लाहौर किला जेल में हठयोग!

हर रोज की तरह आज ‌ सुबह भी जब ‌मै सैर के साथ‌ थोड़ी बहुत जिस्मानी कसरत जिसमें योग भी शामिल है करने पार्क में पहुंचा ‌ तो मेला लगा हुआ था। चारों तरफ रबड़ मैट के ऊपर‌ अलग-अलग बैनर लगाए हुए कई ग्रुप योगाभ्यास कर रहे थे। ध्यान आया की सरकार की ओर से पहले से ही इस दिवस की तैयारी के लिए मुसलसल प्रचार किया जा रहा था। अगर यह रोजमर्रा की जिंदगी में अपना लिया जाए ‌ तो शर्तिया ही बेहतर रहेगा,‌ परंतु ‌ दिखावे के रूप में अगर एक दिन में योगाभ्यास करने की मुद्रा के फोटो खिंचवाकर ‌ करने तक ही महदूद होगा‌ तो फिर कोई स्थायी फायदा होने वाला नहीं।
योग का सबसे अधिक फायदा ‌ किस हालात में मिलता है, ‌ वह डॉक्टर राममनोहर लोहिया के‌ जेल अनुभव से‌ जाना जा सकता है। जंगे आजादी की जंग में संघर्ष करते हुए लोहिया को लाहौर किला जेल जहां भगत सिंह को भी बंदी बनाकर रखा गया था ‌ वही बंदी बनाकर अमानुषित यात्राएं दी जा रही थी‌। जेल अधिकारी लोहिया से भूमिगत चल रहे आंदोलन और उनके नेताओं के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहते थे। लोहिया से जब वह कुछ भी जानने में लाचार हो जाते तो उनको ‌ लगातार जगा रखकर नींद न लेने देकर सताने की कोशिश करते। यह बिस्तर पर सोने न देने की मामूली बात नहीं थी क्योंकि आदमी कुर्सी पर बैठे-बैठे भी सो सकता था आंखें खुली रखनी पड़ती थी आंखें उतनी देर बंद हो सकती थी जितनी देर आदमी जागी अवस्था में पलक झपक सकता था अगर कोई ज्यादा देर तक आंखें बंद रखता तो सिपाही उसकी हथकड़ी की जंजीर
जोर से खींचना था या उसके सिर को चारो तरफ जोर से झटका देकर हिलाता था । वह जबरन निद्राहीनता ‌ एक जैसी अवधि की नहीं थी। “शुरू में वह एक दिन और एक रात से ज्यादा नहीं गई। धीरे-धीरे वह अवधि बढ़ती गई। शायद वे चाहते थे कि मैं शुरू में विद्रोह में न कर दूं ‌ और अपनी स्थिति के साथ अपना तालमेंल बिठा लूं। वे मेरी प्रकृति के विचित्रता भी जान गए थे।
मेरी यातना के दूसरे और तीसरे महीने में मेरी जबरन निद्राहीनता की अवधि 3 दिन और 5 दिन हो गई। तब तक मैं शारीरिक लड़ाई की इच्छा को अगर कोई मेरे अंदर थी तो खो चुका था। अगर मैं घटनाओं को याद कर सकता हूं तो शायद 4 महीने की यातना के दौरान दो बार मुझ पर पागलपन सवार हुआ। एक बार तब जब सिपाही ने मेरे मित्रों तथा राष्ट्रीय नेताओं को गंदी गालियां देना शुरू किया। मेरा खून गर्म हो गया लेकिन मैंने अपने पर काबू बनाए रखा जब तक उसने गांधी के नाम से खिलवाड़ शुरू नहीं किया। मैंने तब पूरे जोर के साथ शटअप कहा था। यह प्रतिक्रिय उस किले में बिल्कुल व्यर्थ थी जहां आसपास मेरा कोई दोस्त नहीं था। मैं मानता हूं कि ऐसे मौके पर आदमी तर्क या बुद्धि का इस्तेमाल नहीं करता। असाधाररण तर्कहीनता का यह ‌ तत्व आदमी को अपनी चमड़ी से बाहर निकलने में मदद देता है और यह स्वस्थ लक्षण है। सिपाही गुस्से में उबल पड़ा और ऐसा लगा कि वह मुझ पर आखिरी तरीका आजमाएगा लेकिन बाद में किसी भी पुलिस कर्मचारियों ने वह बात मुझसे नहीं कही । पांचवें छठे दिन मुझ पर थोपी गई अनिद्रा सबसे लंबे समय तक चली। सुबह के लगभग 4:00 बजे थे मुझे लगा कि मेरा सिर ‌ बुझी आग की ‌ गर्म राख में भुनने लगा है।
आरोपित अनिद्रा की सबसे लंबी अवधि थी 10 दिन और 10 रातें। उसके बाद मेरी नाक और मुंह से खून निकलने लगा। नाक में खून के छोटे-छोटे ‌ थक्के भी बन गए। मुझे तेज बुखार भी है हो गया लगता था। जेल के डॉक्टर ने इसे 7 दिन का बुखार कहा ‌ और बताया कि उसके बाद में ठीक हो जाऊंगा। लेकिन उससे यह बात बहुत मजाकिया ढंग से कही थी शायद उसे उन मुद्दों की जानकारी नहीं थी जिनको लेकर देश में ‌ संघर्ष चल रहा था।
मध्य रात्रि के बाद, 2:00 बजे के बाद का समय अमिश्रित और उबाऊ कष्टका‌ था। कभी-कभी यह तीव्र पीड़ा में बदल जाता था। मेरा दिमाग लगातार ‌धुंध और और सुस्त दर्द की स्थिति में रहता था। रात 2:00 बजे के बाद अंदर की गर्मी बहुत बढ़ जाती थी, कम से कम मुझे ऐसा ही लगता था। कभी-कभी सुबह कभी-कभी सुबह से पहले वह चरम सीमा पर पहुंच जाती थी। कभी लगता था कि मेरे सिर में आग लगी हुई है, कुछ नरम सी आग और उससे ‌ धुआं निकल रहा है। मुझे याद पड़ता है कि मेरा हाथ एक दो बार गीले गरम धुएं या आग की गर्मी को महसूस करने के लिए उठता था। मैं अभी भी याद नहीं कर पाता कि उस अग्नि परीक्षा में में कैसे गुजरा। कभी-कभी मैं पीड़ा के मारे सोचता कि अभी कुछ देर में विस्फोट होने वाला है जिसमें मेरा सिर टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा।
रात 2:00 बजे और सुबह के बीच पुलिस कर्मचारी कभी-कभी मेज पर कोई सख्त चीज बजाकर अपने सवाल को दोहराते जाते थे उसका कोई अंत नहीं दिखता था। मुझे ठीक याद है कि मेरा मन तब अपनी स्थिति के संबंध में पीड़ादायक जागरूकता में लगातार व्यस्त रहता था मैं यह भी सोचता था कि मैं इस यातना को और लंबे समय तक झेल पाऊंगा या नहीं और न जाने अगले क्षण मुझे क्या हो जाएगा। मैं अपने क्षण की दोनों संभावनाओं के प्रति जिज्ञासु था कि मेरे शरीर को क्या होगा मेरा दिमाग तनाव से फट जाएगा या नहीं।
किस भारतीय ने योग के बारे में खासकर हठयोग के बारे में नहीं सुना होगा जिसका अभ्यास शमशान भूमि में या आदमी की खोपड़ी के ‌ सात अंतहीन जागते रहकर किया जाता है। बचपन में मैंने भी पिताजी को पातंजलि के योगशास्त्र के प्रथम दो ‌ मंत्रो का उच्चारण करते सुना था : यह योग विद्या का प्रारंभ है। योग चित्तवृत्तियों का निरोध है। मैं कभी-कभी सोचता था कि मैं भी हठयोग का अभ्यास विवशता में कर रहा हूं। मैं ‌ चित्तवृत्तियो के संबंध में उत्सुक था यह जानने के लिए कि मैं उनका निरोध कर पाता हूं या नहीं। शारीरिक पीड़ा ने मन को बहुत कष्टपूर्ण बना दिया था। किंतु इस कष्ट की जैसा कि मैंने कहा अवस्थाएं थी।
कई बार मेरी ऐसी स्थिति हुई कि मुझे लगा मैं टूट जाऊंगा। पीड़ा असहाय हो गई थी किंतु हर बार आंखों के सामने गंदी नाली का पानी पीने का दृश्य उभरता था। इस प्रकार की अनेक यंत्राओं पर काबू पाने के बाद, जो शुरू में असहाय लगती थी, मैंने निश्चय किया की पीड़ा का तथा उसकी सहनीयता अथवा असहनीयता का अध्ययन करूंगा। असहनीय पीड़ा के विचार में अवश्य ही कुछ गलती होगी। मैंने कई बार इसे सहा है और मैंने हर बार इस पर काबू पाया है। इसलिए पीड़ा को असहनीय कहना उचित नहीं होगा। जब ‌असह्य पीड़ा की घटनाएं बहुत हो गई तो मैंने देखा नहीं पीड़ा अधिक कष्टदायक होने के बावजूद मैं उसे अधिक शांत‌चित से सह सका। इससे मै ‌ अकाट्य निष्कर्ष पर पहुंचा कि कोई भी पीड़ा असहनीय नहीं हो सकती। किंतु जीवन एक अ‌संबंद्ध कार्य या घटना नहीं है। वह जटिल कम है और घटनाओं की अनंत श्रृंखला है। ये घटनाएं एक के बाद एक आती है। ऐसा ना होता तो जीवन समाप्त हो गया होता और समय अपनी जगह पर खड़ा होता।
मैं यह दावा नहीं कर सकता कि मैंने अपने मन और अपनी इच्छा को स्वच्छ और नियंत्रित रखा है जैसा कि इस अनुभव से व्यक्त होता है। किंतु अनुभव की स्मृति मेरे मन में बनी हुई है। शायद मेरे तात्कालिकता के सिद्धांत का आधार यही है। संभवतः इसी कारण मेरे मन में महाकाल के प्राचीन मंदिरों के प्रति आकर्षण है। मन और आत्मा को, नए दर्पण की तरह बेदाग बनाना संभव है जिसका जिक्र भारतीय दर्शनों में किया गया है। जो मन भर,लोभ, निराशा से शून्य हो वही सही विचार कर सकता है। मैंने अपने अनुभव का प्रयोग राजनीति या जीवन के क्षेत्र में किया या नहीं यह सवाल इस समय प्रासंगिक नहीं है जब मैं आपसे कहता हूं चित्त‌वृत्तियों या इच्छा को नियंत्रित करने का प्रयास करना चाहिए ताकि आदमी भय‌ और लोभ से मुक्त वर्तमान में जी सके”।

– राजकुमार जैन

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