अरे, वह तो मेरा यार है!

राजकुमार जैन

आम बोलचाल में नई पीढ़ी अक्सर यह कहते हुए सुनाई देती है कि ‘अमुक तो मेरा फास्ट फ्रेंड है’ ‘अरे वह तो मेरा यार है’। बहुत अच्छा हो अगर यह सचमुच में हो, क्योंकि इंसानी जिंदगी में दोस्ती को छोड़कर बाकी नाते रिश्ते चाहते ना चाहते इंसान को निभाने पड़ते हैं, परंतु दोस्ती केवल और केवल अपनी पसंद है। अगर पसंद नहीं है तो छोड़ने में भी कोई बंदिश नहीं। मेरे दोस्तों का एक बड़ा दायरा पिछले 50-60 साल से रहा है। अगर सच्चा दोस्त हो तो इससे बड़ी नियामत भी नहीं, क्योंकि वही एक ऐसा इन्सान है जिसके साथ ,बिताए हुए दुख सुख के वक्त को खासतौर से जीवन के संध्या काल में जब बाहरी ताम-झाम दिखावे या आगे बढ़ने का कोई मतलब नहीं रह जाता। तब उसकी अहमियत समझ में आती है।
गर्मी की मार से झुलस्ती हुई दिल्ली में कुल्लू मनाली के गांव में दोस्त के घर पर गर्म कपड़े पहनने, ओढ़ने तथा दिल्ली की दूषित हवा, पानी की जगह पहाड़ के झरने से जड़ी बूटियों,मिनरल की संगत करके निकलने वाले अमृत जल की धारा का सेवन तथा हरदम पहाड़ और पेड़ों से आती स्वच्छ शीतल समीर का आनंद तथा बिना मिलावट के देसी गाय के दूध का सेवन कर रहा हूं तथा इस बहाने कुछ पढ़ाई लिखाई भी हो रही है। तो खबर मिली कि मेरे दोस्त जयकुमार की शादी की 50वीं वर्षगांठ पर दिल्ली में आयोजन होने जा रहा है। बिना सोचे फौरन बोरिया बिस्तर बांधकर दिल्ली की तरफ कूच करने की तैयारी कर ली, हालांकि यहां पर अभी एक महीना और रहना था। लोगों ने सलाह दी कि आप यह गलती क्यों कर रहे हो शादी की सालगिरह तो होती रहती है और कौन सी आपकी अपनी है।
इसी सवाल का जवाब देने के लिए यह लिख रहा हूं।
तकरीबन 62 साल पहले स्कूल में पढ़ते समय हम लोग चांदनी चौक की गली मैं रहते थे। आज तक मुझे उसका मकान नंबर जो 2202 था और मेरा 2250 याद है। मेरा उसका स्कूल अलग-अलग था, हमारे मोहल्ले के एक शिवालय में मरहूम मगन भाई जो कि कांग्रेस सेवा दल के सदस्य थे।मंदिर कें एक कोने में वाचनालय का संचालन करते थे। जिसमें हिंदी अंग्रेजी के कई दैनिक समाचार पत्र कुछ पत्रिका वहां पढ़ने को मिलती थी। वहीं पर गली के लड़के अखबार पत्रिकाएं पढ़ने आते थे। उसी में हमारे एक मित्र मरहूम चंदमोहन भारद्वाज जो हम सब में वरिष्ठ होने के साथ-साथ ज्ञान, जानकारी में भी हम सबसे अव्वल थे। खादी का कुर्ता पजामा ऊपर से खाकी जैकेट वह हमेशा पहने रहते थे। जयकुमार और उनके मकान की छत एक दूसरे से मिली हुई थी। एक और दोस्त नंदकिशोर वर्मा भी हमारे मित्र मंडली में शामिल थे। क्योंकि हम लोग शुरू से ही दिल्ली के सोशलिस्टों की संगत में आ गए थे हम सब साथी सोशलिस्टों के जलसों में भाषण सुनने के लिए जाने लगे। 1963 के उप चुनाव में डॉ राममनोहर लोहिया तथा आचार्य कृपलानी उपचुनाव में जीते थे। उनके स्वागत के लिए नव धार्मिक लीला कमेटी एवं सनातन धर्म सभा के अध्यक्ष एवं भूतपूर्व विधायक श्री प्रेमचंद गुप्ता ने दिल्ली नागरिक परिषद की ओर से उनके स्वागत समारोह का आयोजन पुरानी दिल्ली के सामने गांधी मैदान में आयोजित किया था। उसमें भी हम सब साथी शिरकत करने गए थे। स्कूल की पढ़ाई के बाद दिल्ली के किरोड़ी मल कॉलेज में जय कुमार ने बीए पास तथा मैंनें हिस्ट्री ऑनर्स में दाखिला ले लिया। बीए प्रथम वर्ष में ही मैंने दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन के उपाध्यक्ष का चुनाव लड़ा और जीत भी गया। यूनिवर्सिटी के नियमों के मुताबिक किसी भी पद का चुनाव लड़ने से पहले कॉलेज में सुप्रीम काउंसलर का चुनाव जीतना होता था। चुनाव प्रचार की सारी जिम्मेदारी जयकुमार निभाने लगे। मैंने अपने जीवन में अनेको चुनाव लड़े। हार पर तंबू उखड़ने तथा जितने पर जय जयकार तथा गर्दन फूल.मालाओं से लदी हुयी दोनों का मजा मैंने चखा है। जयकुमार साये की तरह चुनाव में भूखे प्यासे लगे रहते। खास बात यह थी कि दिनभर चुनावी तनाव तथा कई तरह की बातें सुनने को मिलती थी, और किसी पर तो मेरा वश चलता नहीं था, अपनी सारी भड़ास जयकुमार पर निकालता था। कई बार उसे समझ में भी नहीं आता था की अचानक यह ऐसे क्यों झल्ला रहा है। चांदनी चौक विधानसभा से विधायक चुना गया तो मेरे दफ्तर में रोजमर्रा के काम को भी यही देखते थे। हमारी दोस्ती का आलम यह था कि मेरी मां जयकुमार से कहती थी कि इसकी शादी करवाओ, इसने कोशिश भी की, लेकिन कामयाब बिचौलिया साबित ना हो सका। इसी तरह जयकुमार के पिताजी मरहूम लटूरी प्रसाद जी अपनी भाषा में मुझसे कहते च्यूंजी अपने दोस्त की ‘जाफत’ (शादी की दावत) कब करवाओगे।
यूनिवर्सिटी में मैं पहले हॉस्टल तथा बाद में सरकारी क्वार्टर में में रहने चला गया। हर रविवार जयकुमार बिना नागा मेरे घर आते थे।
उपरोक्त बातें साधारण है। मेरी जिंदगी मे ऐसा वाक्या मुझे याद नहीं जब कभी मेरे या मेरे घरवाले को कोई तकलीफ हो तो जयकुमार वहां न पहुंचा हो। दोस्ती का असली इम्तिहान तो आपातकाल में हुआ। मैं “मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट” मीसा मैं गिरफ्तार होकर तिहाड़ जेल में बंद हो गया। उस समय के खौफ भरे माहौल का आज अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। घर वाले, रिश्तेदार मिलने से कतराते थे। उस हालत में जयकुमार जेल में मिलने आते थे उनके साथ मेरे एक और दोस्त मुनीश्वर त्यागी एडवोकेट भी दो-तीन बार मिलने के लिए आए। एक और दोस्त डॉक्टर हरीश खन्ना (भूतपूर्व विधायक) ऐसे साथी थे जो लगातार जेल और अदालत में पेशी पर आने पर मुझसे पहले ही पहुंच जाते थे। मैं इनको समझाता था कि तुम मत आया करो यार तुम पकड़े जाओगे। जयकुमार की शादी विवाह, बच्चों के जन्म, घर में हर प्रकार के सुख-दुख के मौके पर हो ही नहीं सकता था कि मैं गैर हाजिर हो जाऊं। उस वक्त का सारा जिक्र करूं तो एक किताब ही बन जाए। जयकुमार की आदत में शुमार है, अगर कोई भी दोस्त परेशानी में हो वह पहुंच ही जाता है। दोस्ती के लंबान में मनमुटाव नहीं हुआ, अगर कभी कभार हुआ भी तो हमारी भाभी सुदेश (जय कुमार की पत्नी) ने मेरी तरफदारी करके इस शरीफ आदमी को ही जिम्मेदार ठहराया। भाभी सुदेश एक धर्म परायण, विनम्र, मिलनसार मृदु स्वभाव, तथा अपनी फर्ज अदायगी करने वाली महिला है। जयकुमार के बड़े भाई आदरणीय रामस्वरूप जी की धर्मपत्नी का असामयिक देहांत हो गया था। उनके छोटी उम्र की पांच बेटियां एक बेटा था। जिस तरह भाभी सुदेश ने उन बच्चों का लालन पोषण किया वह एक मिसाल थी। इसी कारण यें बेटियां जो आज हर तरह से संपन्न, धनाट्य परिवार की मालिकन हैं, उनका चाचा चाची के लिए जो आदर, लाड़ है वह सगे मां-बाप के समान है।
हां भाभी सुदेश से एक शिकायत जरूर है। जब जयकुमार की शादी हो रही थी बारात दिल्ली के मोती बाग में गई थी विवाह के बाद भाभी के घर वालों ने जयकुमार को तो घर के अंदर रख लिया हम बारातियों की हालत यह थी कि अब तुम्हारा क्या काम इस इस अंगने में। हम लोग पैदल दो ढाई किलोमीटर चलकर बस स्टैंड पर पहुंचे और इंतजार करने लगे की सुबह की पहली बस कब आए और हम अपने घर जाएं। उसस दिन भाभी ने जयकुमार पर जो कब्जा किया था वह दिन प्रतिदिन और मजबूत होता गया अब तो आलम यह है कि हमारा दोस्त जयकुमार बिना झिझक के कहता है की भाई मैं तो उनके बिना एक पल भी नहीं रह सकता। जय कुमार की शराफत का असर उनके दोनों बेटों पर भी पड़ा अजय (अज्जू) तथा हैप्पी (अमित) लायक, जिम्मेदार बेटे आज के दौर में मैं बहुत कम दिखतें हैं, बेशुमार दौलत और शोहरत होने के बावजूद उनका माता-पिता के साथ वह खुलूश और अदब का रिश्ता नहीं, जैसा की जयकुमार के बेटों का है। जय कुमार एक ऐसा इंसान रहा है जो कभी छल प्रपंच झूठ फरेब या ऊंची जबान में किसी से नही बोला। हां मेरे साथ आज भी एक झूठ लगातार बोलता चला आ रहा है जैसे हमें कहीं जाना है तो मैं उससे पूछता हूं कितने बजे चलना है, तो कहेगा 2:00 बजे जबकि जाने का समय 3:00 बजे है फिर मैं पूछूंगा कहां पर मिलना है तो वह कहेगा कड़कड़डूमा मेट्रो स्टेशन पर तीन 3:00 बजे। 2:30 बजे यह टेलीफोन करेगा कि मैं तो स्टेशन पर बैठा हुआ हूं, मैं हड़बड़ी में वहां पहुंचूंगा तो वह नदारद मिलेगा, टेलीफोन करने पर कहेगा बस पिछली मेट्रो में बैठा हूं, चार-पांच मेट्रो गुजर जाने के बाद श्रीमान जी प्रकट होंगे। इस झूठ के सिवाय मैनें और किसी झूठ को बोलते नहीं सुना। ऊंची तालीम एमए,एलएल,बी,कृष्णा मेनन इंटरनेशनल लॉ डिप्लोमा धारी, याफ्ता। द स्टेटसमैन जैसे अंग्रेजी अखबार में कार्यरत रहे, जयकुमार कनॉट प्लेस घूमने आए दोस्तों का अपने कार्यालय में चाय, ब्रेड पकोड़ा, समोसे से भोग भी लगवाते रहे।
उम्र के 80 साल के लपेटे में इस दोस्त की मौजूदगी का कितना बड़ा सहारा है, इसको शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। सच में कबूल करूं कि जितना जयकुमार ने मेरे लिए किया है उसका कर्ज में उतार नहीं सकता।
50 साल के दांपत्य जीवन की खुशी के जश्न में शामिल होने से मैं कैसे पीछे रहता। इसलिए कुल्लू मनाली से भाग कर दिल्ली की दहकती गर्मी में। आनंद लेने के लिए चला आया।

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