गाय-भैंसों को भी लग सकती है लू, गर्मियों में ऐसे करें पशुओं की देखभाल

बढ़ते पारे ने दुधारू पशुओं पर बहुत दबाव डाला है और यह सबसे बुरा तब होगा जब सापेक्ष आर्द्रता 90% से अधिक हो जाएगी। मौजूदा परिस्थितियों में दूध का उत्पादन कम फीड इनटेक और अतिरिक्त हीट लोड के कारण भी कम हुआ है। हरे चारे की मात्रा बढ़ानी चाहिए और लंबे चारे को खिलाने से पहले काटना चाहिए। यदि चराई का अभ्यास किया जाता है, तो जानवरों को सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक चराने से बचें। 20-30 मिनट के लिए बराबर मात्रा में पानी में भिगोने से पोषक तत्वों का उपयोग बढ़ जाएगा। गर्मियों के दौरान आहार खनिज और विटामिन पूरकता में वृद्धि की जानी चाहिए क्योंकि गर्मी के तनाव के प्रभाव में इसका उत्सर्जन बढ़ जाता है। गर्मी के तनाव की अवधि के दौरान आहार में सोडियम और पोटेशियम की आपूर्ति से दूध की उपज बढ़ जाती है। पशुओं के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए उचित कृमिनाशक और टीकाकरण कार्यक्रम का पालन किया जाना चाहिए।

 

डॉ. सत्यवान सौरभ

 

देश के कई राज्यों में भीषण गर्मी का दौर शुरू हो चुका है, गर्मी का असर इंसान के साथ-साथ मवेशियों के ऊपर भी दिखने लगा है। इस मौसम में पशुओं को लू लगने का खतरा बना रहता है साथ ही अधिक तापमान का असर दूध देने वाली मवेशियों पर होता है और उनके दूध देने की क्षमता कम हो जाती है। जिसका नुक़सान किसानों को उठाना पड़ता है। ऐसे में पशुपालकों को इस समय पशुओं की उचित देखभाल करनी चाहिए। बढ़ते तापमान को देखते हुए पशुपालन एवं डेयरी विभाग द्वारा पशुओं को लू से बचाने के लिए एडवाइजरी भी जारी की जाने लगी है। पशुपालक को मौसम में होने वाले परिवर्तनो के अनुसार अपने पशुओं का प्रबंधन करना चाहिए जिससे उनके उत्पादन पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़े। गर्मी के मौसम में पशुओं के बीमार होने की संभावना बढ़ जाती है। गर्म हवाओं एवं तापमान अधिक होने पर पशुओं को लू लगने का भी खतरा बना रहता है।

 

भारत में पशुपालन के तहत बडे स्तर पर दुधारु पशुओं को पाला जाता है। इनमें सबसे ज्यादा गाय, भैंस, बकरी और ऊंट की तादात शामिल है। जाहिर है कि पशुपालन बेहद जिम्मेदारी वाला काम है, जिसमें समय पर पशुओं की साफ-सफाई, चारा देना, पानी देना, दुहाना और घुमाना शामिल है। लेकिन गर्मियां आते ही तपती धूप में पशुओं को लू लगने के समस्या भी घेर लेती है। हालांकि पहले से ही सावधानियां बरत के बीमारियों को पनपने से रोका जा सकता है। लेकिन फिर भी परेशानी बढ़ जाये तो समय रहते इनकी पहचान करके पशुओं को बीमार होने से बचाया जा सकता है।

 

हालांकि गर्मी के मौसम का दुष्प्रभाव सभी प्रजातियों के जानवरों में देखा जाता है, लेकिन गाय, भैंस और मुर्गे अधिक प्रभावित होते हैं। यह काले रंग, पसीने की ग्रंथियों की कम संख्या और भैंसों में विशेष हार्मोन के प्रभाव, और मुर्गी में पसीने की ग्रंथियों की अनुपस्थिति और शरीर के उच्च तापमान (107 F) के कारण होता है। जाहिर है कि देश में तपती धूप में कभी-कभी पारा 45 डिग्री तक चला जाता है। ऊपर से गर्म हवाओं से पशुओं को पानी की कमी और हीट-स्ट्रोक हो सकता है। अगर समय से सावधानियां बरती जाये तो बीमरियों की संभावना कम हो जाती है। लेकिन फिर भी पशु गर्मी के चलते बीमार हो जाते हैं तो इन लक्षणों से पहचान कर सकते हैं- पशु को तेज बुखार और बेचैनी होना, ठीक से आहार न लेना, तेज बुखार में हाँफना, नाक और मुंह से लार का बहना, आंखों का लाल होना और आँसू बहना, तेज सांस लेना और लड़खड़ाकर के गिरना, सुस्ती और खाना-पानी बंद कर देना।

 

त्यधिक गर्म आर्द्र या गर्म शुष्क मौसम के दौरान, पसीने और हांफने से गर्मी को दूर करने के लिए मवेशियों की थर्मोरेगुलेटरी क्षमता से समझौता किया जाता है और गर्मी का तनाव होता है। गंभीर गर्मी के तनाव से शरीर के तापमान में वृद्धि हो सकती है, नाड़ी की दर में वृद्धि हो सकती है, परिधीय रक्त प्रवाह में वृद्धि हो सकती है, भोजन का सेवन कम हो सकता है और पानी का सेवन बढ़ सकता है। बढ़ते पारे ने दुधारू पशुओं पर बहुत दबाव डाला है और यह सबसे बुरा तब होगा जब सापेक्ष आर्द्रता 90% से अधिक हो जाएगी। मौजूदा परिस्थितियों में दूध का उत्पादन कम फीड इनटेक और अतिरिक्त हीट लोड के कारण भी कम हुआ है। हरे चारे की मात्रा बढ़ानी चाहिए और लंबे चारे को खिलाने से पहले काटना चाहिए। यदि चराई का अभ्यास किया जाता है, तो जानवरों को सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक चराने से बचें। 20-30 मिनट के लिए बराबर मात्रा में पानी में भिगोने से पोषक तत्वों का उपयोग बढ़ जाएगा। गर्मियों के दौरान आहार खनिज और विटामिन पूरकता में वृद्धि की जानी चाहिए क्योंकि गर्मी के तनाव के प्रभाव में इसका उत्सर्जन बढ़ जाता है।

 

गर्मी के तनाव की अवधि के दौरान आहार में सोडियम और पोटेशियम की आपूर्ति से दूध की उपज बढ़ जाती है। पशुओं के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए उचित कृमिनाशक और टीकाकरण कार्यक्रम का पालन किया जाना चाहिए। एक्टो-परजीवी, जिनका संक्रमण गर्मियों के दौरान बढ़ जाता है, को जानवरों के साथ-साथ शेड में, विशेष रूप से कोनों और दरारों में उपयुक्त एसारिसाइडल स्प्रे का उपयोग करके ठीक से नियंत्रित किया जाना चाहिए। गर्मी के मौसम में उचित देखभाल और प्रबंधन तकनीक से किसानों को स्वस्थ पशुओं को बनाए रखने, अधिक दूध उत्पादन और डेयरी फार्मिंग से निश्चित लाभ प्राप्त करने में मदद मिलेगी। गर्मी के महीनों के दौरान जानवरों की देखभाल उनके स्वास्थ्य, कल्याण और समग्र अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है। तीव्र गर्मी और अत्यधिक मौसम की स्थिति जानवरों के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियां और जोखिम पैदा कर सकती है, लेकिन उचित देखभाल और ध्यान से इन्हें कम किया जा सकता है।

 

गर्मी के तनाव और निर्जलीकरण को रोकने के लिए पर्याप्त छाया, ताजा पानी और पर्याप्त वेंटिलेशन प्रदान करना आवश्यक है। रहने की जगह को नियमित रूप से संवारना और साफ–सुथरा रखना जानवरों को गर्मी से निपटने में मदद करता है और त्वचा के संक्रमण और परजीवियों के जोखिम को कम करता है। इसके अतिरिक्त, गर्म मौसम के दौरान व्यायाम दिनचर्या को समायोजित करना, भोजन कार्यक्रम, और गर्मी के थकावट या तापघात के संकेतों की निगरानी करना महत्वपूर्ण है। गर्मियों के दौरान विभिन्न जानवरों की प्रजातियों की विशिष्ट आवश्यकताओं के बारे में खुद को और दूसरों को शिक्षित करना जिम्मेदार पालतू स्वामित्व को बढ़ावा दे सकता है और अनावश्यक पीड़ा को रोक सकता है। इन उपायों को लागू करके, हम अपने पशु साथियों के लिए एक सुरक्षित और आरामदायक वातावरण बना सकते हैं, उनकी भलाई सुनिश्चित कर सकते हैं और मनुष्यों और जानवरों के बीच एक मजबूत बंधन को बढ़ावा दे सकते हैं। याद रखें, हमारे प्यारे, पंखदार, और स्केली दोस्त उनकी देखभाल और सुरक्षा के लिए हम पर भरोसा करते हैं, खासकर चुनौतीपूर्ण गर्मी के मौसम में।

(लेखक कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट हैं)

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