पाप उतने ही करो जितने गंगा में समा जाए

ऊषा शुक्ला

पाप उतना ही करो जितने गंगा में समा जाए अर्थात किसी भी व्यक्ति को इतने पाप कर नहीं कर लेने चाहिए जिसके लिए कोई माफ़ी ना हो ।एक कहावत है जिसका अर्थ है कि पाप उतने ही करो जितने कि तुम उनसे पीछा छुड़ा सको। इसका मतलब है कि पापों को करने से बचना चाहिए, लेकिन अगर कोई पाप हो ही जाता है, तो उसे सुधारने की कोशिश करनी चाहिए और उसे अपने दिल में नहीं रखना चाहिए। यह कहावत गंगा नदी के संदर्भ में है, जो हिंदुओं के लिए एक पवित्र नदी है और माना जाता है कि इसमें स्नान करने से पाप धुल जाते हैं। हालांकि, यह सिर्फ एक प्रतीकात्मक अर्थ है, और इसका मतलब यह नहीं है कि कोई भी व्यक्ति कितने भी पाप कर सकता है और फिर गंगा में स्नान करके उन्हें धो सकता है।

पापों से मुक्ति पाने के लिए, व्यक्ति को अपने कर्मों पर पछतावा होना चाहिए और भविष्य में अच्छे कर्म करने का संकल्प लेना चाहिए।पाप उतने ही करो जितने गंगा में समा जाए” एक लोकप्रिय कहावत है जो लोगों को पापों से बचने और अच्छे कर्म करने के लिए प्रोत्साहित करती है। इसका मतलब यह है कि पापों को करने से बचना चाहिए, लेकिन अगर कोई पाप हो ही जाता है, तो उसे सुधारने की कोशिश करनी चाहिए और उसे अपने दिल में नहीं रखना चाहिए। यह कहावत एक प्रतीकात्मक अर्थ रखती है, और इसका मतलब यह नहीं है कि कोई भी व्यक्ति कितने भी पाप कर सकता है और फिर गंगा में स्नान करके उन्हें धो सकता है। पापों से मुक्ति पाने के लिए, व्यक्ति को अपने कर्मों पर पछतावा होना चाहिए और भविष्य में अच्छे कर्म करने का संकल्प लेना चाहिए। यह एक लंबी और कठिन प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन यह आवश्यक है कि व्यक्ति अपने पापों को स्वीकार करे और उन्हें सुधारने की कोशिश करे। गंगा नदी को पापों को धोने के लिए एक प्रतीकात्मक रूप में इस्तेमाल किया जाता है। यह एक अनुस्मारक है कि हमें अपने कर्मों के प्रति जागरूक रहना चाहिए और अच्छे कर्म करने का प्रयास करना चाहिए। जब कोई कहता है। पाप धोने गंगा जा रहा इसका तर्कपूर्ण मतलब है।

मानव के कर्म अच्छे बुरे दोनो हो सकते है। पहले के समय मैं लोग गृहस्त से सन्यास में जाते थे तो उनका उद्देश्य भगवान भजन ओर उन्होंने ने अपनी जिंदगी में जो भी जाने अनजाने बुरे काम किये हो उनका प्रयिश्चित करना होता था। प्रायश्चित का हमारे वेदों में हमेशा महत्त्व बताया जाता है। बल्कि सभी धर्मों में इसका बहुत महत्ब है।अगर आपसे कोई गलत काम हुआ तो आप उसका प्रयिश्चित हमेशा ईश्वर से हमेशा कर सकते है। तो इसका मतलब यही था। की सभी लोगो से कुछ गलत सही काम हो जाते है और अगर आप अच्छे मनन से उस गलती को सच्चे मन के उसका प्रयिश्चित करे तो आप उस गलती से बाहर आ सकते है। तो गंगा नहाने का सही मतलब यही होता था। अगर आप देखे तो गंगा नदी मुख्यत हमारे सारे तीर्थ स्थानों से निकली हुई है। तो लोग अलग अलग तीर्थ जाकर गंगा स्नान करके भजन ईश्वर के प्रति श्रद्धा और उनके हिसाब से जोभी अच्छे काम हो सके करते थे। इसके अलावा अगर वैज्ञानिक तौर पर देखे तो गंगा के पानी में जहाँ से वह निकलती हैं। वे अपने साथ बहुत सारे तत्व और खनिजो से भरी हुए रहते है। जो हमारे पीने से या उससे नहाने से बहुत से प्रकारों से लाभदायक है। और हैं में यह बोतल वाले मिनिरल वाटर की बात नही कर रहा। उसमे कुछ नही रहता। मगर अभी के समय में हमने इसको बहुत ही हेरफेर और गलत तरीके से अपना लिया है। हर तर्क संगत चीज़ को हमने अपने अनुसार गलत तरीके से अपनी सहुलियत के हिसाब से बदल लिया है।पुराने समय म हमे बड़े लोगो से या विद्वानों ने प्रकृति को सुरक्षा करने को कहा जाता था। ये ही ग्रंथो में लिखा है। मगर आज लोग धर्म के नाम पे सबसे ज्यादा मातृ प्रकृति को नुकसान करते है।

हमारे संस्कृति में हर चीज़ जो हमारा भरण पोषण करती है। उसको मा का दर्जा दिया जाता है जिससे अच्छा कुछ नही है। गौ माता, प्रकृति माता, या धरती माँ । अब अगर आप देखे तो हम लोग सबसे ज्यादा। इन्ही के साथ खेलते है। जिसका भुक्तभोगी हमे बनना पड़ता है। केदारनाथ, जगह जगह बाढ़, तूफान, भूकंप, गँगा का पानी लोगो ने अपने पाप धोने के चक्कर में इतना प्रदूषित कर दिया है कि अब वो पीने लायक भी नही बचा। आप किसी भी धर्म जगह पे जाए लोगो ने उस जगह गंध मचा रखा है जो गलत है। और हमे इसको बहुत जल्दी सुधार करना होगा। अकेले गाय के नाम पे, और गंगा के नाम पे , और धर्म की सुरक्षा के नाम पे लड़ने से कुछ नही होग। हमे सही मायनों में इनका सम्मान करना सीखना होगा। पाप कोई कीचड़ नही की पानी से नहाने से छूट जाए उसके लिए प्रयिश्चित करना पड़ता है। इसका मतलब ये कतई नही की साल भर पाप करो उल्टे सीधे काम करो। और छुट्टियों में मंदिर म दान देके और गंगा में अपनी गंदगी बहा के उसको प्रदूषित करके पाप धो लओ। और प्रयिश्चित भी उनके लिए रहता है। जो असल मायनो उसको करना चाहते है। हर इंसान को पाप करने से पहले डरना चाहिए।गंगा में जो पाप धोते हैं वह आखिर कहाँ जाते हैं हम जो पाप करते हैं उन्हें तो भगवान भी नहीं धो सकता हां यह प्रमाणित जरूर है कि गंगा मैया पृथ्वी पर हमें नकारात्मक प्रभावों से बचाने के लिए अवतरित हुई है दैत्यों और राक्षसों से अर्थात भूत प्रेत और जादू टोने जैसी शक्तियों से बचाने में हमारी मदद करती तन और मन को निश्छल बनाकर हमें पवित्रता और आशीर्वाद प्रदान करती हैं पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्री राम अपने पिता दशरथ को, मातृ -पितु परम भक्त बेटे श्रवण कुमार के माता पिता के श्राप से नहीं बचा सके भगवान श्री कृष्ण अपने भांजे अभिमन्यु को नहीं बचा सके हालांकि अभिमन्यु अर्जुन के पुत्र थे और अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के परम सखा थे और परम भक्त भी थे। तो आम इंसान की क्या औक़ात है कि वह पाप करने के बाद केवल मात्र गंगा में स्नान करने से ही बच जाए।

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