी नहीं छोड़ी। चंद्रशेखर आजाद अपनी पार्टी आजाद समाज पार्टी से चुनाव लड़कर संसद में पहुंचे। ऐसे ही बिहार पूर्णिया से निर्दलीय चुनाव लड़कर सांसद बने पप्पू यादव को भी लालू प्रसाद ने न तो खुद टिकट दिया और न ही कांग्रेस से टिकट देने दिया। मतलब ये वंशवादी किसी जमीनी नेता को उभरने नहीं देंगे। ऐसे में वंशवादियों के खिलाफ मोर्चा खुलना ही चाहिए। क्योंकि संघर्षहीन यह नेतृत्व विपक्ष की भूमिका निभाने में असफल रहता है। दस साल तक जनता मरती रही और ये नेता चुप्पी साधे रहे। यदि राहुल गांधी को छोड़ दें तो विपक्ष का कोई नेता जमीन पर नहीं दिखाई दिया।

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