हाॅरर किलिंग सिर्फ एक हत्या नहीं, आधुनिक भौतिकवाद की लालसा, सामूहिक और सामाजिक सोच का विकृत रूप है

आधुनिक भौतिकवादी युग में हाॅरर किलिंग समाज की सामूहिक और सामाजिक सोच का नतीजा है। रिश्तों का मूल आधार प्रेम है। जब प्रेम में अधिकार की मिलावट हो जाती है तो वह किसी खतरनाक नशे की तरह बन जाता है। यह नशा इतना खतरनाक होता है। यानि उसकी जिन्दगी से लेकर उसके हर फैसले पर अपना फैसला थोप देता है। और उसकी जिंदगी को पिंजरे में कैद करने की भरसक कोशिश करता है। प्रेमी-प्रेमिका जीवन साथी या दोस्ती में कई बार लोग जिन्हें सबसे ज्यादा चाहते हैं। उन्हीं को अपनी मिल्कियत समझने लगते हैं। यदि वह हमारे मन के खिलाफ फैसले लें, या हमारी बात न माने, तो हम अपने आत्मसम्मान से जोड़ लेते हैं। यह भावना ही रिश्ते को पिंजरे में कैद कर देती है। हरियाणा में हाल में ही एक खिलाड़ी की हत्या करने के जुर्म में पिता को गिरफ्तार किया गया, जबकि पिता ने ही बेटी को खिलाड़ी बनाया था। यह हाॅरर किलिंग का सबसे ताजा उदाहरण है।

हम जिनसे ज्यादा प्रेम करते हैं। कई बार उन्हीं पर सबसे ज्यादा अधिकार जताते हैं। जब प्रेम में मिल्कियत की भावना घुल जाती है। तो वह रिश्तों को पिंजरा बना देती है। जहां प्रेम, मर्यादा आजादी सब कुछ झूठा लगने लगता है। और झूठी इज्जत के नाम पर समाज के तानों-बानों से परेशान होकर हत्या तक कर दी जाती है। यह अपराध किसी एक शख्स का नहीं, पूरे समाज का अपराध होता है। आइए जानते हैं कि हाॅरर किलिंग के क्या मायने हैं?

 

किसी पर अनचाहा हक थोपनाः-

 

जब प्रेम अपनी हद पार कर जाता है तो वह सिर्फ प्यार नहीं रहता, बल्कि अनचाहा हक बन जाता है। इसी लगाव और अनचाहा हक के चलते शख्स अपनी प्रेमिका को आजाद नहीं, बल्कि अपनी परछाईं समझने लगता है। लेकिन यही परछाईं जब अपनी दिशा चुनती है तो प्रेम अचानक स्वार्थ और नफरत का मुखौटा पहन लेता है। जब प्रेम अचानक गहराई में उतरता है तो उसमें चुपचाप अधिकार का बीज भी पनपने लगता है। प्रेम में हम इतना डूब जाते हैं कि सारी सीमाएं लांघ जाते हैं। जबकि इसे एकतरफा प्यार कहा जाता है। हमारा देश पुरुष सत्तात्मक की भावना से ओत-प्रोत रहा है। इसी सोच की वजह से व्यक्ति अपने अहंम के कारण दूसरे की जान लेने के लिए आतुर हो उठते हैं।

 

समाज में बदलाव टकराव के कारणः-

 

पुरुष प्रधान समाज में फैसला लेने की ताकत को पुरुष अपनी सता मानते हैं। लेकिन जैसे ही यह ताकत महिलाओं के पास जाती है तो उल्टे यह नागवार गुजरता है। हाॅरर किलिंग इसी मानसिकता का नतीजा है। जिसकी शिकार ज्यादातर महिलाएं ही होती हैं।

अहंम की भावनाः- रिश्तों में जहां तक हत्या की बात है। इसमें ज्यादातर मामले महिलाओं के साथ होते हैं। हालांकि आजकल जीवन साथी चुनने में समाज में काफी खुलापन आ गया है। नारी सशक्तिकरण की वजह से काफी तेजी से समाज में बदलाव आ रहे हैं। लड़कियों की मर्जी से भी रिश्ते तय किए जा रहे हैं। लेकिन समाज का एक बड़ा तबका आज भी रुढ़िवादी या पुरुष प्रधान सोच की वजह से महिलाओं पर अपना फैसला थोप देता है। जबकि प्रेम एक कुदरती भावना है। यह किसी को किसी के भी साथ हो सकता है। हाॅरर किलिंग या घरवालों के दबाव में हजारों लड़कियां उनका फैसला मान तो लेती हैं लेकिन रोज घुट-घुट कर मरती हैं। एकस्ट्रा मैरिटल रिलेशिनशिप में हो रही हत्याओं की वजह भी कहीं न कहीं लोगों को मनपसंद जीवन साथी चुनने का मौका नहीं मिलने की वजह है।

जागरुकता की जरुरतः- हाॅरर किलिंग सिर्फ एक हत्या नहीं, हमारे समाज की गहराई में पैठ बना चुकी उस सामुहिक सोच का विकृत प्रतिबिंब है। जो प्यार, आजादी और बराबरी को भी आज भी अपराध मानती है। समाज काफी बदला है। और महिलाओं ने कई सीमाओं और मान्यताओं को तोड़ा है। काफी चीजें समाज में स्वीकृत भी हुई हैं। लेकिन समाज में आज भी एक बड़ा तबका जिन्हें लड़कियों को अपनी जिंदगी के प्रति फैसला लेना मंजूर नहीं है, उनको अपनी बदनामी लगता है। और बेटी के फैसले को अपनी इज्जत और आत्मसम्मान से जोड़कर देखते हैं। लड़कियों की अंतरधार्मिक, अंतरजातीय और अंतरगोत्रीय शादी के नाम पर आज भी हत्याएं हो रही हैं, समाज तथा धर्म के ठेकेदार इन हत्याएं के पीछे मूकदर्शक या मौन स्वीकृति दे देते हैं। इन सभी कुकृत्यों से उपर उठकर समाज को जागरुक और कानून को सख्त बनाने की जरूरत है।

समाज की नैतिक जिम्मेदारीः- हाॅरर किलिंग समाज में एक बदनुमा सोच का नतीजा है। यानि हत्या तो एक शख्स करता है। लेकिन इसके पीछे दबाव पूरे समाज का होता है। जबकि हमारे देश का कानून 18 साल के शख्स को ‘‘फ्रीडम आफ विल’’ की इजाजत देता है। लेकिन समाज की सामूहिक सोच किसी शख्स के पीछे पड़ जाती है तो मजबूत से मजबूत इंसान भी टूट जाता है। सच तो यह है कि दुनिया में कोई भी क्राइम अगर समाज के नाम पर हो रहा है तो ऐसे मामले में नैतिक जिम्मेवारी यहां समाज की होती है। कहां प्रेम अपराध होता है, और आजादी विद्रोह। ऐसे माहौल में हत्या केवल बंदूक से नहीं होती, वह रोज नजरों, तानों और सामाजिक बहिष्कार से की जाती है। कई बार हत्या के लिए ट्रिगर किसी उंगली से नहीं, सौ जुबानों से दबाया जाता है। यह ऐसी हत्या होती है, जिसे समाज के ठेेकेदार मिलकर अंजाम देते हैं, पर नाम एक शख्स का लिखा जाता है।

अन्त में मेरा सभी युवाओं से आग्रह है कि आधुनिक भौतिकवाद की चकाचौंध को जमींदोज करते हुए मानवीय मूल्यों को अंर्तमन से स्वीकारें। आज देश नारी सशक्तिकरण के हर पहलू पर बारीकी से महत्व दिया जा रहा है। वर्तमान में जीना सीखें, अतीत से सबक लें, भविष्य में सुनहरे भविष्य की कामना करते हुए अपने साथी या प्रिय को भी स्वतंत्र अस्तित्व के आवरण में स्वीकारें। अगर हम वाकई अपनी साथी से प्रेम करते हैं तो हम समाज के घिसे-पिटे विचारों से उपर उठकर उनके फैसलों को सम्मान देना होगा। तभी आपका जीवन सार्थक सिद्ध हो सकता है। तभी कामयाबी की मंजिले फतेह की जा सकती हैं।

ज्योति स्वरूप गौड़
उप-निरीक्षक
दिल्ली-पुलिस

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