अग्निवीर को आग में झोंकने वाली है अग्निपथ योजना?

चरण सिंह

कुछ भी हो प्रधानमंत्री ऐसे ही अग्निपथ योजना नहीं लाए हैं ? ऐसे ही इस योजना के तहत आने वाले जवान का नाम अग्निवीर रखा गया है ? अग्निपथ मतलब आग पर चलना। अग्निवीर मतलब आग से खेलने वाला यौद्धा। नाम के मामले में तो प्रधानमंत्री ने न्याय किया पर इन अग्निवीरों को सुविधा और सम्मान देना शायद प्रधानमंत्री भूल गये थे। कल्पना कीजिए कि छह महीने का प्रशिक्षण देने के बाद यदि जवान को बार्डर या किसी युद्ध में भेजा जाएगा तो उसे एक परिपक्व यौद्धा का सामना करना पड़ेगा ? क्या वह मुकाबला कर पाएगा ? क्या अग्निवीर को एक कम्लीट जवान बनाया जा रहा है? क्या अग्निवीर को एक जवान के बराबर सुविधाएं और सेलरी दी जा रही हैं? जवाब न में ही आएगा, क्योंकि यह प्रधानमंत्री का ड्रीम प्रोेजेक्ट है। हमारे प्रधानमंत्री भी लाजवाब हैं। लोग कोरोना महामारी से जूझ रहे थे कि प्रधानमंत्री ने किसान कानून और अग्निवीर योजना ला दी।

दरअसल अग्निपथ योजना को लेकर देश में बवाल मचा हुआ है। सत्ता पक्ष इस योजना की पैरवी कर रहा है तो विपक्ष इस योजना को गलत ठहरा रहा है। लोकसभा में प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी ने अग्निपथ योजना की खामियों को जोर-शोर से उठाया है। पंजाब लुधियाना के गांव रामगढ़ सरदार के अग्निवीर अजय कुमार को शहीद का दर्जा न मिलना तथा उनको केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित न मिलने का मुद्दा राहुल गांधी ने लोकसभा में प्रमुखता से उठाया। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने राहुल गांधी के बयान का विरोध किया। हालांकि अजय कुमार के पिता चरण जीत सिंह ने राजनाथ सिंह द्वारा एक करोड़ रुपये अजय कुमार के परिजनों को देने की बात को चरण जीत सिंह ने झूठ करार दिया। उन्होंने बताया कि उन्हें ४८ लाख रुपये मिले हैं वह भी अजय कुमार को इंश्योरेंस के। हालांकि सेना ने अजय कुमार के परिजनों को ९८ लाख रुपये मिलने की बात कही है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है आखिरकार इस योजना का इतना विरोध क्यों हो रहा है ? क्या यह योजना युवाओं को भा नहीं रही है ? क्या यह योजना युवाओं के साथ न्याय नहीं कर पाएगी ?
दरअसल इस योजना में चार साल की सेवा है। अग्निवीर को शहीद का दर्जा नहीं दिया गया है। उसे पेंशन भी नहीं मिलनी है। भर्ती अग्निवीरों में से मात्र २५ फीसदी को ही स्थायी नौकरी मिलेगी ? बाकी के अग्निवीरों को घर वापस भेज दिया जाएगा। अग्निवीर की सेवा भी मात्र चार साल की है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि चार साल के बाद जब यह अग्निवीर अपने घर लौटेगा तो उसके सामने पूरा का पूरा भविष्य पड़ा मिलेगा। उसके अंदर एक हीन भावना यह भी घर कर जाएगी कि वह २५ फीसदी में जगह न बना पाया। क्या यह अग्निवीर चार साल बाद फौज की प्रशिक्षण लेने के बाद कोई दूसरा काम कर पाएगा ? क्या इस अग्निवीर को कोई अपनी बेटी का हाथ दे पाएगा ? प्रश्न तो सबसे बड़ा यह है कि देश में जब नियमित भर्ती होती ही है तो इस अग्निवीर योजना की जरूरत क्या थी ? एक ओर सरकार रक्षा बजट बढ़ाने की बात कर है तो दूसरी ओर सेना के जवान को पेंशन न देनी पड़े, इसलिए अग्निवीर योजना लाई गई है। मतलब सेना में भी ठेका प्रथा शुरू कर दी गई है। कल्पना कीजिए कि छह महीने का प्रशिक्षण देने के बाद एक अग्निवीर को परिपक्व जवान के सामने लड़ने के लिए भेज दिया जाता है तो वह जवान उस जवान का मुकाबला कैसे करेगा ? क्या मौत के लिए उकसाने वाली यह अग्निपथ योजना नहीं है ?
मतलब किसान और मजदूरों के बेटों को मरने के लिए अग्निपथ योजना में शामिल कर लो और उनको मरने के लिए छोड़ दो। क्या सेना के अधिकारी युद्ध में इन अग्निवीरों को नहीं भेजेंगे ? क्या युद्ध में ये अग्निवीर पूरे मन से लड़ पाएंगे। जब अग्निवीर को यह जानकारी होगी कि न तो लड़ने से उन्हें तमगे मिलने हैं ओैर न ही उसका प्रमोशन होना है ओैर न ही उसको बहुत सुख सुविधाएं मिलनी हैं। अग्निवीर को तो सेना में भेजा जा रहा है आग में जलने के लिए। सेना की भर्ती में भी बनिया बुद्धि लगा दी गई और सेना में बङ़े बड़े पदाधिकारी भी इस मामले में मुंह खोलने को तैयार नहीं। नेता तो हर योजना में वोटबैंक तलाशने लगते हैं।

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