नई दिल्ली। बुधवार को नेपाल में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लेशियर झील फटने से आई अचानक बाढ़ की घटना ने भारत को अपनी रणनीति और तैयारियों पर फिर से विचार करने को मजबूर कर दिया है। इस घटना ने एक बार फिर याद दिलाया है कि हिमालयी क्षेत्रों में लगभग 200 ऐसी ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं, जिनसे भविष्य में अत्यधिक खतरा हो सकता है और इसके लिए तुरंत कदम उठाने की जरूरत है।
हिमालयी झीलों से जुड़े खतरे के आंकड़े
एक अध्ययन में यह भी पाया गया है कि इन कुल झीलों में से 4,700 ग्लेशियल झीलें गंगा नदी बेसिन में आती हैं, जिनका कैचमेंट एरिया 2.5 लाख वर्ग किलोमीटर से भी अधिक है।
इन आंकड़ों से यह स्पष्ट हो जाता है कि यदि किसी एक भी झील का प्राकृतिक बांध टूटता है, तो मैदानी और निचले इलाकों में कितनी भयानक तबाही मच सकती है।
हाल ही के समय में भारत ने GLOF से जुड़ी सबसे भीषण आपदाओं में से एक का सीधा सामना किया था। 3 अक्टूबर 2023 की आधी रात के करीब सिक्किम की साउथ ल्होनक झील में ग्लेशियल चट्टानों का एक बहुत विशाल हिस्सा लगभग 14.7 मिलियन क्यूबिक मीटर अचानक ढह गया था।
खतरों से निपटने के लिए समन्वय समिति का गठन
इसके साथ ही, सरकार ने हिमालय के उन चार राज्यों के लिए नेशनल GLOF रिस्क मिटिगेशन प्रोग्राम के तहत 150 करोड़ रुपये भी मंजूर किए हैं, जहां ग्लेशियल झीलों का खतरा सबसे ज्यादा है। आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) समन्वय समिति की नवंबर 2024 में हुई पहली बैठक में आकलन, निगरानी और जोखिम कम करने के उपाय वाले त्रि-आयामी दृष्टिकोण पर सहमति बनी थी।
इससे पहले सरकार ने यह भी जानकारी दी थी कि सभी A-कैटेगरी की झीलों का आकलन करने के लिए कई एजेंसियों ने मिलकर संयुक्त अभियान चलाए हैं। इन अभियानों में NDMA, केंद्रीय जल आयोग, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, सी-डैक, आईटीबीपी और सेना के वैज्ञानिक एवं अधिकारी शामिल रहे हैं।
इन समितियों ने नियमित बैठकें करके फीडबैक लिया, जिसे राज्यों और केंद्र की संयुक्त रणनीति का हिस्सा बनाया गया। हालांकि, इस दिशा में जमीनी स्तर पर आगे की गई कार्रवाई के बारे में अभी विस्तृत जानकारी सामने आना बाकी है।







