भगवान दास के कथा-कर्म का मूल्यांकन

कँवल भारती

हिन्दी में दलित साहित्य के आरम्भिक दौर को मिशनरी दौर माना जाता है। यह दौर चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु युग रूप में जाना जाता है। जिज्ञासु के सिवा इस युग के अन्य प्रमुख साहित्यकारों में स्वामी अछूतानन्द, ललई सिंह, शंकरानंद शास्त्री, लाल चंद राही, मंगलदेव विशारद, मोतीराम शास्त्री, राजवैद्य माताप्रसाद सागर, सुंदर लाल सगर (आगरा) सुंदर लाल सागर (मैनपुरी), डी. आर. जाटव, लाहौरी राम बाली, रामस्वरूप वर्मा, भगवान दास, अंगने लाल, गया प्रसाद प्रशांत, गजाधर प्रसाद बौद्ध, बदलू राम रसिक, राम शरण विद्यार्थी, रमेश चन्द्र मल्लाह, माता प्रसाद, डी. पी. वरुण,  इत्यादि हैं। मुख्य रूप से ये साहित्यकार कवि, निबन्धकार, नाटककार और उपन्यासकार थे। कहानियाँ केवल भगवान दास ने लिखी थीं। इसलिए पहले दलित कहानीकार के रूप में भगवान दास का कथा-कर्म ही हमारे सामने आता है।

भगवान दास की कुल नौ कहानियाँ मिलती हैं, जिनका विवेचन पिछले दो अध्यायों में किया जा चुका है। यहाँ उनके कथा-कर्म पर कुछ चर्चा करनी है। यदि भगवान दास अपना कहानी लेखन जारी रखते, तो निस्संदेह उनकी क़लम से दलित चेतना की और भी कई अच्छी कहानियाँ हिन्दी साहित्य को मिलतीं। लेकिन उनके जीवन का लक्ष्य आंबेडकर मिशन सोसाइटी का प्रचार-प्रसार करना था, जिसके कारण उन्होंने रचनात्मक साहित्य का क्षेत्र छोड़ दिया था। इसका एक कारण यह भी था कि उन्हें हिन्दी का ज्ञान नहीं था। उनके पढ़ने-लिखने की भाषा उर्दू और अंग्रेज़ी थी। इसलिए हिन्दी में लेखन करना उनके लिए एक मुश्किल काम था। उन्होंने हिन्दी के बारे में अपनी पुस्तक ‘मैं भंगी हूँ’ में लिखा है, ‘हिन्दी का मेरा ज्ञान केवल लिपि तक सीमित है। देश की सरकारी भाषा और राष्ट्रीय भाषाओं में से एक होने के कारण मैंने इसे सीखने की कोशिश की, परन्तु न तो मैं इसके लिए प्यार पैदा कर सका, (और) न दक्षता प्राप्त कर सका।’

इसलिए भगवान दास की कहानियों की भाषा पर बात करना मेरी दृष्टि में न्यायसंगत नहीं होगा, क्योंकि उनकी मूल भाषा हिन्दी नहीं है। लेकिन शिल्प और सामाजिक सरोकार की दृष्टि से इन कहानियों पर चर्चा होनी चाहिए। दलित परिवेश से आने के कारण भगवान दास की प्रत्येक कहानी में दलित समाज की चिंता है। पहली कहानी ‘कॉफ़ी हाउस’ में जातीय भेदभाव की चिंता है। कॉफ़ी हाउस में कुमार कहता है कि हिंदुस्तान की सबसे बड़ी लानत जातपांत है, जिसे ख़त्म किए बिना यह देश कभी एक नहीं हो सकता। इस सच्चाई को वर्ग की राजनीति करने वाले कम्युनिस्ट विचारक नहीं समझते। वे जाति को ख़त्म किए बिना क्रान्ति लाना चाहते हैं, जो असंभव है। वे उस वर्ग की बात करते हैं, जो भारतीय समाज में अभी बने ही नहीं हैं। यह कहानी पहली बार वर्ग की चेतना के विरुद्ध जाति की चेतना की बात करती है। कहानी साफ़-साफ़ कहती है कि दलित वर्गों का भला भारतीय कम्युनिज्म में नहीं है। यदि भारतीय कम्युनिज्म को सफल होना है, तो उसे दलितों के पास जाना होगा।

मनुष्य होने की चिंता भगवान दास की लगभग सभी कहानियों में है। यह चिंता ‘बिन ब्याही बीवी’ में भी है, जिसमें एक खत्री महिला, प्रोफ़ेसर वाल्मीकि से प्यार करने के बावजूद उन्हें एक अछूत मानती है, और उनसे शादी करने से इंकार कर देती है। वह इस भय से आशंकित है कि यदि उसने अछूत पुरुष से शादी कर ली, तो उसके घर वाले उसका बहिष्कार कर देंगे। ‘चोर’ कहानी में जज भी जातिवादी है, और आरोपी को जाति के चश्मे से देखता है। चोरी के झूठे आरोप में फंसाए गए ईश्वर सिंह की सफाई पर वह कोई ध्यान नहीं देता है, क्योंकि वह चूहड़ा जाति से है। जज यह मानकर चलता है कि दलित है, तो उसने ज़रूर चोरी की होगी।

‘शूद्र का शाप’ रामायण के रामराज्य की कहानी है। हालांकि शूद्र शंबूक का शाप रामराज्य के लिए अभिशाप साबित नहीं हुआ। ब्राह्मणों ने उसे एक आदर्श राजव्यवस्था के आदर्श के रूप में मान्यता दी, यहाँ तक कि गाँधी भी रामराज्य के समर्थक थे। स्वामी करपात्री ने तो रामराज्य के समर्थन में संस्कृत में एक भारीभरकम ग्रन्थ लिखा था, जिसमें उन्होंने रामराज्य को मार्क्सवाद की तुलना में सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था साबित किया था। लेकिन भगवान दास इस कहानी में जो कह नहीं सके, वह यह है कि राम को अपने द्वारा की गईं निरपराध मनुष्यों की हत्याओं का पाप-बोध हुआ था, जिसका पश्चाताप उन्होंने, जैसाकि वाल्मीकीय रामायण में लिखा है, सरयू नदी में जल-समाधि लेकर किया था।

दलितों के प्रति उच्च जातियों की अमानवीयता कोई ऐसी घटना नहीं है, जिस पर आश्चर्य किया जाए। यह हिन्दुओं की जीवन-शैली का एक अनिवार्य मूल्य है, जो उन्हें विरासत में मिला है। ‘फसाद’ कहानी पढ़कर मालूम होता है कि हिन्दू गाँवों में दलित जातियों पर लगाए गए तमाम तरह के प्रतिबंधों में एक प्रतिबंध यह भी था कि वे अपने मुर्दे भी अपने तरीक़े से नहीं दफ़ना  सकते थे। वहाँ भी सवर्णों की मर्ज़ी चलती थी, जिसकी अवहेलना का मतलब था दलितों का अत्याचार। यह फसाद सहुगढ़ गाँव में हुआ था। पर वास्तव में यह फसाद एक संघर्ष था, जो दलितों ने उच्च जातियों के प्रतिबंधों के ख़िलाफ़ किया था। जातिभेद के विरुद्ध ऐसे संघर्ष उस दौर में देशभर में हो रहे थे। भगवान दास ने इस संघर्ष के परिणाम को भी कहानी में चित्रित किया है, जिसके कारण दलितों का गाँव से निष्कासन होता है, और उनके स्थान के नए गुलामों के रूप में नए अछूत बसा दिए जाते हैं। यह निष्कासन भारत के सम्पूर्ण हिन्दू गांवों में दलितों की नियति थी।

‘सती की समाधि’ कुछ नए सवाल उठाती है। हिन्दू प्रथा के अनुसार मृतक पति की चिता पर ज़बरन जलाई जाने वाली विधवा पत्नी तो सती है ही, लेकिन भगवान दास ने एक दलित गांव में उस समाधि को खोजा है, जिसने उच्च जातियों की वासना से बचने के लिए आत्महत्या कर ली थी। गाँव के लोगों ने उसकी समाधि बनाकर उसको अमर कर दिया। मेहतर समाज की उस सुंदर स्त्री पर उच्च जाति के दरोगा ने उसका जिस्म पाने के लिए इतने ज़ुल्म ढाए थे कि उसके सामने आत्महत्या करने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा था। हम कल्पना कर सकते हैं कि गाँवों में जो समाधियाँ दिखाई देती हैं, वह अत्याचार की शिकार महिलाओं की भी हो सकती हैं। यह कहानी हमें इस दृष्टिकोण से भी सोचने के लिए बाध्य करती है।

‘शूद्र का शाप’ छोड़कर, जो एक रामायण पर आधारित है, भगवान दास की कहानियाँ उनके जीवन-अनुभवों की अभिव्यक्तियाँ हैं। अनुभव से वेदना पैदा होती है और वेदना से समाज की समस्या का अहसास होता है। यह अहसास ही विद्रोह को जन्म देता है, जो दलित साहित्य की मुख्य प्रवृत्ति है।

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