नई दिल्ली। भारत ने बड़ा कूटनीतिक दांव चलते हुए अमेरिका और चीन के दबदबे के बीच एक अलग रणनीतिक रास्ता अपना लिया है। यह रणनीति है ‘G माइनस टू’। स्ट्रेटेजिस्ट सी राजा मोहन ने इस बारे में एक लेख भी लिखा है, जिसका दिग्गज कांग्रेसी नेता शशि थरूर ने भी समर्थन किया है। यह जानते हैं कि क्या है ‘G माइनस टू’ और यह कितनी कारगर साबित होने वाली है।
भारत खींच रहा-‘G माइनस टू’ स्ट्रेटेजी की लकीर
स्ट्रेटेजिस्ट सी राजा मोहन ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखे अपने लेख में ‘G माइनस टू’ इंडो-पैसिफिक ढांचे के उभरने पर जोर दिया है। यह रणनीति ऐसी है, जिसमें भारत जैसी मध्यम शक्तियां बदलते हुए अमेरिका-चीन संबंधों के बीच रणनीतिक स्वायत्तता बरकरार रखने के साथ-साथ क्षेत्रीय साझेदारियां मजबूत कर रही हैं। इसकी पुष्टि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाल के इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया दौरे से भी होती है।
क्या है ‘G माइनस टू’ रणनीति
एक स्वतंत्र, अलग-थलग तीसरे गुट या चीन-विरोधी सैन्य गठबंधन बनाने के बजाय, ‘G माइनस टू’ द्विपक्षीय और मिनिलैटरल यानी छोटी-छोटी साझेदारियों का एक आपस में जुड़ा हुआ नेटवर्क है।
‘G माइनस टू’ (G Minus Two) रणनीति कहां से आई
भारत और एशिया के रणनीतिकार अमेरिका-चीन के दबदबे को लेकर आशंका जताते रहे हैं। वो ‘G2 यानी अमेरिका-चीन’ के सुपर पावर गठबंधन की संभावना को लेकर काफी चिंतित रहे हैं, जिसमें वॉशिंगटन और बीजिंग क्षेत्रीय नियम तय करते हैं।
अमेरिकी विदेश नीति की अस्थिर कूटनीति ने चिंताओं को और बढ़ा दिया, जिससे एशियाई देशों को मामले अपने हाथ में लेने के लिए प्रोत्साहन मिला। दरअसल, अमेरिकी प्रशासन द्वारा कभी-कभी ‘इंडो-पैसिफिक’ शब्दावली को कम महत्व देने जैसे फैसले शामिल थे, जिस वजह से भारत जैसे देशों को ये रणनीति अपनानी पड़ी।
‘G माइनस टू’ स्ट्रेटेजी से जापान को जोड़ा
‘G माइनस टू’ रणनीति को 2026 के मध्य में गति मिली, जिसकी मुख्य बातें जापानी प्रधानमंत्री सनाए तकाइची की दिल्ली यात्रा और दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे-म्युंग के रणनीतिक शिखर सम्मेलन थे।
अमेरिका से दूरी बनाने के बजाय यह रणनीति वाशिंगटन को एशियाई स्थिरता से और अधिक मजबूती से जोड़ने पर आधारित है, क्योंकि यह माना जाता है कि क्षेत्रीय देश अकेले चीन की विशाल सैन्य ताकत का मुकाबला नहीं कर सकते।
इस ढांचे में यह माना गया है कि चीन के साथ पूरी तरह से व्यापारिक संबंध तोड़ना असंभव है, क्योंकि क्षेत्र का कुल व्यापार एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक का है।
‘G माइनस टू’ फ्रेमवर्क के फायदे क्या क्या हैं
समुद्री चोकपॉइंट्स (अहम समुद्री रास्तों) को सुरक्षित करना: समुद्री सहयोग बढ़ने से व्यापारिक रास्ते अचानक नाकेबंदी से सुरक्षित रहते हैं। जैसे इंडो-पैसिफिक के भौगोलिक केंद्र, इंडोनेशिया के साथ साझेदारी करने से मलक्का स्ट्रेट और दो महासागरों के मिलन स्थल से गुज़रने वाले अहम व्यापारिक रास्ते सुरक्षित होते हैं।
औद्योगिक सोर्सिंग के वैकल्पिक नेटवर्क: मध्यम दर्जे की ताकतें किसी एक देश पर निर्भरता से बचने के लिए अपनी आर्थिक विशेषज्ञता का आदान-प्रदान कर सकती हैं। जैसे ऑस्ट्रेलिया अहम खनिजों के लिए एक जरूरी आधार के तौर पर काम करता है, जबकि न्यूजीलैंड एडवांस्ड एग्रीकल्चरल टेक्नोलॉजी और उच्च शिक्षा के लिए रास्ते खोलता है।
क्षेत्रीय रक्षा एकीकरण को मजबूत करना: मिनिलैटरल लॉजिस्टिक्स और को-डेवलपमेंट प्रोग्राम औपचारिक और प्रतिबंधात्मक संधि गठबंधनों की जरूरत के बिना क्षेत्रीय रक्षा क्षमताओं को बेहतर बनाते हैं। जैसे ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल और अस्त्र बियॉन्ड-विज़ुअल-रेंज मिसाइल की सप्लाई के लिए भारत और इंडोनेशिया के बीच हालिया समझौता सब-रीजनल डेटरेंस को काफी बढ़ाता है।
आर्थिक मजबूती बढ़ाना: क्षेत्रीय नेटवर्क पश्चिमी देशों की मुद्रा प्रणालियों के हथियार की तरह इस्तेमाल होने के जोखिम को कम कर सकते हैं। जैसे भारत और जापान के बीच स्थानीय मुद्रा में लेन-देन और जुड़े हुए पेमेंट सिस्टम को बढ़ावा देने से दोनों देशों के बीच का व्यापार वैश्विक मुद्रा के उतार-चढ़ाव से सुरक्षित रहता है।
भारत के लिए कितनी अहम है ‘G माइनस टू’ स्ट्रेटेजी
रक्षा क्षेत्र में औद्योगिक विकास को तेज करना यानी एशिया की उन्नत सेनाओं के साथ साझेदारी करने से घरेलू मैन्युफैक्चरिंग के लक्ष्यों को सीधे बढ़ावा मिलता है।
जापान के साथ नौसैनिक रेडियो एंटीना के संयुक्त विकास प्रोजेक्ट को अंतिम रूप देने से महत्वपूर्ण रक्षा तकनीक ‘मेक इन इंडिया’ फ्रेमवर्क के तहत आती है।
सीमावर्ती इलाकों और उप-क्षेत्रों में बदलाव: जोखिम कम करने वाली रणनीतियों से भारत अपने दूर-दराज के इलाकों को सीधे वैश्विक सप्लाई चेन से जोड़ सकता है।
पड़ोसी देशों के साथ रणनीतिक गहराई बढ़ाना: यह पुरानी नीतिगत कमियों को दूर करता है और भारत की समुद्री सुरक्षा को आसियान (ASEAN) की केंद्रीय भूमिका से जोड़ता है।
फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई साझेदारों को ठोस और व्यावहारिक रक्षा उपकरण सौंपने से एक भरोसेमंद सुरक्षा प्रदाता के रूप में भारत की भूमिका मजबूत होती है।
बहुपक्षीय मंचों पर भारत का प्रभाव बढ़ाना: प्रमुख क्षेत्रीय औद्योगिक केंद्रों के साथ मज़बूत संबंध बनाने से IEA और सुधारे गए UNSC जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों में बड़ी नेतृत्वकारी भूमिकाओं के लिए भारत की दावेदारी मजबूत होती है।







