विचार की तपिश

डॉ राममनोहर लोहिया के वैचारिक दर्शन पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस बी, सुदर्शन रेड्डी ने विचारोंत्तेजक, गहन गंभीर, मीमांसा प्रस्तुत की है। संयुक्त विपक्ष इंडिया ब्लॉक के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जस्टिस बी सुदर्शन रेड्डी वैचारिक रूप से लोहिया के अनुयायी है।
आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर द्वारा आयोजित तृतीय डॉ. राममनोहर लोहिया स्मृति व्याख्यान-माला 2017 में श्री बी, सुदर्शन रेड्डी द्वारा दिया गया व्याख्यान।
(नोट: मूल व्याख्यान अंग्रेजी में है, इसका हिंदी रूपांतरण प्रस्तुत है।)

29 दिसम्बर, 2017

डॉ. राममनोहर लोहिया की स्मृति में व्याख्यान प्रस्तुत करने के कार्य को मैंने बहुत ही विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया है।
बीकानेर के महाराजा द्वारा लीग ऑफ नेशन्स में प्रतिनिधित्व का जिस वक्त विरोध किया तब लोहिया केवल बीस वर्ष के थे । कांग्रेस के विदेश विभाग की स्थापना उन्होने की। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की बुनियाद रखी। जेल में अंग्रेजों की प्रताड़ना सही। आजाद भारत में सोशलिस्ट पार्टी की नींव रखने के साथ समाजवाद में मानवीय तत्व को उन्होंने प्रमुख स्थान पर रखा ।
एक ऐसा इंसान जो जीवनभर अविराम गति से अमीरी-गरीबी की खाई पाटने, जाति और लिंग के भेद को मिटाने, बडी मशीनों के तकनीकि व सामाजिक दुष्परिणाम बताने में लगा रहा, असंख्य नर-नारी मुट्ठीभर लोगों के हिंसा व दमन के चक्र में पीढ़ी दर पीढ़ी क्यों फंसे है, उनके कारणों के विषय में सचेत करता रहा, उसकी दृष्टि का वर्णन क्या आसान है ?
जब भी मैं डॉ. लोहिया के बारे में सोचता हूँ, उनसे जुड़ा एक किस्सा याद आता है जो आज के समय में बड़ा प्रासंगिक लगता है । आजादी के बाद जब वे एक चुनाव में खड़े हुये तब एक खास समुदाय के लोगों ने एक उपासना स्थल के परिसर में उनसे चुनावी भाषण देने का आग्रह करते हुये कहा था कि अगर लोहिया ऐसा करते हैं तो उन्हें भारी संख्या में उस समुदाय के वोट मिलेंगे। लेकिन डॉ. लोहिया ने ऐसा करने से मना कर दिया और वे बहुत कम मतों से चुनाव हार भी गये। लोहिया मानते थे कि प्रार्थना स्थल जैसे पवित्र स्थल का उपयोग राजनीतिक प्रचार के लिये नहीं होना चाहिये, क्योंकि वह स्थल केवल मनुष्य की आत्मिक उन्नति के लिये है ।
डॉ. लोहिया ऊँचे नैतिक मूल्यों को धारण करने वाले एक सुसभ्य उच्चस्तरीय विद्वान एवं उदारवादी व्यक्ति थे । सामाजिक न्याय के दायरे में समाज के व्यापक हित के लक्ष्य के प्रति वे पूरी प्रखरता के साथ प्रतिबद्ध रहे ।
आज कई स्थानों पर कहीं मुखर तो कहीं दबे स्वर में अक्सर जब यह सुनने को मिलता है कि क्या भारत फासीवाद यानी तानाशाही की ओर बढ रहा है जहां लोकतांत्रिक मूल्यों को किनारे रख संवैधानिक व विधायी संस्थाओं को समझौते के लिये मजबूर किया जायेगा? संविधान के पक्ष में खड़े होने वाले लोगों को मिलने वाली धमकियाँ व पत्रकारों की हत्या को देखकर बरबस लोहिया याद आते है, और यह गीत ‘जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं?”
लोहिया को केवल ओजस्वी और मर्मस्पर्शी भाषणों के लिये याद किया जाये यह तो मैं नहीं कहूँगा । इस अस्थिर समय में जब यह कहा जा रहा हो कि पिछले साठ सालों में कुछ नहीं हुआ, जब विना सोचे समझे यह दावे किये जा रहे हों कि अब हम सब करने जा रहे है ।
परन्तु उन सिद्धान्तों को चिन्हित करने से पहले, तकनीक के अविवेकपूर्ण इस्तेमाल के प्रति डॉ. लोहिया की उन तलस्पर्शी चिन्ताओं को समझना होगा जिनमें जनसाधारण के दास बनने, लोकतन्त्र के ध्वस्त होने, समता व लोककल्याण के मूल्यों की समाप्ति के खतरे नजर आते हैं। हाल में मैनें विवेक वाधवा व अलेक्स सालकेवर की लिखी किताव ‘द ड्राइवर इन द ड्राइवरलेस कार : हाउ अवर टेक्नोलॉजीकल चॉयसेज विल क्रियेट द फ्यूचर, अमर्त्य सेन ने जो कुछ कहा है लगभग वही उन्होंने कठोर शब्दों में कहा है ।
मैं विनम्रता पूर्वक कहना चाहूँगा कि डॉ. लोहिया के जीवन और विचारों को यदि समझना है तो जिस एकांगी (एकरूप ) मानसिकता या ‘मोनोटोनिक माइंड के खिलाफ वे जीवनभर जूझते रहे उस संधर्ष को समझना होगा। हॉलांकि उन्होंने (डॉ. लोहिया) इस शब्द का उपयोग बड़ी मशीनों के संदर्भ में किया है । ई. एफ. शुमाखर ने ‘स्मॉल इज ब्यूटीफुल— बताते हुये उत्पादन में इंसान के श्रम का उपयोग करने वाली जिस वैकल्पिक तकनीक को अपनाने की जरूरत बताई है, डॉ. लोहिया उसी अर्थशास्त्र को राजनीति में लागू करना चाहते थे । यह एक सही सिद्धांत हो सकता था, भले कुछ हद तक अधूरा हो । आखिर डॉ. लोहिया वंचित समुदाय को समर्थ बनाने के प्रबल हिमायती होने के साथ-साथ इस बात के लिये लड़ते भी रहे। भारत की महिलायें इंटरनेट की मदद से अपने पुरूष साथियों को अगर यह बता सकें कि दूध का सबसे अच्छा दाम कहाँ मिल रहा है, तो लोहिया इसका विरोध करते ऐसा शायद ही कोई कहे । नई पीढ़ी ज्ञान के समुद्र में ( इंटरनेट के जरिये ) गोते लगा रही हो और लोहिया इसका विरोध करते ऐसा भी नहीं। लेकिन राजनीति के कुछ नासमझ लोग लगातार डॉ. लोहिया को विज्ञान एवं तकनीक के विरोधी के रूप में प्रचारित करते रहे। हमें लोहिया को समझने के लिये संदर्भ के साथ और गहराई से अध्ययन की जरूरत है ।
हम आज तक देश के बच्चों को ठीक-ठाक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में समर्थ नहीं हुये हैं । जस्टिस जीवन रेड्डी ने जिस तत्व को संविधान में दिये जीवन के अधिकार के साथ जोड़ा था उसे लागू करने में ही हमारे नीति-निर्माताओं को १४ साल लग गये ।
प्रदेशों के बीच, शहर और गाँवों के बीच, अगड़ी – पिछड़ी या जाति के ऊँच-नीच के बीच जब देश बँट गया तब कहीं एक दशक बाद १४ वर्ष तक की मुफ्त शिक्षा के अधिकार को लागू किया जा सका । हमारे नीति-निर्माता एक ओर देश के युवाओं को गरीबी से बाहर खीचनें की बात कह रहे है, उसी समय पहले पायदान की नौकरियां बड़े पैमाने पर घट रहीं है ।
थॉमस पिकेटी ने बढ़ती गैरबराबरी की तीव्रता को दर्ज करते हुये कहा है कि पिछले पाँच-दस वर्षों में राष्ट्रों के अंदर व तमाम दुनियाभर में वैश्वीकरण व नवउदारवादी नीतियों के चलते बेरहम ढंग से असमानता बढ़ी है । पिछले ४० साल में आर्थिक-सामाजिक दृष्टि से समृद्ध अभिजात्य वर्ग की संख्या में जिस तेजी से इजाफा हुआ है उसे देखते हुये नहीं लगता कि साधनहीन व साधनसंपन्न वर्ग के बीच की खाई आने वाले समय में इतनी आसानी से पटेगी।
औपनिवेशिक शोषण के कारण औद्योगिक क्रांति का जो दूसरा
दौर आया उस अवधि में देशों के बीच जो असमानतायें बढ़ी उस पर नजर दौड़ाई जाये । अध्येता व नीति-निर्माता ये कह सकते है कि गैरबराबरी की यह खाई कुछ ही पीढ़ियों में ज्यादा से ज्यादा एक शताब्दी के अंतराल में पट जायेगी । लेकिन निकट भविष्य में तो यह खाई कम होती नहीं दिखती। युवाल नोहा हरारी के मुताविक तेजी से बढ़ती डाटा या आँकड़ों पर आधारित दुनिया में अब बहुत सी चीजों के साथ शक्ति या सत्ता का अर्थ व स्वरूप बदलने के लिये मानव समुदाय ने खुद ढालने की तैयारी कर ली है । मृत्यु पर विजय पाने जैसे चमत्कारों का हम दम साध कर इंतजार कर रहे है । ये अलग बात है कि इसकी कीमत हमें बड़े पैमाने पर असमानता व एक नये वैश्विक अभिजात वर्ग के उदय के रूप में चुकानी पड़ सकती है । गार्जियन अखबार में टिम एडम इसे बडी खूबसूरती से बयाँ करते हैं-
“ तकनीक में अति समृद्ध लोग जो डाटा – संसार के प्रभु होंगे वे ही अति मानवीय क्षमताओं से लैस होकर सुदीर्घ आयु भी प्राप्त करेंगे। इसी बीच मशीनों के चलते बेरोजगार हुआ मानव समुदाय का एक ‘निरर्थक वर्ग’ पनपेगा जो न व्यापार जगत के काम आयेगा और न सैन्य कार्यों में। गणनाओं एवं आंकड़ों में इस कदर विश्वास दृढ़ होगा कि वे ही पवित्र मान लिये जायेंगे। आदर्श लोक की कल्पना में खोये रहने वालों के लिये यही नियन्ता शक्ति सर्वज्ञाता सर्वव्याप्त होगी जिसे किसी ईश्वर से अलग करके देखना सम्भव न होगा । पृथ्वी के निवासी इससे निरंतर जुड़े रहेंगे । दुःस्वप्न देखने वाले भी इससे अछूते न होंगे। आने वाले समय के चरम समृद्ध लोगों का हमें अभी से कुछ-कुछ आभास होता है । क्या नहीं होता?
हमने अभिजात निर्णय-कर्ताओं की एक सतह बनाई है जो अनुपातहीन सम्पत्ति की दैत्याकार अर्थव्यवस्था के शिखर पर बैठकर दुनिया को अपने ढंग से चला रहें है, सारे निर्णयों को वे प्रभावित करने की क्षमता रखते है ।
मैन्युअल कैसल नामक एक विद्वान ने सन् २००० में ऐसी अर्थव्यवस्था को ‘नेटवर्क इकोनॉमी’ कहा था । कैसल ने आगाह किया था कि जैसे-जैसे आर्थिक अस्थिरता बढ़ेगी असमानता वृद्धि की गति तेज होगी। सरकार व नीतिनिर्धारकों के साथ जनता समाज-मनौवैज्ञानिक रूप से बढ़ती दूरी को भी अनुभव करेगी । चुनाव प्रणाली की वाध्यता के चलते वे ( जनप्रतिनिधि) परिश्रम पूर्वक लोक कल्याण के कार्य करते हुये भी दिखेंगे परन्तु संवैधानिक संस्थायें कमजोर होती जायेंगी, साथ ही खास उन्मादी धार्मिक समूहों का प्रभाव बढ़ेगा ।
पिछले कुछ वर्षों में इस किस्म का राजनीतिक विकास नजर आ रहा है जिसमें उदारवादी संवैधानिक लोकतंत्र कमजोर हुआ है । निरंतर हमें ऐसे निराशाजनक स्वर सुनाई देते है जिसमें विखंडित दुनिया, विखंडित राष्ट्र, विखंडित समाज की तस्वीर उभरती है। हम यहां कैसे आ पहुँचें ? और इतनी तेजी से? क्या डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे प्रज्ञावान बौद्धिक की अंतदृष्ट्रि को हमने अनदेखा किया है?
एकांगी मस्तिष्क व तर्क यानी, मोनोटोनिक माइंड के समाज पर, खासकर असमर्थ लोगों पर क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा इस विषय में डॉ. लोहिया की शंकाओं व चेतावनियों को हमने अनदेखा किया है । डॉ. लोहिया मानते थे कि नैतिक तर्क के बिना कोई भी कार्य वैसा ही है जैसे बिना क्रिया का कोई वाक्य । यही बात थी जिसने उन्हें नागरिक स्वतंत्रता का प्रवल पक्षधर, उदारवादी संवैधानिक लोकतंत्र का भाष्यकार बनाया जिसके अंतर्गत समतावादी लक्ष्य की जरूरत सबसे पहले है ।
अपने विचार व कर्म से डॉ लोहिया सदैव, ‘नॉन-मोनोटोनिक’ परिवेश के निर्माण का प्रयास करते रहे जिसमें उनके ज्ञान आधारित सिद्धांतों का निर्देशन रहा ।
जिस समाज में लोहिया रहे, बड़े हुए और जब उन्होंने सिविल नाफरमानी के आंदोलन चलाये वह युग साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, फासीवाद, पूँजीवाद यहाँ तक कि मार्कस – लेनिनवाद के चरम प्रभाव का युग था । ये सभी विचार ‘मोनोटोनिक लॉजिक’ की ही उपज थे । इस तरह के मस्तिष्क व तर्क हमें व्यक्तिगत व सामुहिक स्तर पर किसी भी वैकल्पिक तर्क के प्रति अंधा बना देते है । हम इसके परिणामस्वरूप होने वाले दुष्प्रभाव को देखने से इंकार कर देते है । दार्शनिक जॉन ग्रे उदारवाद की एक बुनियादी विभाजन रेखा की तरफ इशारा करते हैं।
एक तरफ उदारवाद कहता है कि केवल एक ही वस्तुनिष्ठ सत्य है । दूसरी तरफ उदारवाद यह भी कहता है कि भिन्न विचार अनुभव, नजरिया (दृष्टि) आवश्यकता के प्रति सहनशीलता व जो पिछड़ गये हैं उनके प्रति समानुभूति एक अच्छे समाज की प्रगति की अनिवार्य शर्त है । इसीमें न्याय निहित है ।
पहले दिये गये तर्क के साथ सबसे बड़ा खतरा यह है कि अशुद्ध तर्कों के आधार पर हम जिस निष्कर्ष पर पहुँचे है उसे ही हम चरम सत्य मान लेते हैं, साथ ही साथ इस नतीजे पर पहुँचना भी सरल है कि जो सहमत नही है वे पराये हैं, दुष्ट हैं, अराजक – असामाजिक तत्व हैं, विकास विरोधी हैं, राष्ट्र-विरोधी हैं। जिन गलत तर्कों के आधार पर हम किसी को पराया साबित करते है, उसी आधार पर असहमति के स्वरों की समाप्ति के लिये जुल्म की शुरूआत होती है, दूसरी तरफ भिन्न दृष्टि के साथ हमें कई तरह की दिक्कतें है । जैसे- केवल तर्क के लिये तर्क करना, अपने हर तर्क को सही ठहराना और इसके उपरांत अपनी समझ के विपरित कुछ भी न करने की जिद । इसके चलते तत्काल वितंडा खड़ा होता है, व्यावहारिकता के नाम पर आवेग के तीव्र स्वर सुनाई देने लगते हैं जिसे अक्सर हकीकत या यर्थाथ कहा जाता है इसी वक्त उन तत्वों की लूटमार को सही ठहराया जाता है जिनके लिये समाज केवल एक बाजार होता है । मूल्यों का बाजार, विचार, स्वतंत्रता व अधिकारों का बाजार । यह सब कुछ होता है उन के द्वारा जो समाज व मनुष्यता से कटे हैं । और इस तरह समाज के ऊपर बड़ी मशीन की प्रभुता कायम होती है। डॉ लोहिया कहते थे ज्ञान, सम्पदा और अपनी आवाज को पूरी ताकत से पेश करने के मंच जैसी तीन चीजों में से जिसके पास कम से कम दो चीजें होगी, उसकी प्रभुता कायम होगी । इसीके चलते मोनोटोनिक माइंड, यानी एकांगी मस्तिष्क बनेगा, नैतिक मूल्यों के ढ़ाँचे में चुप्पी छा जायेगी, समानुभूति खत्म होगी और मनुष्य जगत के साथियों के दुखों के प्रति उदासीनता पैदा होगी ।
इतिहास इस किस्म के दिमागों (मोनोटोनिक मांइड) के उदाहारण से पटा पड़ा है जिन्होने ऐसे सिद्वांत और अवधारणाओं को जन्म दिया और पोषित किया। नाजी जर्मनी का प्रादुर्भाव व फासीवाद का उदय इसका एक विशिष्ट उदाहरण है । हम यह याद रखें कि नाजी जर्मनी में
हम और आप जैसे साधारण लोगों ने भी किस तरह असहिष्णुता
अमानवीयता के दौर में आँख पर पटटी बाँध ली थी। जो लोग अमूमन बड़े शिष्टाचारी थे, एक दूसरे की भावनाओं का आदर करते थे वे भी उस समय नरंसहारो से सहमति जता रहे थे, केवल यह सोचकर कि ऐसा राष्ट्रगौरव, ऐसा विकास, ऐसी अर्थव्यवस्था जो उनके देश को विश्वशक्ति बना दे उससे बढकर कुछ भी नहीं । वे यह भी मानते थे कि इस तरह के लक्ष्य तक पहुँचने का एक ही रास्ता है । अगर कोई हटकर वैकल्पिक रास्ता सुझाता था, यहां तक कि किसी भी तरह के वैकल्पिक रास्ते सुझाने वाली संस्थाओं व व्यक्तियों का उन्मूलन कर दिया जाता था। एक सांस्कृतिक अंधता थी ।
डॉ. लोहिया इतिहास के विद्यार्थी थे। डॉ. लोहिया को उन्हीं के शब्दों मे याद करना उचित होगा —
“नागरिक-स्वतंत्रता व अधिकार की अवधारणा राज्य के विरुद्ध नागरिक के सतत संघर्ष से हासिल हुई है। समूचे इतिहास में राज्य और उसके कानून ने नागरिक को तरह तरह से प्रताड़ित किया है जिसने भी राज्य की आलोचना की प्रताड़नाओं के साथ उसे निर्वासन, यहाॅ तक कि मृत्युदंड तक झेलना पड़ा। उसकी वहुमूल्य वस्तुएँ छीन ली गई। ऐसी स्थिति में नागरिक ने ऐसे सुरक्षित स्थलों की भी तलाश की जहाँ से वह अपने समय की ज्यादतियों और बुराईयों के खिलाफ मोर्चा ले सके। जब नागरिक अधिकार बहाल रहतें है तब दमन के खिलाफ प्रतिरोध में भी भय नही रहता ।”
इसी ऐतिहोसिक अवधारणा ने डॉ लोहिया के विचार और कर्म के मार्ग को प्रशस्त किया । वे उन अर्थो में राष्ट्रवादी थे जिन अर्थो में भारत की समस्याएँ, उनकी जरूरतें और उसकी विशेषताओं को पता चलता है ।
डॉ. लोहिया की सबसे बड़ी चिन्ता यह थी कि बिना हिंसा के वांछित बदलाव के लिए संवाद की गुंजाइश कैसे बनी रहे, क्योंकि मार्क्सवादी व्यवस्था हो या पूंजीवादी, दोनों में ही एकांगी या ‘मोनोटोनिक’ होने का खतरा है। ब्राज़ील के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री पाओलो फ्रेरे ने जिस मनुष्यता की खोज की ज़रूरत बताई है, डॉ. लोहिया अपने जीवन और विचार से एक नैतिक जीवन के इसी सिद्धांत को सर्वोपरि रखना चाहते थे । दमन से मुक्ति के हर संघर्ष में अक्सर यह देखने में आता कि दमन का शिकार लोग ही बाद में दमनकारी के साथ वही व्यवहार करने लगते हैं जैसा पहले उनके साथ हो रहा था । इस प्रकार दमन का सिलसिला अनवरत चलता रहता है । समाज के दो समूहों के बीच अगर कभी स्वस्थ संवाद नहीं हो पाता तो उसके पीछे मुख्य कारण यही मानसिकता है। ऐसी स्थिति में दो बातें याद रखनी पड़ेंगी, पहली तो यह कि समाज और सरकार, दोनों ही नागरिक स्वतंत्रता के दायरे में तत्परता से असहमति के स्वरों को सुनें तो हिंसा की सम्भावना कम होती है। दूसरा, हिंसात्मक अभिव्यक्ति के जवाब में सरकार की ओर से हिंसा करना भी उचित नहीं है, क्योंकि ऐसी स्थिति में प्रतिरोध और हिंसा बढ़ती ही है । अपनी किताब ‘स्ट्रगल फॉर सिविल लिबर्टीज’ में डॉ लोहिया सिनेटर बोरा को उद्धृत करते हुए कहते हैं दमनात्मक कार्रवाई एक स्वतंत्र सरकार के लिये न केवल शत्रु है, बल्कि यह क्रांति को जन्म देती है। प्रगति एवं मनुष्य की प्रसन्नता की यह शत्रु है । …..’
पिछले कुछ दशकों में हमने विभिन्न देशों में विधिसंगत नागरिक स्वतंत्रताओं का क्षरण देखा है। हमारा देश भी इसका अपवाद नहीं है जैसे जैसे नवउदारवादी आर्थिक विचारों ने अपनी जहरीली जड़ें जमायी हैं, ‘वाशिंगटन सहमति’ बनी है, और जिस हिसाब से भारत में इसके लिये जरूरी ढाँचागत सुधार किए गये हैं, उसके चलते बड़े तरीके से एकांगी मस्तिष्क, विचार व संस्कृति का निर्माण किया गया है। एक ऐसे कट्टर राष्ट्रवाद का उदय भी देखा जा रहा है जहाँ असहमति की किसी भी अभिव्यक्ति को राष्ट्रद्रोही या विकास विरोधी बताना चलन में आ गया है । किसी भी प्रकार की असहमति को अभिजात विमर्श में विकास के लिए खतरा बता दिया जाता है। एक तरफ मात्र दो-एक लोगों के रहने के लिए गगनचुम्बी या विशाल अट्टालिकाएं हैं तो दूसरी तरफ असंख्य विस्थापित देशवासी अपनी जड़ों से उखड़कर रोजी-रोटीए साफ़ हवा-पानी के लिये मोहताज हैं, और असंगठित क्षेत्र में काम तलाश कर किसी तरह गुज़ारा कर रहे हैं । जब ऐसे लोग अपना असंतोष किसी रूप में व्यक्त करते हैं तो कानून-व्यवस्था कायम करने के नाम पर राज्य इनका दमन करता है । उनकी माँग कितनी वाजिब है इसकी पड़ताल भी नहीं की जाती, सताये हुए इन लोगों का दमन अभिजात संस्कृति के दबाव में होता है ।
अत्याचार के व्यक्तिगत विरोध की बात डॉ. लोहिया ने क्यों की? इसलिए, क्योंकि वे मानते थे कि हमारे आधुनिक युग में संस्थानों की ताकत इतनी फैल चुकी है कि अकेले मनुष्य को उसने पूरी तरह अपने वश में कर लिया है। उन्होंने कहा, “चाहे आधुनिक सभ्यता का उत्थान कहीं से भी हुआ हो, आज वह समूह की सभ्यता में बदल चुका है । इसमें व्यक्ति विशेष उस विशाल पुंज की एक छोटी सी इकाई बन कर रह गया है । उसका प्रभाव भी इसी पर निर्भर रहता है कि वह उस पुंज का हिस्सा बना रहे । एक शख्स आज केवल एक छिटकी हुई इकाई बन कर रह गया है, जिसे एक शत्रुगत दुनिया ने अपने चक्रव्यूह में घेरा हुआ है । जब इस व्यक्ति के समर्थन में कोई अनुकूल संगठन न हो, तब उसकी स्थिति एक चूहे जैसी बन जाती है । हमारी इस आधुनिक सभ्यता में ऐसे व्यक्ति नगण्य हैं जिनके पीछे या साथ कोई संस्थान या असला-बारूद न हो । “
उन्होंने यह भी कहा कि जब हिटलर ने जर्मनी की सत्ता हासिल की थी, तब एक बात साफ दिख रही थी । यूरोप में बहादुरी और विचार से लैस समाजवादी और साम्यवादी शूरवीरों का पौरुष क्षीण हो गया था। यह कहने में हिचक होती है, पर उनका व्यवहार चूहों सा हो गया था, जो हिटलर के डर कर भागते फिर रहे थे।
लोहिया सविनय अवज्ञा को मानते थे, और गांधीजी के सुझाए रास्ते उन्हें सर्वथा कारगर लगते थे। उन्होंने कहा कि सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा का हथियार हमेशा ही व्यक्तियों के हाथ में तब मौजूद था जब अन्याय और अत्याचार बर्दाश्त से ज्यादा बढ़ जाए। वे मानते थे कि सत्याग्रह का हथियार तब तक कारगर रहेगा जब तक दुनिया में नाइंसाफी और जुल्म बने हुए हैं । वे मानते थे कि इस हथियार को कायम रहना चाहिए, क्योंकि अगर ऐसा न हुआ, तो बंदूक और गोली की सत्ता सदा ही कायम रहेगी। कुछ ऐसे भी जाने-माने लोग थे, जिनका कहना था कि सत्याग्रह अंग्रेजों के खिलाफ तो मुनासिब था, लेकिन आजाद भारत में इसको स्वीकृति नहीं मिलनी चाहिए। लोहिया ऐसा नहीं मानते थे। अपने अनोखे अंदाज में उन्होंने ऐसी बातचीत को
‘बचकानी बकबक’ बतलाया । उन्होंने इसे जिस तरह कहा वह याद रखने लायक है: “हमारी शताब्दी के पूरा होने से पहले अगर सत्याग्रह का दुनिया भर में सीख लिया गया, तो व्यक्ति और समूहों के हाथ में सविनय अवज्ञा का अनूठा हथियार आ जाएगा, जिससे वे तानाशाहों को तो हरा ही सकते हैं, एक नई सभ्यता का स्वागत भी कर सकते है।”
आखिरकार क्या होता है, यह इस पर निर्भर है कि हम अपने सामूहिक निर्णय कैसे लेते हैं, और उन्हें बनाने वाले मूल्य और अभिलाषाएं क्या हैं। उसका पहला बुनियादी मूल्य होना चाहिए हर व्यक्ति की सहज गरिमा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता । इसके प्रति उदासीनता के वातावरण में सामाजिक और राजनितिक इंतजाम ही क्या, संविधान भी बचा नहीं रह सकता । सब कुछ ध्यान में रख कर, ऐसा कहा जा सकता है कि डॉ. लोहिया के जीवन का सबसे बड़ा सबक क्या हो सकता है। वह यह, कि अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ उनके कई दशक चले विरोध के बावजूद, उन्हें आजाद भारत में ज्यादा समय जेल में गुजारना पड़ा। इससे यह पता चलता है कि एक मुश्त खेल नहीं है स्वतंत्रता पाना, मनुष्य की सहज गरिमा का दृढ़ निश्चय करना और उसे पालने वाले हालात बनाए रखना। इनके लिए संघर्ष जारी रहना चाहिए । यह संघर्ष राजनीति और समाज में तो होना ही चाहिए, लेकिन इसकी मुख्य भूमि मूल्यों की है । यह संघर्ष मूल्यों का संघर्ष है।
मैं अपना भाषण शहीद भगत सिंह के शब्दों से पूरा करना चाहता हूँ।
Į
“ मान लीजिए आप अपने समय के प्रचलित विश्वास का विरोध करते हैं, अपने समय के नायक का, ऐसे महान व्यक्तित्व का विरोध करते हैं जो अलोचना से ऊपर माना जाता है, अचूक माना जाता है तब आपके तर्क की ताकत बहुजन को बाध्य कर देगी कि वह आपकी निंदा करे, आपको घमंडी बताए । इसके पीछे कारण है मानसिक आलस । आलोचना और स्वतंत्र विचार, ये दो गुण किसी भी क्रांतिकारी के लिए अनिवार्य हैं। तो क्या महात्माजी की bb महानता की वजह से क्या किसी को भी उनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए! क्योंकि वे ऊँचे उठ चुके हैं, इसलिए वे जो भी कहते हैं वह सही है, चाहे वह राजनीति हो या धर्म, अर्थशास्त्र हो या नीतिशास्त्र ! चाहे आप उनकी बात स्वीकार करते
हों या नहीं, आपको कहना ही पड़ेगा, ‘वे सही हैं! ऐसी मानसिकता हमें प्रगति की ओर नहीं ले जाती । यह तो एकदम साफ है कि यह प्रतिक्रियावाद है ।”
मैं यह उम्मीद करता हूँ कि हम डॉ. राम मनोहर लोहिया जैसे महान पुरुष और स्त्रियों के जीवन और विचार से बारंबार अच्छे सबक लेंगे ।
आप सभी के धीरज का मैं आभार मानता हूँ ।
जय हिंद !
प्रस्तुति, राजकुमार जैन

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